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रामायण में साई पल्लवीः सीता की रंगत पर कैसी बहस?

नितेश तिवारी की रामायण में साई पल्लवी को सीता के रूप में कास्ट किए जाने पर सोशल मीडिया पर विवाद छिड़ गया है, जिसमें उनके रंग, बाल और चेहरे की बनावट को लेकर टिप्पणियां हो रही हैं.

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नमित मल्होत्रा की रामायण में साई पल्लवी देवी सीता का किरदार निभा रही हैं
नमित मल्होत्रा की रामायण में साई पल्लवी देवी सीता का किरदार निभा रही हैं

नितेश तिवारी की रामायण में साई पल्लवी को सीता के रूप में कास्ट किए जाने पर छिड़ी बहस अनावश्यक और सतही है. सोशल मीडिया पर उनकी रंगत, घुंघराले बाल और चेहरे की बनावट को लेकर टिप्पणियां हो रही हैं. कुछ लोग उन्हें रामानंद सागर की धारावाहिक वाली दीपिका चिखलिया या कैलेंडर आर्ट की आदर्श छवि से कमतर बता रहे हैं. यह विवाद असल में भारतीय सिनेमा और समाज में जड़ जमाए रंगभेद और पारंपरिक सौंदर्य मानकों की कमजोरी को उजागर करता है. साई पल्लवी का चेहरा असली भारतीय है और वह सीता के सार को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित कर सकती हैं.

सीता की छवि सदियों से कविताओं, चित्रों, नाटकों और स्थानीय परंपराओं में अलग-अलग रूपों में रही है. वाल्मीकि रामायण में उनके सौंदर्य का वर्णन काव्यात्मक है.पिघले सोने जैसी आभा, पीले रेशम, कमल जैसी छवि. यह कोई आधुनिक कास्टिंग फोटोग्राफ नहीं है. तुलसीदास और अन्य रचनाओं में भी विशेषताएं दी गई हैं, लेकिन वे एक निश्चित फेयर, स्ट्रेट हेयर, शार्प फीचर्स वाली छवि को अनिवार्य नहीं बनातीं. दक्षिण भारतीय फिल्मों और कई स्थानीय चित्रणों में राम नीले या गहरे रंग के और सीता गहरे या मध्यम रंग की दिखाई गई हैं. हिंदी बेल्ट में रामानंद सागर की 1987 वाली धारावाहिक ने एक छवि को पीढ़ियों के मन में बैठा दिया. वह एक प्रभावशाली व्याख्या थी, लेकिन एकमात्र सत्य नहीं. हर नई पीढ़ी और नई माध्यम में रामायण को नए सिरे से देखा जा सकता है. अगर हर बार वही पुरानी छवि चाहिए तो फिर रीमेक की जरूरत ही क्यों?

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इस विवाद में दोहरा मापदंड भी साफ दिखता है. राम को नील मेघ श्याम कहा गया है, फिर भी रणबीर कपूर जैसी गोरी या हल्की रंगत वाली कास्टिंग पर उतना ही सवाल नहीं उठता. कृति सेनन को आदिपुरुष में सीता बनाया गया तो उनकी शक्ल पर इतना बवाल नहीं हुआ. साई पल्लवी पर हमला व्यक्तिगत हो जाता है. उनके बाल, त्वचा, चेहरे के रोम तक. यह सिर्फ स्टाइलिंग की आलोचना नहीं है. भारतीय सिनेमा और विज्ञापनों ने दशकों तक गोरी रंगत, सीधे बाल और तेज नक्शों को स्त्री सौंदर्य का मानक बनाया. साई पल्लवी ने अपनी फिल्मों (फिदा, लव स्टोरी, श्याम सिंघा रॉय, गार्गी) में प्राकृतिक रूप से काम किया, फेयरनेस क्रीम को ठुकराया और मुंहासों व सौंदर्य मानकों पर खुलकर बात की. उनकी अपील ग्लैमर से नहीं, अभिव्यक्ति और गहराई से है. सीता का किरदार भी साहस, धैर्य, गरिमा और लचीलेपन का है, न कि किसी ब्यूटी पेजेंट का है.

कास्टिंग पर सवाल उठाने वाले कुछ तर्क भाषा और “देवत्व” से भी जोड़ते हैं. साई पल्लवी की हिंदी पर टिप्पणियां हुईं. मिथिला की सीता मैथिली बोलती होंगी, अयोध्या के राम अवधी. आधुनिक हिंदी कोई प्राचीन अनिवार्यता नहीं है. डबिंग का विकल्प हो सकता है, लेकिन यह उनके अभिनय कौशल को नकारने का आधार नहीं. कुछ पुराने बयानों को भी घसीटा गया, जबकि भूमिका की मांग भावुक गहराई और आंतरिक शक्ति की है. दक्षिण से आने वाली अभिनेत्री होने के कारण क्षेत्रीय रंग भी चढ़ गया. लेकिन दक्षिण और उत्तर दोनों जगह अलग-अलग राय हैं. रामानंद सागर के पोते ने भी साईं को सीता के लिए शानदार बताया. दीपिका चिखलिया ने उनकी प्रतिभा की तारीफ की और कहा कि फिल्म रिलीज होने के बाद दर्शक स्वीकार कर लेंगे.

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स्टाइलिंग पर आलोचना अलग हो सकती है. कुछ प्रमोशनल तस्वीरों में ज्वेलरी और कर्ल्स ओवरडन लगते हैं. सीता की गरिमा के लिए संयम बेहतर हो सकता है. लेकिन यह अभिनेत्री की जिम्मेदारी नहीं है. कॉस्ट्यूम, मेकअप और निर्देशन की बात है. फिल्म की भव्यता पर सवाल उठाना जायज है, पर चेहरे की परीक्षा नहीं. रामायण इसलिए जीवित है क्योंकि हर युग में उसे नए रूप में कहा गया. कविता, नाटक, टेलीविजन, सिनेमा हर व्याख्या विकल्प चुनती है. अगर हम एक परिचित छवि को ही अंतिम मान लें तो कहानी की जीवंतता खत्म हो जाती है.

साई पल्लवी का चेहरा भारत की वास्तविक विविधता को दर्शाता है. घुंघराले बाल, मध्यम रंगत और प्राकृतिक विशेषताएं भारतीय महिलाओं में आम हैं. सीता को केवल सुंदर बनाने की जबरदस्ती से उनकी आंतरिक शक्ति कमजोर पड़ती है. अशोक वाटिका में उनका धैर्य, अग्निपरीक्षा में उनकी गरिमा, और समर्पण ये चीजें चेहरे से ज्यादा अभिनय और स्क्रिप्ट से आती हैं. फिल्म अभी पूरी नहीं आई है. प्रमोशनल झलकियों पर अंतिम फैसला सुनाना जल्दबाजी है. दर्शक पहले फिल्म देखें, फिर राय बनाएं.

यह विवाद हमें याद दिलाता है कि भारतीय समाज में स्त्री देवत्व को अक्सर बाहरी सौंदर्य से जोड़ दिया जाता है. राम की छवि बदल सकती है, सीता की नहीं. यह असमानता है. साई पल्लवी जैसी अभिनेत्री इस चक्र को तोड़ सकती हैं. उनकी सीता अगर प्राकृतिक और अभिव्यंजक हुई तो वह कई युवा महिलाओं को यह संदेश देगी कि देवत्व और शक्ति किसी खास रंग या बाल की बनावट पर निर्भर नहीं है. रामायण की शक्ति उसके मूल्यों में है, न कि किसी एक कास्टिंग फोटो में. अनावश्यक सौंदर्य परीक्षा छोड़कर कहानी और प्रदर्शन पर ध्यान देना ही सही होगा.

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