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संघ प्रमुख का वो ‘बोरिंग‘ भाषण, जिसने ममदानियों का मूड खराब कर दिया!

न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर गार्डन में RSS प्रमुख मोहन भागवत का भाषण 'सांप्रदायिकता' का इंतजार कर रहे आलोचकों के लिए निराशाजनक साबित हुआ. वैश्विक शांति और 'वसुधैव कुटुंबकम' की बातें सुनकर हेडलाइन-हंटर्स की सारी प्लानिंग और नैरेटिव धरे के धरे रह गए.

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मोहन भागवत के न्यूयार्क इवेंट को लेकर काफी विरोध प्रदर्शन हुआ.
मोहन भागवत के न्यूयार्क इवेंट को लेकर काफी विरोध प्रदर्शन हुआ.

दुनिया भर के बड़े-बड़े मीडिया घरानों, अंतर्राष्ट्रीय विचारकों और एक्टिविस्टों के लिए बीता हफ्ता कितना कठिन रहा, इसका अंदाजा सिर्फ वही लगा सकते हैं. न्यूयॉर्क से लेकर लंदन और दिल्ली के स्टूडियोज में भारी तैयारी की गई थी. महीनों की मेहनत, दर्जनों रिसर्च पेपर, सैकड़ों एडिटोरियल और 'आशंकाओं' के पहाड़ खड़े किए गए थे. जोहरान ममदानियों ने मोर्चा संभाला हुआ था. अल जजीराओं से लेकर वॉल स्ट्रीट जरनलों ने पहले ही चेतावनी जारी कर दी थी कि देखिए, RSS प्रमुख मोहन भागवत न्यूयॉर्क आ रहे हैं और वहां 'हिंदू सुप्रीमेसी' का झंडा गाड़ने वाले हैं. जैसे ही भागवत मंच पर आकर कोई धमाकेदार बयान देंगे, वैसे ही 'कम्यूनल', 'इस्लामोफोबिया' और ‘एंटी माइनॉरिटी’ वाला तीखा लेख चेप दिया जाएगा.

लेकिन मोहन भागवत ने क्या किया? उन्होंने पूरे नैरेटिव पर पानी फेर दिया. ईमानदारी से कहा जाए तो मोहन भागवत का न्यूयॉर्क वाला भाषण बेहद 'बोरिंग' और TRP-विरोधी था. कोई मसाला नहीं. कोई मिर्च नहीं. एकदम सादा.

अरे भाई, जब इतनी मेहनत से आपके खिलाफ बैकग्राउंड सेट किया गया था, आपके दौरे से पहले ही न्यूयॉर्क की सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों का माहौल बनाया जा चुका था, तो आपकी भी तो कुछ जिम्मेदारी बनती थी न? दुनिया भर के ‘निष्पक्ष’ पत्रकारों और कॉमेंटेटर्स को आपसे कितनी उम्मीदें थीं!

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को लग रहा था कि संघ प्रमुख माइक संभालते ही कम से कम मुस्लिम कट्टरपंथ पर दो-चार कड़े शब्द तो बोलेंगे ही, ताकि शाम को उसे 'इस्लामोफोबिया' का लेबल लगाकर एक ग्लोबल डिबेट कराई जा सके. उम्मीद तो यह भी थी कि वे पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों का ज़िक्र करेंगे. जिसकी आड़ लेकर ये कहा जा सके कि 'देखिए, फिर से हिंदू खतरे में है वाला एजेंडा चलाया जा रहा है.'

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लेकिन भागवत ने तो जैसे कसम खा रखी थी कि वे कोई 'मसाला' नहीं परोसेंगे. वे मंच पर आए और बड़े आराम से 'वसुधैव कुटुंबकम', मेल-मिलाप और वैश्विक शांति की बातें करते गए.

अब आप ही बताइए, आज के इस डिजिटल ज़माने में ऐसी सीधी-सादी और भाईचारे वाली बातों में किसकी दिलचस्पी है? कौन सुनता है यह सब? अगर आपको हेडलाइंस में रहना है, तो कुछ ऐसा कहिए जिससे कम से कम चार लोग भड़कें, दो लोग सोशल मीडिया पर ट्रेंड चलाएं और न्यूज़ चैनलों की एंकरिंग में वॉल्यूम 100 तक चला जाए.

हद तो तब हो गई जब उन्होंने अपने पुराने बयान की याद दिलाते हुए फिर वही बात दोहरा दी कि, "अगर भारत में कोई हिंदू यह कहता है कि मुसलमानों को यहां नहीं रहना चाहिए, तो वह हिंदू ही नहीं है."

लीजिए! अब इस बयान का कोई क्या करे?

विदेशी रिपोर्टरों का तो पूरा गणित ही बिगड़ गया. जो लोग अपनी रिपोर्टों में 'RSS की कट्टरता' पर डॉक्टरेट कर रहे थे, वे अपना सिर पकड़कर बैठ गए. अब इस 'भाईचारे' वाली बात में कौन सा एंगल निकाला जाए? जब कोई कह दे कि मुसलमानों के बिना हिंदू अधूरा है, तो फिर उस पर 'हिंदू सुप्रीमेसी' का ठप्पा कैसे लगाया जाए? यह तो सरासर विश्लेषकों के साथ धोखा है.

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वैसे देखा जाए तो मोहन भागवत पहले भी कई बार ऐसी 'आउट ऑफ कोर्स' बातें कर चुके हैं. कभी वे कह देते हैं कि 'भारत के सभी 140 करोड़ लोगों का डीएनए एक है', तो कभी कहते हैं कि 'पूजा पद्धति बदलने से राष्ट्र नहीं बदलता'.

अब राजनीति के जानकारों से पूछिए, क्या ऐसी बातें आज की पॉलिटिक्स में चलती हैं? आज की राजनीति का सिलेबस अलग है भाई. राजनीति का नियम कहता है कि समाज को पहले दो हिस्सों में बांटो, फिर एक को दूसरे से डराओ और चुनाव जीतो. ममदानी कामयाब हैं इसमें. लेकिन संघ प्रमुख हैं कि हर बार ऐसा बयान दे देते हैं जो राजनीति के पूरे 'सिलेबस' से ही बाहर होता है. न कोई नफरत, न कोई भड़काऊ बात.

पूरे भाषण के दौरान न्यूयॉर्क के वे तमाम आलोचक, जो 'सांप्रदायिक भाषण' के सीधे प्रसारण का इंतजार कर रहे थे, वे टीवी स्क्रीन के सामने पॉपकॉर्न लेकर बैठे ही रह गए. भागवत आए, प्यार-मोहब्बत की बातें कीं, सबको एक साथ रहने का संदेश दिया और चले गए. न कोई ड्रामा, न कोई विवाद!

यह तो वही बात हो गई कि आप किसी हॉरर मूवी का टिकट भारी-भरकम पैसे देकर खरीदें, और थिएटर में आपको 'छोटा भीम' की कार्टून फिल्म दिखा दी जाए. पैसा वसूल होना तो दूर, इंसान ठगा हुआ महसूस करता है.

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अंत में तो बस यही कहा जा सकता है कि अगर मोहन भागवत जी को आगे भी विदेश दौरों पर जाना है, तो उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की भावनाओं का थोड़ा ख्याल रखना चाहिए. बेचारों ने कितनी मेहनत से 'हिंदू सुप्रीमेसी' थ्योरी का खाका तैयार किया था, आपने एक ही भाषण में उस पर पानी फेर दिया.

मानव अधिकार संगठनों, ग्लोबल थिंकर्स और हेडलाइन ढूंढते पत्रकारों की भलाई इसी में है कि आइंदा से संघ प्रमुख के भाषणों में एक 'वैधानिक चेतावनी' पहले से जारी कर दी जाए- "सावधान! इस भाषण में शांति, सद्भाव और भाईचारे की बोरिंग बातें हो सकती हैं. सनसनी की उम्मीद रखने वाले अपने जोखिम पर सुनें!"

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