बीती बातों पर ज्ञान देना बहुत आसान होता है, और हम हमेशा 21वीं सदी के चश्मे से ही अतीत को देखते हैं.
हमारे जैसे समाज में, जहां 'इज्जत' को बहुत बड़ा माना जाता है, महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा सिर्फ हिंसा खत्म होने पर खत्म नहीं होती. यौन हिंसा शब्द में सबसे बड़ा और अहम शब्द 'हिंसा' है. लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे समाज के ज़्यादातर लोग सिर्फ पहला शब्द ही सुनते हैं. बलात्कार सिर्फ और सिर्फ हिंसा है, और कुछ नहीं. जो महिला इसे सहती है, उसके लिए इसमें कुछ भी शारीरिक या यौन सुख जैसी बात नहीं होती.
फिर भी, हमने सदियों से पीड़ित महिला के शरीर और ज़मीर से 'इज़्ज़त', 'शर्म' और परिवार के नाम को ऐसा बांध दिया है कि शरीर के घाव भले भर जाएं, आत्मा का घाव ताउम्र हरा रहता है. समय के साथ शरीर के निशान तो मिट जाते हैं, लेकिन मन का दर्द गहराता जाता है. उस बेचारी के साथ जो अत्याचार हुआ सो हुआ, ऊपर से समाज उसे ज़िंदगी भर झुकी नजरों के साथ जीने की सजा दे देता है.
इसलिए, जब स्वरा कहती हैं कि एक औरत सिर्फ अपने प्राइवेट पार्ट्स से पहचान रखने वाली कोई चीज़ नहीं है, और किसी भी बलात्कार पीड़िता को गरिमा के साथ जीने का पूरा हक़ है, तो उनकी इस बात से सिर्फ वही इंसान असहमत हो सकता है जो समझना ही न चाहता हो. जब नामचीन हस्तियां जनता को कुछ समझाने का फ़ैसला करती हैं, तो हम उनसे इसी समझदारी की उम्मीद करते हैं. ऐसी बातें और होनी चाहिए.
लेकिन जैसे ही फिल्म 'जौहर कुंड' के दृश्य तक पहुंचती है, स्वरा की यह समझदारी कहीं गायब हो जाती है. स्वरा का मानना है कि 'पद्मावत' फिल्म जौहर का महिमामंडन करती है, और इस वजह से आज की बलात्कार पीड़िताएं खुद को इस बात के लिए कोसेंगी कि वे हमला होने से पहले मर क्यों नहीं गईं.
अगर आप इसे आज के 21वीं सदी के चश्मे से देखें, तो उनकी बात सही लग सकती है. लेकिन दिक्कत यही है. उन्होंने 14वीं सदी की एक औरत को उठाया, 21वीं सदी की अदालत में खड़ा कर दिया और पूछने लगीं कि उसने पुलिस में एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कराई!
मेरा मानना इसके बिल्कुल उलट है. जौहर का उतना सम्मान या महिमामंडन हुआ ही नहीं जितना होना चाहिए था, क्योंकि किसी ने कभी इसे सही से समझाने की जहमत ही नहीं उठाई. सती प्रथा का महिमामंडन किया गया था, और सती प्रथा (जो कोई बहुत आम परंपरा नहीं थी) एक ऐसी सामाजिक बुराई थी जिससे भारत लड़ा और उसे खत्म किया. क्योंकि उसमें इस बात का असली ख़तरा था कि संपत्ति पर नज़र रखने वाले रिश्तेदार ही विधवा महिला को चिता में धकेल दें. लेकिन जौहर से लड़ने की किसी को ज़रूरत नहीं है.
जिन हालात में जौहर हुआ था, वे हालात अब मौजूद ही नहीं हैं. अब न कोई किला घेरा गया है, न किसी सुल्तान की फ़ौज दरवाज़े पर खड़ी है. इस बात का कोई ख़तरा नहीं है कि दीपिका पादुकोण को पर्दे पर देखकर चित्तौड़ की कोई आज की गृहणी जौहर करने लगेगी. जौहर की तारीफ करने से किसी का नुकसान नहीं होता, लेकिन उसे गलत समझने से इतिहास और हमारे उस अतीत का नुकसान होता है जो गर्व से भरा था और दर्दनाक भी.
क्योंकि जौहर कभी अकेला नहीं होता था. वह हमेशा 'साका' के साथ आता था. पुरुष केसरिया कपड़े पहनते थे, किले के दरवाज़े खोल देते थे और एक ऐसी लड़ाई में कूद पड़ते थे जिसमें उनका ज़िंदा बचना नामुमकिन था. मौत तय थी. औरतें भी योद्धा थीं. कुछ तो मैदान-ए-जंग में भी गईं, लेकिन जंग में औरतों के लिए मौत की कोई गारंटी नहीं थी. उनके लिए सिर्फ एक बात तय थी- पकड़े जाना और बंदी बन जाना. अगर उन्हें मौत न मिली तो? इसलिए उन्होंने मौत का ज़्यादा दर्दनाक रास्ता चुना- जौहर कुंड.
इसने उन्हें ऐसी मौत दी जिसे उन्होंने अपने धर्म और सम्मान के हिसाब से चुना था, न कि जीतने वाले की मर्जी से. वहां कोई ऐसा शरीर ही नहीं बचा जिसे विकृत किया जा सके या जिससे बेअदबी की जा सके. यह ज़िंदगी से भागना नहीं था. यह गुलामी वाली उस ज़िंदगी से बचना था जहां मौत आती तो सही, लेकिन बहुत देर से और सब कुछ लुट जाने के बाद.
जरा उस 'सब कुछ' के बारे में सोचिए. किले की घेराबंदी महीनों तक चलती थी. उदाहरण के लिए, चित्तौड़ ने यह सब 1303 में देखा, फिर 1535 में और फिर 1568 में. पुरुष आखिरी लड़ाई की तैयारी करते थे और औरतें चिता की, क्योंकि किले की दीवारों के अंदर मौजूद हर इंसान जानता था कि अगर ऐसा न किया तो अंजाम क्या होगा. जीती हुई जंग के बाद बंदी बनाई गई औरतों को सिपाहियों में इनाम की तरह बांट दिया जाता था. सिपाही उन्हें व्यापारियों को बेच देते थे.
व्यापारी उन्हें उस दौर के बाज़ारों में ले जाते थे. और गुलामों के बाज़ार कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं, सच हुआ करते थे. और वे बाज़ार बहुत दूर-दूर होते थे. महमूद गज़नवी के सेक्रेटरी उतबी ने डींग हांकी थी कि 1019 में भारत से ले जाए गए 53,000 बंदियों को 2 से 10 दिरहम प्रति इंसान के हिसाब से बेचा गया था, और दूर-दूर के शहरों से व्यापारी उन्हें खरीदने आए थे, यहां तक कि खुरासान, इराक और ट्रांसऑक्सियाना भारतीय गुलामों से भर गए थे. यह वह रास्ता था.
गज़नी से निशापुर, फिर बगदाद, और वहां से दमिश्क और काहिरा (कैरो). इस्लामिक दुनिया के बड़े बाज़ारों का यह पूरा चक्कर था, जहां कन्नौज की एक औरत को किसी ग्रीक या नूबियन औरत के बगल में बोली लगाने वालों के सामने खड़ा कर दिया जाता था. यह धंधा इतना व्यवस्थित था कि इस पर बाकायदा किताबें लिखी गई थीं. 11वीं सदी में बगदाद के एक हकीम इब्न बुतलान ने गुलामों की खरीद और उनके फिजिकल चेकअप पर एक किताब लिखी थी. उसमें उसने 20 से ज्यादा इलाकों की औरतों के रंग-रूप, शरीर और स्वभाव के हिसाब से उनकी रेटिंग की थी और यह भी बताया था कि व्यापारी कमियों को छिपाने के लिए क्या-क्या चालाकियां करते हैं. उसने खरीदारों को भरोसा दिलाया था कि भारतीय औरतों का शरीर अच्छा होता है.
उसी सदी के फ़ारसी ग्रन्थ 'काबूस नामा' में गुलामों को खरीदने पर पूरा एक चैप्टर है, ठीक वैसे ही जैसे घोड़ों को खरीदने पर. तीन सौ साल बाद इब्न अल-अकफानी ने काहिरा के लिए यही किताब फिर से लिखी, क्योंकि मामलुक शासन के तहत काहिरा उस समय का सबसे बड़ा बाज़ार था. और अगर हमें लगे कि दिल्ली इन सबमें बेहतर थी, तो जान लीजिये कि अल्लाउद्दीन खिलजी ने राजधानी में गुलामों के दाम ठीक वैसे ही तय कर रखे थे जैसे उसने गेहूं के दाम तय किए थे. ये वही खिलजी है जिसे पद्मावत मूवी में विलेन बनाया गया था, और जिसकी स्वरा ने आलोचना की थी.
इतिहासकार बरनी लिखता है: काम करने वाली लड़की 5 से 12 टका, और बिस्तर के लिए सही मानी जाने वाली लड़की 20 से 40 टका. तीसरे दर्जे के घोड़े की कीमत 60 टका होती थी. मोहम्मद बिन तुग़लक़ के ज़माने में अल-उमरी लिखता है कि रोज़ाना हज़ारों गुलाम बेचे जाते थे और घरेलू काम के लिए युवा लड़की 8 टका में मिल जाती थी. इब्न बतूता लिखता है कि दिल्ली में गुलाम लड़कियां मुट्ठी भर टकों में बिक जाती थीं. मुस्लिम और गैर-मुस्लिम यात्री बताते हैं कि बाज़ार में मोल-भाव कैसे होता था, और औरतों को सब्जियों की तरह कैसे परखा जाता था. 'लौंडी' -यह शब्द आज 700 साल बाद भी हमारी गलियों में बचा हुआ है, और इसका इस्तेमाल गाली की तरह करते हुए सोचते भी नहीं कि कभी इसका मतलब क्या होता था. वे औरतें अपनी बाकी ज़िंदगी सिर्फ इसलिए खुद को कोसते हुए गुज़ार देती थीं कि वे मरी क्यों नहीं. हर एक दिन. उनके साथ होने वाला बलात्कार तो अत्याचारों की उस लंबी सूची में बस एक छोटी सी चीज़ थी.
अगर किसी को लगता है कि गुलाम की ज़िंदगी जीना भी कोई जीना होता था, तो 21वीं सदी ने हमें इसका एक नया पाठ पढ़ा दिया है. अगस्त 2014 में जब इस्लामिक स्टेट (ISIS) ने सिंजार पर कब्जा किया, तो यज़ीदी औरतों ने बाजार में बेचे जाने के बजाय पहाड़ से कूदकर जान दे देना बेहतर समझा. वह कोई पुराने जमाने का बाज़ार नहीं था.
वह रेट लिस्ट, वीडियो और डॉलर की कीमतों वाला बाज़ार था. खरीदने वाले उनके साथ बलात्कार कर सकते थे, उन्हें बेच सकते थे या तड़पा-तड़पा कर मार सकते थे. और उन्होंने ऐसा किया भी. यह सब साबित करने के लिए जीवित बचे लोगों की गवाहियां, नोबेल पुरस्कार और संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट मौजूद है. यह सब आधुनिक जमाने में हुआ, जब हर इंसान के हाथ में स्मार्टफोन था. अब जरा 14वीं सदी के बारे में सोचिए, जब 'मध्यकाल' कोई शब्द नहीं, बल्कि आपके आसपास का माहौल था. किसी हारी हुई औरत को लूटकर 10 टका देने वाले अगले आदमी को सौंप देने की बात सुनकर तब कोई हैरान नहीं होता था.
इसीलिए जौहर कभी बलात्कार या यौन हिंसा का मामला था ही नहीं, जैसा स्वरा समझती हैं. आज हमारे देश में बलात्कार के आंकड़ों को देखकर हमें गुस्सा आता है, और बिल्कुल आना चाहिए. हम इस बात से शर्मिंदा होते हैं कि आज के दौर में भी औरतें ऐसे अत्याचारों से गुजरती हैं. लेकिन उस जमाने के हर बंदी के लिए उस दर्द को हजार से गुणा कर दीजिए.
आज बलात्कार एक दंडनीय अपराध है, भले ही सजा कितनी ही ढीली क्यों न हो. तब, जीतने वाली फौज के लिए यह शासन की तरफ से मिला एक अधिकार था. तब न कोई एफआईआर थी, न अदालत, न कोई एनजीओ और न ही कोई ओपन लेटर. वहां सिर्फ दो ही रास्ते थे- या तो आग, या फिर बाजार. जौहर ने उन औरतों को उस जिंदगी के दर्द से बचा लिया जो मौत से भी बदतर थी, क्योंकि उनके लिए यह सचमुच दोनों में से किसी एक को चुनने का सवाल था.
जो औरतें उस जौहर कुंड में कूद गईं, वे भी यही मानती थीं कि उनकी पहचान सिर्फ उनके प्राइवेट पार्ट या शरीर नहीं हैं. क्योंकि औरतें सिर्फ अपने शरीर से नहीं जानी जातीं. स्वरा भास्कर बिल्कुल सही कह रही हैं. रानी पद्मिनी भी उनकी इस बात से सहमत होतीं. बस फ़र्क इतना है कि वे सात सदियां पहले ही इस बात से सहमत हो गई थीं, और अपने होठों पर यह प्रार्थना लिए उस आग में समा गई थीं: अग्नये स्वाहा!