सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए 'मक्का डिफेंस पैक्ट' (Mecca Joint Defence Agreement) को लेकर एक दिलचस्प ट्रिपल-आई (इजरायल, ईरान और इंडिया) का रिएक्शन देखने को मिल रहा है. नाटो के 'आर्टिकल 5' की तर्ज पर इस एग्रीमेंट में यह बताया गया है कि ‘तीनों में से किसी भी एक सदस्य देश पर हुआ हमला, तीनों देशों पर हमला माना जाएगा.’ ईरान जंग के बैकग्राउंड में हुई इस लामबंदी से मिडिल-ईस्ट और उससे परे जाकर दुनियाभर के स्ट्रेटीजिक, डिप्लोमैटिक और डिफेंस एनालिस्ट को सोचने पर मजबूर कर दिया है. बुनियादी सवाल यही है कि आखिर तीन इस्लामिक देशों का ये अलायंस कितना सीरियस है, इसकी काबिलियत कितनी है और यह किसे टारगेट कर सकता है?
ग्लोबल थिंक टैंक IISS और CSIS की रिपोर्टों के अनुसार, मक्का एग्रीमेंट ने मिडिल-ईस्ट और साऊथ एशिया में एक नई 'रणनीतिक लामबंदी' की स्थिति पैदा कर दी है. और भारत ही नहीं, इजरायल और ईरान को भी एक ही नाव पर सवार कर दिया है.
इजरायल की नजर तुर्की-पाक पर
जेरुसलम पोस्ट के विश्लेषकों का मानना है कि तुर्की का इस समझौते में शामिल होना और पाकिस्तान की एटमी बयानबाजी इजरायल के लिए सबसे बड़ा अलर्ट है. तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन लंबे समय से इजरायल विरोधी सुर अपनाते रहे हैं, और पाकिस्तान पहले से ही इजरायल को मान्यता नहीं देता. ऐसे में जब ये दोनों देश सऊदी अरब के साथ डिफेंस पैक्ट में बंधते हैं, तो इजरायल के पास अपनी सुरक्षा चिंताओं को वाशिंगटन के सामने दोहराने का पक्का आधार मिल जाता है.
इजरायल अब अमेरिका को यह भरोसा दिलाएगा कि मिडिल-ईस्ट में नाटो सदस्य तुर्की अब भरोसेमंद साझेदार नहीं रहा. इसके अलावा, इस एग्रीमेंट से इजरायल को भारत के साथ अपने डिफेंस और टेक्नोलॉजिक रिलेशनशिप को और डीप बनाने का मौका मिल गया है. इजरायल अब भारत को मॉडर्न मिलिट्री हार्डवेयर, इंटेलिजेंस और साइबर डिफेंस देने में बिना हिचक आगे बढ़ सकता है. इतना ही नहीं, अब यदि दोनों देश मिलकर ग्रीस, सायप्रस और आर्मीनिया जैसे देशों के जरिए तुर्की की घेराबंदी करते हैं, तो उसके पास ऐतराज का मौका नहीं रहेगा.
ईरान के लिए फीका तरबूज
तेहरान टाइम्स ने अपने संपादकीय ('द सील्ड वॉटरमेलन ऑफ द मक्का एग्रीमेंट') में इस समझौते की तुलना एक ऐसे 'तरबूज' से की है, जिसके स्वाद का तब तक अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है, जब तक कि उसे काटकर खाया न जाए. बेचने वाला भले तरबूज को लाल और रसीला कहे, लेकिन अंदर से सड़ा हुआ या सफेद निकल सकता है. ईरान का मानना है कि यह समझौता एक खोखला पैक्ट है, जिसे तेहरान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए तैयार किया गया है.
ईरान अब पूरे मुस्लिम जगत के सामने यह सवाल उठा रहा है कि जब इजरायल और अमेरिका उस पर हमला कर रहे थे, तब यह तथाकथित 'इस्लामिक नाटो' खामोश रहता है, लेकिन पड़ोसी मुस्लिम मुल्कों के खिलाफ तुरंत लामबंद हो जाता है. कुछ लोग मक्का डिफेंस पैक्ट को ‘सुन्नी अलायंस’ भी कह रहे हैं, ऐसे में ईरान जैसे सबसे बड़े शिया देश के लिए कान खड़े करना लाजमी है. ईरान अब इस समझौते को ढाल बनाकर रूस और चीन के साथ अपनी डिफेंस रिलेशनशिप को और मजबूत करेगा, साथ ही भारत के साथ चाबहार पोर्ट और अंतर्राष्ट्री उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) पर तेजी से काम कर सकता है.
इंडिया के लिए नो सरप्राइज
भारत के लिए यह समझौता कोई सरप्राइज नहीं था, लेकिन इसने भारत को अपनी विदेश नीति में आक्रामक रुख अपनाने का बेहतरीन मौका दे दिया है. पाकिस्तान हमेशा से सऊदी अरब का सहारा लेता रहा है और तुर्की पिछले कुछ सालों से खुलकर पाकिस्तान का साझेदार बना हुआ है. 'ऑपरेशन सिंदूर' और हालिया तनावों में तुर्की द्वारा पाकिस्तान को दिए गए ड्रोन और सैन्य साजो-सामान इसका सीधा सबूत हैं.
तुर्की द्वारा पाकिस्तान का साथ देने के जवाब में भारत ने तुर्की के विरोधियों साइप्रस, ग्रीस और आर्मेनिया को डिफेंस सप्लाय बढ़ा दी है. भारत अब इन देशों को पिनाका रॉकेट सिस्टम, आकाश एयर डिफेंस और मिसाइलें एक्सपोर्ट कर रहा है.
भारत जानता है कि सऊदी अरब भले ही पाकिस्तान के साथ कागजी दस्तखत कर ले, लेकिन अपनी आर्थिक जरूरतों और 'विजन 2030' के लिए वह भारत जैसे विशाल एनर्जी कंज्यूमर और इकोनॉमिक पावर को नजरअंदाज नहीं कर सकता.
मक्का डिफेंस पैक्ट: रेगिस्तानी रेत से बनी रक्षा दीवार
'मक्का डिफेंस पैक्ट' के असर को लेकर कुछ बुनियादी सवाल खड़े हो रहे हैं. पहला, नाटो के उलट इस समझौते में कोई एकीकृत मिलिट्री कमान या परमानेंट हेडक्वार्टर नहीं बनाया गया है. दूसरा, तीनों देशों की प्राथमिकताओं का अंतर. तीनों देशों के सिक्योरिटी इंटरेस्ट और ज्योग्राफिक चैलेंज अलग-अलग हैं. सऊदी अरब की प्राथमिकता यमन और पर्शियन गल्फ की सुरक्षा है, जबकि तुर्की का फोकस भूमध्य सागर और सीरिया पर है, जबकि पाकिस्तान मुख्य रूप से अपनी पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं से जुड़ी चुनौतियों से घिरा है.
और तीसरा और सबसे अहम सवाल- तीनों देशों की आर्थिक और सैन्य क्षमताओं का फर्क. पाकिस्तान की वर्तमान आर्थिक स्थिति और तुर्की की अपनी आर्थिक चुनौतियां इस गठबंधन की लंबी उम्र पर सवालिया निशान लगाती हैं. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि नाटो तो दुनिया के अमीर देशों का गठबंधन है, लेकिन वहां भी आर्थिक अंशदान को लेकर अमेरिका और बाकी देशों के बीच सिरफुटव्वल चलती रहती है.
बहरहाल, मक्का डिफेंस पैक्ट ने मिडिल-ईस्ट और साऊथ एशिया के शक्ति-संतुलन में एक नया मोड़ तो ला ही दिया है. जहां एक ओर सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक फॉर्मल सिक्योरिटी एक्सिस बनाने का एलान किया है, वहीं दूसरी ओर इसके रणनीतिक जवाब में इजरायल, भारत और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष ही सही, एक समानांतर सुरक्षा समीकरण आकार लेते दिख रहे हैं.