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सांसों का आपातकाल: जहरीली हवा से खतरे में जिंदगी, अब ठोस एक्शन की जरूरत

वायु प्रदूषण भारत में जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है. पीएम 2.5 का संपर्क हृदय और श्वसन संबंधी बीमारियों तथा समय से पहले मृत्यु का जोखिम बढ़ाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, मौसमी प्रतिबंधों के बजाय सार्वजनिक परिवहन, उत्सर्जन नियंत्रण, बेहतर निगरानी और दीर्घकालिक नीतियां जरूरी हैं.

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दिल्ली से छोटे शहरों तक प्रदूषण का शिकंजा (Photo-ITG)
दिल्ली से छोटे शहरों तक प्रदूषण का शिकंजा (Photo-ITG)

वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य, आर्थिक उत्पादकता और भावी पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा राष्ट्रीय संकट है. इसका समाधान मौसमी प्रतिबंधों में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित दीर्घकालिक नीतियों, प्रभावी निगरानी और उत्सर्जन के स्रोतों पर नियंत्रण में निहित है.

सांस लेना जीवन की सबसे सहज प्रक्रिया है, लेकिन प्रदूषित हवा इसी प्रक्रिया को स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण बना रही है. वायु प्रदूषण का असर खांसी, आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी तक सीमित नहीं है. इसके संपर्क से हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर और समय से पहले मृत्यु का जोखिम भी बढ़ता है. ऐसे में स्वच्छ हवा सुनिश्चित करना केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा का संवैधानिक तथा प्रशासनिक दायित्व भी है.

स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन ने भारत में वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों की गंभीर तस्वीर प्रस्तुत की है. वर्ष 2009 से 2019 के दौरान देश के 655 जिलों के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले इस अध्ययन के अनुसार, पीएम 2.5 की वार्षिक औसत सांद्रता में प्रत्येक 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि मृत्यु के जोखिम में 8.6 प्रतिशत बढ़ोतरी से जुड़ी थी. भारतीय राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों से अधिक पीएम 2.5 के संपर्क के आधार पर शोधकर्ताओं ने इस अवधि में लगभग 38 लाख मौतों का अनुमान लगाया. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अधिक कठोर दिशा-निर्देशों को आधार बनाने पर यह अनुमान 1.66 करोड़ तक पहुंच गया. ये आंकड़े सांख्यिकीय मॉडल से निकले अनुमान हैं, न कि प्रत्येक मृत्यु के कारण की व्यक्तिगत पुष्टि. फिर भी वे दीर्घकालिक प्रदूषण और मृत्यु जोखिम के बीच गंभीर संबंध को रेखांकित करते हैं.

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पीएम 2.5 ऐसे सूक्ष्म कण हैं, जिनका वायुगतिकीय व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है. इनके छोटे आकार के कारण ये फेफड़ों की गहराई तक पहुंच सकते हैं. इनका संपर्क शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव जैसी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है. वैज्ञानिक शोध लंबे समय तक इनके संपर्क को हृदय तथा श्वसन संबंधी बीमारियों और समय से पहले मृत्यु के बढ़ते जोखिम से जोड़ते हैं.

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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2021 में पीएम 2.5 के लिए वार्षिक औसत का दिशा-निर्देश पांच और 24 घंटे के औसत का 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर निर्धारित किया था. इसके विपरीत, भारत के राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों में वार्षिक सीमा 40 और 24 घंटे की सीमा 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है. दोनों में अंतर महत्त्वपूर्ण है. भारतीय मानक नियामक अनुपालन के लिए निर्धारित सीमा हैं, जबकि डब्ल्यूएचओ के दिशा-निर्देश स्वास्थ्य संबंधी वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित अनुशंसाएं हैं. इनका अर्थ यह नहीं कि राष्ट्रीय सीमा के भीतर प्रदूषण का कोई स्वास्थ्य जोखिम नहीं रहता.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देश यह भी रेखांकित करते हैं कि प्रदूषण का जोखिम कम स्तर पर भी बना रह सकता है. इसलिए लक्ष्य केवल निर्धारित सीमा का पालन कराना नहीं, बल्कि प्रदूषकों की सांद्रता को लगातार नीचे लाना होना चाहिए.

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वायु प्रदूषण को केवल दिल्ली-एनसीआर की समस्या मानना अब संभव नहीं है. औद्योगिक उत्सर्जन, वाहनों का धुआं, निर्माण गतिविधियां और सड़क की धूल छोटे शहरों को भी प्रभावित कर रहे हैं. असम-मेघालय सीमा पर स्थित औद्योगिक क्षेत्र बर्नीहाट की खराब वायु गुणवत्ता इस व्यापक चुनौती की ओर संकेत करती है.

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की मार्च 2025 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर 2024 से जनवरी 2025 के बीच दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई में पीएम 2.5 प्रदूषण की समस्या सामने आई. दिल्ली में इस अवधि का औसत स्तर लगभग 175 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा. रिपोर्ट ने यह भी बताया कि मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों में सर्दियों के दौरान कई स्थानों पर स्थानीय प्रदूषण तेजी से बढ़ा. कुछ इलाकों में प्रदूषण का स्तर शहर के औसत से लगभग 60 प्रतिशत अधिक तक रहा.

इन निष्कर्षों से स्पष्ट है कि किसी शहर का औसत आंकड़ा उसके प्रत्येक इलाके की वास्तविक स्थिति नहीं बताता. औद्योगिक क्षेत्रों, व्यस्त सड़कों और निर्माण स्थलों के आसपास जोखिम अधिक हो सकता है. इसलिए निगरानी केंद्रों का विस्तार और स्थानीय स्तर पर प्रदूषण के आंकड़ों की उपलब्धता जरूरी है.

प्रदूषित हवा का असर समाज के सभी वर्गों पर पड़ता है, लेकिन जोखिम और उससे बचने की क्षमता समान नहीं होती. बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं तथा पहले से हृदय या फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित लोग विशेष रूप से संवेदनशील हैं. बच्चों के फेफड़े विकास की अवस्था में होते हैं, इसलिए लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क को उनके श्वसन स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता माना जाता है.

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इसके अतिरिक्त, निर्माण श्रमिक, रेहड़ी-पटरी विक्रेता, रिक्शा चालक और यातायात पुलिसकर्मी दिन का बड़ा हिस्सा खुले वातावरण में बिताते हैं. आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के पास वायु शोधक यंत्र लगाने या प्रदूषण बढ़ने पर घर में रहने का विकल्प भी सीमित होता है. दैनिक मजदूरी पर निर्भर व्यक्ति के लिए काम से अनुपस्थित रहने का अर्थ आय का नुकसान है.

इसलिए वायु प्रदूषण नियंत्रण को सामाजिक न्याय से अलग करके नहीं देखा जा सकता. स्कूलों, अस्पतालों और श्रमिकों के कार्यस्थलों के आसपास निगरानी बढ़ाने, कार्यस्थलों पर जोखिम घटाने और संवेदनशील समूहों तक स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियां पहुंचाने की व्यवस्था होनी चाहिए. प्रदूषण नियंत्रण की लागत का बोझ उन लोगों पर नहीं पड़ना चाहिए जो इसके सबसे अधिक शिकार हैं.

सर्दियों में प्रदूषण बढ़ते ही पराली जलाने और पटाखों पर चर्चा केंद्रित हो जाती है. दोनों कुछ परिस्थितियों में प्रदूषण बढ़ा सकते हैं, लेकिन पूरे संकट का कारण इन्हें मानना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है. वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन, उद्योगों, बिजली उत्पादन, घरेलू ठोस ईंधन, निर्माण स्थलों की धूल, सड़कों की धूल और खुले में कचरा जलाने की भी इसमें भूमिका हो सकती है. विभिन्न स्रोतों का योगदान स्थान, मौसम और समय के अनुसार बदलता है.

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सीएसई के जनवरी 2025 के आकलन में दिल्ली में वार्षिक पीएम 2.5 का स्तर 2024 में 104.7 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो 2023 की तुलना में 3.4 प्रतिशत अधिक था. संस्था ने यह भी रेखांकित किया कि पराली जलाने की घटनाओं में गिरावट के बावजूद प्रदूषण ऊंचे स्तर पर बना रहा. इससे स्थानीय और क्षेत्रीय उत्सर्जन पर निरंतर नियंत्रण की आवश्यकता स्पष्ट होती है.

सर्दियों में तापमान व्युत्क्रमण, हवा की कम गति और वर्षा का अभाव प्रदूषकों को जमीन के करीब जमा रहने में मदद कर सकते हैं. तापमान व्युत्क्रमण में धरती के पास ठंडी हवा के ऊपर अपेक्षाकृत गर्म हवा की परत बन जाती है, जिससे वायुमंडल का ऊर्ध्वाधर मिश्रण सीमित होता है. हालांकि, मौसम प्रदूषण को बढ़ा सकता है लेकिन वह उसके उत्सर्जन का मूल कारण नहीं है. उत्सर्जन कम किए बिना केवल मौसम बदलने की प्रतीक्षा करना स्थायी समाधान नहीं हो सकता.

वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) आम लोगों को प्रदूषण के स्तर और उससे जुड़े स्वास्थ्य जोखिम का संकेत देता है. भारत में एक्यूआई की छह श्रेणियां हैं, इनमें, अच्छा (0-50), संतोषजनक (51-100), मध्यम (101-200), खराब (201-300), बहुत खराब (301-400) और गंभीर (401-500) है. एक्यूआई केवल पीएम 2.5 का माप नहीं है; इसकी गणना विभिन्न प्रमुख प्रदूषकों के उप-सूचकांकों के आधार पर की जाती है. इसलिए एक्यूआई और किसी एक प्रदूषक की सांद्रता को एक-दूसरे का पर्याय नहीं समझना चाहिए.

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दिल्ली-एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप) के तहत प्रदूषण बढ़ने पर चरणबद्ध प्रतिबंध लगाए जाते हैं. गंभीर परिस्थितियों में निर्माण गतिविधियों, वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों पर पाबंदियां जरूरी हो सकती हैं लेकिन यदि पूरे वर्ष उत्सर्जन नियंत्रण कमजोर रहे तो सर्दियों के प्रतिबंध सीमित राहत ही दे पाएंगे.

स्थायी समाधान के लिए सार्वजनिक परिवहन को सुलभ और भरोसेमंद बनाना, बसों की संख्या बढ़ाना, निर्माण स्थलों पर धूल रोकना, सड़कों की वैज्ञानिक सफाई करना और औद्योगिक उत्सर्जन की नियमित निगरानी सुनिश्चित करना आवश्यक है. कचरे का उचित संग्रहण और निपटान तथा खुले में कचरा जलाने पर प्रभावी रोक भी जरूरी है. किसानों को पराली प्रबंधन के लिए मशीनें, आर्थिक सहायता और फसल अवशेषों के वैकल्पिक उपयोग के अवसर उपलब्ध कराने होंगे. केवल दंड पर निर्भर रहने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा.

इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना उपयोगी हो सकता है, लेकिन परिवहन नीति का केंद्र सार्वजनिक परिवहन और निजी वाहनों पर निर्भरता कम करना होना चाहिए. साथ ही, प्रदूषण नियंत्रण के लिए केंद्र, राज्य सरकारों और नगर निकायों के बीच समन्वय जरूरी है क्योंकि प्रदूषक प्रशासनिक सीमाओं में बंधे नहीं रहते. साझा आंकड़ों, उत्सर्जन सूची और स्रोत-विशिष्ट कार्ययोजना के आधार पर क्षेत्रीय स्तर पर कार्रवाई की जानी चाहिए.

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सरकारों को अगले पांच से दस वर्षों के लिए मापने योग्य लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए. पीएम 2.5 और अन्य प्रमुख प्रदूषकों की सांद्रता में कमी, निगरानी केंद्रों का विस्तार, औद्योगिक मानकों का अनुपालन और प्रदूषण नियंत्रण पर खर्च के परिणामों का नियमित मूल्यांकन इन लक्ष्यों का हिस्सा होना चाहिए. प्रगति संबंधी आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं, ताकि जवाबदेही केवल घोषणाओं तक सीमित न रहे.

नागरिक सार्वजनिक परिवहन अपनाकर, कचरा न जलाकर, वाहनों का रखरखाव करके और ऊर्जा की बचत करके योगदान दे सकते हैं. प्रदूषण बढ़ने पर संवेदनशील लोगों को स्थानीय स्वास्थ्य सलाह का पालन करना चाहिए. उपयुक्त कण-रोधी मास्क और घर के भीतर वायु शोधक कुछ परिस्थितियों में जोखिम घटाने में मदद कर सकते हैं, लेकिन व्यक्तिगत सावधानियां सरकारी कार्रवाई का विकल्प नहीं हैं.

देश के विकास का आकलन केवल सड़कों, इमारतों, उद्योगों और आर्थिक वृद्धि से नहीं होना चाहिए. यह भी देखना होगा कि विकास नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को कितना बेहतर बना रहा है. स्वच्छ हवा कोई विलासिता नहीं, बल्कि जीवन की बुनियादी आवश्यकता है. सफलता का पैमाना यह नहीं कि प्रदूषण बढ़ने पर कितने प्रतिबंध लगाए गए, बल्कि यह है कि वर्षों में प्रदूषकों का स्तर और उनसे जुड़ा स्वास्थ्य जोखिम कितना घटा. सवाल यह नहीं कि अगली सर्दी में हवा कितनी जहरीली होगी, बल्कि यह है कि उसे जहरीला होने से रोकने के लिए आज क्या किया जा रहा है. स्वच्छ हवा सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व, उद्योगों की जिम्मेदारी और समाज की साझा आवश्यकता है. सांसों की सुरक्षा को भविष्य पर टालना जनस्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों- दोनों के प्रति अन्याय होगा.

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