राहुल गांधी आज अपना जन्मदिन मना रहे हैं. बनारस में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भी अपने नेता का जन्मदिन मनाया, लेकिन अलग तरीके से. बनारस यानी वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है, और यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय भी उसी शहर के हैं.
जन्मदिन मनाने के लिए यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता बनारस के एक घाट पर पहुंचे, जहां मंत्रोच्चार के बीच गंगाजल और दूध राहुल गांधी के पोस्टर पर डाला गया. जो पोस्टर था, उसमें राहुल गांधी की कोई साधारण तस्वीर नहीं थी. पोस्टर में राहुल गांधी के एक हाथ में संविधान की कॉपी वैसी ही है, जैसी अक्सर कांग्रेस के कार्यक्रमों में देखी जाती रही है. लेकिन, पोस्टर में राहुल गांधी दूसरे हाथ में फरसा थामे हुए दिखाए गए हैं. फरसा भगवान परशुराम का प्रतीक माना जाता है. भगवान परशुराम के बहाने राजनीति में ब्राह्मण समुदाय को जोड़ने की कोशिश होती है.
मौजूदा राजनीति में संविधान को डॉ. भीमराव आंबेडकर से जोड़कर पेश किया जाता है, जो दलितों और समाज के वंचित तबके की आवाज बुलंद करने के प्रतीक के तौर पर पेश किए जाते हैं. संविधान की कॉपी हाथ में लेकर राहुल गांधी समाज के वंचित तबके की आवाज बनने की कोशिश करते रहे हैं. अब समर्थकों ने राहुल गांधी के हाथ में फरसा थमा दिया है. जो संदेश देने की कोशिश हो रही है, मतलब तो यही है कि ब्राह्मण तबके को भी कांग्रेस से जोड़ने की कोशिश हो रही है. 2023 से जातिवाद की जो राजनीति राहुल गांधी ने शुरू की है, क्या ओबीसी के साथ कांग्रेस ब्राह्मणों को जोड़ पाएगी?
राहुल गांधी के फरसा वाले वीडियो पर बवाल
बनारस का वीडियो मीडिया में और सोशल मीडिया पर आने के बाद नई बहस शुरू हो गई. वीडियो में जो दिखाया गया, उस पर रिएक्शन भी होने लगे. बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति की कोशिश बताया, और माफी की मांग करने लगे.
बीजेपी के साथ साथ अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज की तरफ से भी नाराजगी जताई गई. अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज के मध्य प्रदेश अध्यक्ष पुष्पेंद्र मिश्रा ने कहा कि राहुल गांधी राजनीतिक व्यक्ति हैं... उनका सम्मान अपनी जगह है, लेकिन उनकी तुलना भगवान परशुराम से करना न तो उचित है और न ही सनातन परंपरा के अनुरूप है. कांग्रेस नेताओं को व्यक्तिपूजा और धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक उपयोग से बचना चाहिए.
पुष्पेंद्र मिश्रा का कहना है कि आज आवश्यकता भगवान परशुराम के आदर्शों, ज्ञान, तप, शौर्य और धर्म के प्रति समर्पण को जीवन में उतारने की है, न कि उनके स्वरूप का राजनीतिक ब्रांडिंग के लिए उपयोग करने की.
VIDEO | Varanasi: Youth Congress workers celebrate Lok Sabha Leader of Opposition Rahul Gandhi’s birthday with symbolic rituals, including pouring milk over his photograph in the Ganga River.#RahulGandhi #VaranasiNews
— Press Trust of India (@PTI_News) June 19, 2026
(Full video available on PTI Videos -… pic.twitter.com/57oraDhpqZ
बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला का कहना है कि कांग्रेस के लिए राहुल गांधी भगवान हो सकते हैं, लेकिन हिंदुओं के लिए नहीं. एक टीवी चैनल पर शहजाद पूनावाला ने एक स्लोगन भी कहा, हिंदू को दो गाली ताकि मिले वोट बैंक की ताली. शहजाद पूनावाला ने कहा कि खुद को भगवान का अवतार बताना ईशनिंदा जैसा है. और पूछा, क्या राहुल गांधी और कांग्रेस इसके लिए माफी मांगेंगे?
'सॉफ्ट ब्राह्मणवाद' चलेगा क्या?
2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी को मंदिरों का दौरा करते देखा गया था. बाद में कर्नाटक चुनाव के वक्त भी राहुल गांधी मठों में जाकर आशीर्वाद लेते देखे गए. राहुल गांधी ने कैलास मानसरोवर की यात्रा भी की, और 2018 के मध्य प्रदेश चुनाव तक उनको जनेऊधारी हिंदू के बाद शिवभक्त तक भी बताया जाने लगा था. गुजरात में भी बीजेपी का प्रदर्शन तब बढ़िया रहा, और मध्य प्रदेश में तो सरकार ही बन गई थी - लेकिन, धीरे धीरे सॉफ्ट हिंदुत्व का प्रयोग कम नजर आने लगा. 2014 की ही तरफ 2019 में भी कांग्रेस को आम चुनाव में कामयाबी नहीं मिली. राहुल गांधी अमेठी से भी चुनाव हार गए. और, रणनीति बदल गई.
अब उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं. यूपी में सभी राजनीतिक दलों का जोर ब्राह्मण समुदाय का वोट हासिल करने पर है. मायावती की सफल सोशल इंजीनियरिंग की तर्ज पर अखिलेश यादव ने भी ब्राह्मणों को समाजवादी पार्टी से जोड़ने की कवायद शुरू की है. बनारस में जो नजारा दिखा है, ब्राह्मण वोटर को कांग्रेस की तरफ खींचने की कोशिश नहीं तो क्या है?
क्या सॉफ्ट हिंदुत्व का प्रयोग फेल हो जाने के बाद कांग्रेस अब राहुल गांधी को फिर से आगे करके सॉफ्ट ब्राह्मणवाद की कवायद शुरू करने जा रही है?
ओबीसी के हक की लड़ाई का क्या?
2023 में केंद्र की बीजेपी सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाया, और महिला आरक्षण बिल पास हुआ. महिला बिल के मामले में कांग्रेस को अचानक यू-टर्न लेते देखा गया. महिला बिल को लेकर तब समाजवादी पार्टी और आरजेडी जैसी पार्टियां पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की मांग कर रही थीं, लेकिन पहले कांग्रेस को यह मांग मंजूर नहीं थी. बिल लाने के बाद कांग्रेस ने भी पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग शुरू कर दी, और फिर पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी उसी बात को आगे बढ़ाते हुए जाति जनगणना की मांग करने लगे थे. अब तो सरकार जाति जनगणना करा भी रही है.
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण तबके की कुल आबादी के 10 से 15 फीसदी के बीच हिस्सा होने का अंदाजा है. माना यह भी जाता है कि यूपी की 403 में से 100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण समुदाय चुनाव नतीजों पर असर डालने की पूरी क्षमता रखता है.
कांग्रेस समर्थकों की गतिविधियों को देखने के बाद एक सवाल तो उठता ही है कि आखिर राहुल गांधी की ओबीसी के हक की लड़ाई का क्या होगा?
राहुल गांधी के भाषणों में अक्सर ओबीसी को लेकर एक बात सुनने को मिलती रही है. कहते हैं, यह देश की 90 फीसदी आबादी है, लेकिन जब बजट बनता है और हलवा बंटता है, तो वहां इनका कोई प्रतिनिधि नहीं होता... हलवा हम बना रहे हैं, खा कोई और रहा है.
जुलाई, 2025 में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में 'भागीदारी न्याय सम्मेलन' हो रहा था. सम्मेलन में राहुल गांधी ने ओबीसी को लेकर कांग्रेस की बड़ी चूक को सरेआम स्वीकार किया था. राहुल गांधी का कहना था, कांग्रेस सरकार के समय ओबीसी वर्ग की जितनी मजबूती से रक्षा की जानी चाहिए थी, वह नहीं हो पाई.
राहुल ने कहा था, मैं 2004 से राजनीति में हूं... और अब जब पीछे देखता हूं, तो पाता हूं कि कई मोर्चों पर मैंने अच्छा काम किया. जैसे मनरेगा, ट्राइबल बिल, भोजन का अधिकार आदि, लेकिन ओबीसी वर्ग के मामलों को उतनी गहराई से नहीं समझ पाया, जितना जरूरी था... मुझे अगर तब उनकी तकलीफें समझ में आई होतीं, तो मैं उसी समय जातिगत जनगणना करवा देता... ये मेरी गलती थी, न कि कांग्रेस की.
कांग्रेस की लड़ाई बीजेपी से है या समाजवादी पार्टी से?
अब अगर समाजवादी पार्टी और बीएसपी की तरह कांग्रेस भी ब्राह्मण वोटर को साधने के लिए प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन कराना शुरू करती है, तो लोग सवाल तो पूछेंगे ही. ये सवाल तो होंगे ही कि वास्तव में राहुल गांधी किसे हक दिलाना चाहते हैं? ओबीसी तबके को या ब्राह्मण समुदाय को?
जैसे अखिलेश यादव पीडीए फॉर्मूले को लेकर चल रहे थे, और अचानक ब्राह्मण समुदाय की भी फिक्र होने लगी, राहुल गांधी का बनारस वाला पोस्टर देखने के बाद कांग्रेस का भी वैसा ही इरादा लगता है. जो सवाल अखिलेश यादव से है, वही राहुल गांधी से भी पूछा जाएगा. अखिलेश यादव से सवाल है कि क्या पीडीए पर्याप्त नहीं है? वैसे ही राहुल गांधी की जातीय राजनीति को देखते हुए सवाल बनता है कि क्या चुनाव जीतने के लिए ओबीसी वोट कम पड़ रहा है?
और राहुल गांधी से सवाल यह भी है कि कांग्रेस की लड़ाई वो बीजेपी से मानते हैं या समाजवादी पार्टी से? और जब समाजवादी पार्टी से गठबंधन है, तो अखिलेश यादव की चुनावी रणनीति में कांग्रेस क्यों सेंध लगाने की कोशिश कर रही है?