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असमिया ‘मामा-मियां’... हिमंत बिस्व सरमा का करिश्मा है दो लफ्जों की कहानी

इटली में जब कोई कहे- ‘मामा मिया’, तो समझिए कि वो किसी बात पर चौंक गया है. जैसे हमारे यहां कहा जाता है - ‘ओ मां’. लेकिन, असम में हिमंत बिस्वा सरमा ने इन दो लफ्जों के मायने बदल दिए हैं. बेशक, इन दो लफ्जों ने बीजेपी को ऐसी हैट्रिक दिलाई है जिसने राजनीतिक पंडितों को चौंकाया है.

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हिमंत बिस्व सरमा की असम जीत में दो लफ्जों का कमाल है- मामा और मियां. (File photo: PTI)
हिमंत बिस्व सरमा की असम जीत में दो लफ्जों का कमाल है- मामा और मियां. (File photo: PTI)

असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने एक बात शीशे की तरह साफ कर दी है-नॉर्थ-ईस्ट की राजनीति के 'किंग' हिमंत बिस्वा सरमा ही हैं. बीजेपी जिस तरह से असम में जीत की हैट्रिक लगाने जा रही है, उसने दिल्ली से लेकर गुवाहाटी तक के सियासी पंडितों को हैरान कर दिया है. इस जीत की स्क्रिप्ट किसी फिल्मी ब्लॉकबस्टर से कम नहीं है, जिसके केंद्र में दो ही शब्द सबसे ज्यादा गूंजे- 'मामा' और 'मियां'.

एक तरफ हिमंत राज्य की महिलाओं में 'मामा' बन गए. जो कि एक कामयाब इमोशनल कार्ड बन गया. तो दूसरी तरफ 'मियां' पॉलिटिक्स को टारगेट कर ऐसा ध्रुवीकरण किया कि विपक्ष के पास डिफेंस का कोई मौका ही नहीं बचा. आइए समझते हैं कि कैसे इन दो शब्दों ने असम की सत्ता की चाबी फिर से बीजेपी को सौंप दी.

'मामा' वाला इमोशनल टच और कैश का कनेक्शन

असम में आज छोटे बच्चे हों या बुजुर्ग महिलाएं, सबके लिए हिमंत बिस्वा सरमा सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि 'मामा' हैं. राजनीति में अक्सर नेता खुद को 'सेवक' या 'प्रधान' बताते हैं, लेकिन हिमंत ने 'पारिवारिक रिश्ता' कायम किया. इस 'मामा' ब्रैंडिंग के पीछे छिपा था महिलाओं का एक बहुत बड़ा और वफादार वोट बैंक.

हिमंत ने समझा कि अगर घर की महिला खुश है, तो वोट कहीं नहीं जाएगा. उनकी 'अरुणोदयी 2.0' और अन्य कैश ट्रांसफर स्कीम ने सीधे बहनों और भांजियों के बैंक खातों में पैसा पहुंचाया. जब चुनाव करीब आए, तो इन योजनाओं का बजट और दायरा दोनों बढ़ा दिए गए. कांग्रेस महंगाई को मुद्दा बनाती रही, लेकिन ग्रामीण महिलाओं के लिए 'मामा' की ओर से आने वाली यह डायरेक्ट मदद एक बड़ा सहारा बन गई. इस फाइनेंशियल पावर ने हिमंत को घर-घर का सदस्य बना दिया और महिलाओं ने 'मामा' के नाम पर बीजेपी के पक्ष में जमकर वोटिंग की.

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'मियां' पॉलिटिक्स: अस्मिता की रक्षा और शार्प ध्रुवीकरण?

अगर 'मामा' शब्द में अपनापन था, तो 'मियां' शब्द का इस्तेमाल हिमंत ने एक धारदार हथियार की तरह किया. असम की डेमोग्राफी और बांग्लादेशी घुसपैठ एक पुराना और सेंसिटिव मुद्दा है. हिमंत बिस्वा सरमा ने इस मुद्दे पर 'नो कॉम्प्रोमाइज' वाली छवि बनाई. उन्होंने अपनी रैलियों में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में 'मियां पॉलिटिक्स' को टारगेट किया और इसे असमिया संस्कृति के लिए खतरा बताया.

हिमंत का यह नैरेटिव बहुत पावरफुल साबित हुआ कि "अगर अपनी जमीन और पहचान बचानी है, तो स्वदेशी लोगों को एकजुट होना होगा." उन्होंने मदरसों को बंद करने से लेकर लैंड जिहाद के खिलाफ सख्त स्टैंड लिया, जिसने हिंदू और स्वदेशी असमिया मतदाताओं को पूरी तरह बीजेपी की ओर शिफ्ट कर दिया. कांग्रेस इस पिच पर पूरी तरह क्लीन बोल्ड हो गई. कांग्रेस जैसे ही सेक्युलरिज्म की बात करती, बीजेपी उसे 'मियां तुष्टीकरण' का लेबल लगा देती. इस हाइपर लोकल पोलराइजेशन ने विपक्ष के वोटों के गणित को पूरी तरह बिगाड़ दिया.

विकास की डिलीवरी: जब 'मामा' बने 'टास्कमास्टर'
सिर्फ इमोशन और ध्रुवीकरण से जीत नहीं मिलती, जनता को रिजल्ट भी चाहिए. हिमंत ने खुद को एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जो 24/7 काम करता है. चाहे वह सड़कों का जाल बिछाना हो, नए मेडिकल कॉलेज खोलना हो या युवाओं को बिना रिश्वत के सरकारी नौकरियां देना हो, हिमंत का डिलीवरी सिस्टम बेमिसाल रहा.

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उनकी वर्किंग स्टाइल ऐसी है कि वह खुद आधी रात को स्पॉट पर जाकर सरकारी प्रोजेक्ट्स का मुआयना करते हैं. इस प्रोएक्टिव गवर्नेंस की वजह से असम में सत्ता विरोधी लहर जैसा कुछ नजर ही नहीं आया. लोगों को लगा कि 'मामा' काम भी कर रहे हैं और उनके हकों की रक्षा भी. कांग्रेस के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं था जो हिमंत की छवि का मुकाबला कर सके.

कांग्रेस के 'सेल्फ-गोल' और गौरव गोगोई की दूरी

कांग्रेस के लिए यह चुनाव हारने से ज्यादा 'जीत बीजेपी को तोहफे में देने' जैसा रहा. गौरव गोगोई, जो विपक्ष का मुख्य चेहरा थे, उनका ज्यादा समय दिल्ली की गलियारों में बीता. राहुल गांधी के साथ संसद में खूब दिखाई दिए. भाषण भी एक से बढ़कर एक दिए. लेकिन, जनता के बीच वे अपनी बात पहुंचाने में नाकाम रहे. उनकी जमीन पर मौजूदगी वैसी नहीं दिखी, जैसी हिमंत की थी. गौरव ने मुद्दे तो उठाए, लेकिन वे हिमंत के व्यक्तिगत करिश्मे के सामने फीके पड़ गए.

रही-सही कसर वोटिंग से ठीक पहले हुए पवन खेड़ा विवाद ने पूरी कर दी. कांग्रेस के कैंपेन में जब भी जान आने लगती, कोई न कोई ऐसा बयान आ जाता जिसे बीजेपी 'असम के अपमान' से जोड़ देती. इसके अलावा, AIUDF के साथ गठबंधन न करना कांग्रेस के लिए रणनीतिक तौर पर आत्मघाती रहा. अल्पसंख्यक वोट बंट गए और 'मियां' नैरेटिव की वजह से हिंदू वोट एकतरफा बीजेपी को मिल गए.

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असम में 'हिमंत युग' की मोहर

असम चुनाव 2026 के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि हिमंत बिस्वा सरमा ने राजनीति का एक नया व्याकरण लिखा है. उन्होंने 'डेवलपमेंट + पहचान + इमोशनल कनेक्ट' का ऐसा फॉर्मूला तैयार किया है जिसे क्रैक करना अब नामुमकिन लग रहा है. असम की महिलाओं के लिए वह प्यारे 'मामा' हैं, तो विरोधियों के लिए वह 'मियां पॉलिटिक्स' को ध्वस्त करने वाले एक अजेय योद्धा. बीजेपी की यह प्रचंड बहुमत वाली हैट्रिक सिर्फ मोदी लहर का नतीजा ही नहीं है, बल्कि यह हिमंत बिस्वा सरमा के उस माइक्रो-मैनेजमेंट की जीत है जिसने असम के हर घर में अपनी जगह बना ली है.

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