90 साल के एक मौलाना अगर महिलाओं को घर के भीतर रहने की सलाह दें, तो इसमें किसी को अचरज नहीं होना चाहिए. भारत के ग्रैंड मुफ्ती कांतापुरम एपी अबूबकर मुसलियार ने साफ समझाया है कि अगर औरतें सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखेंगी तो "बड़ा अनर्थ" होगा. इसलिए दीन उन्हें पर्दे और घर के अंदर रहने की हिदायत देता है.
इसके बाद उनके संगठन से फरमान आया कि औरतों को मर्दों के साथ मंच साझा नहीं करना चाहिए और न ही सार्वजनिक जगहों पर उनके बगल में दिखना चाहिए. तसल्ली के लिए उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि यह सब औरतों के 'सम्मान' के लिए किया जा रहा है.
ये वही साहब हैं जिन्होंने कभी हमें बताया था कि औरत-मर्द की बराबरी गैर-इस्लामी और इंसानियत के खिलाफ है. उनके मुताबिक औरतें सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए बनी हैं और वे आपको बड़ी सर्जरी करते हुए नहीं दिखेंगी क्योंकि उनमें 'हिम्मत' की कमी होती है और वे सिर्फ बच्चों की डॉक्टर बनने लायक ही होती हैं.
अब असली समझने वाली बात यहां से शुरू होती है. साल 2022 में जब कर्नाटक ने स्कूल-कॉलेजों में हिजाब पर रोक लगाई थी, तब यही ग्रैंड मुफ्ती साहब 'औरतों की पसंद और आजादी' के सबसे बड़े पैरोकार बन गए थे. उन्होंने इस बैन को भेदभाव बताया था और मांग की थी कि सरकार इसमें दखल न दे. तब उन्होंने "मेरा हिजाब, मेरी मर्जी" का खुलकर समर्थन किया था.
इसका मतलब ये कि जब औरत उनके कहने पर खुद को ढक ले, तब तो यह उसकी 'पसंद' है. लेकिन जब वही औरत घर के दरवाजे से बाहर कदम रखना चाहे, तो कोई 'पसंद' नहीं. जब पर्दा करना हो तो संविधान को ढाल बना लो और जब औरत खुली हवा में सांस लेना चाहे तो उसी संविधान को छुट्टी पर भेज दो. ये हैं मुफ्ती साहब जो अपनी इस दोहरी बात में भी बिल्कुल साफ और अपने इरादों को लेकर एकदम ईमानदार.
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शर्मिंदगी तो उन लोगों के रवैये पर होती है जो खुद को इनका समर्थक कहते हैं और अपने ही मजहब का हवाला देते हैं, वो भी गलत तरीके से. मैंने कई लोगों को देखा- आरजे से लेकर फेमिनिस्ट पत्रकारों तक, और इतिहासकारों से लेकर किस्से-कहानियां सुनाने वालों तक- जो मुफ्ती साहब पर इसलिए गुस्सा हो रहे थे क्योंकि उन्होंने औरतों और उनके घर-पर्दे में रहने को लेकर मजहबी नजरिया रख दिया.
संविधान का अनुच्छेद 25 हर इंसान को अपनी आस्था के हिसाब से जीने की आजादी देता है. अनुच्छेद 26 किसी भी धार्मिक समूह को अपने धार्मिक मामले खुद संभालने का हक देता है, और यही तो सबरीमाला वाले मामले की असली नींव थी. लेकिन संविधान किसी मौलाना को यह तय करने का हक नहीं देता कि मुस्लिम होने का सिर्फ एक ही सही तरीका है और हर औरत को उसी से बांध दिया जाए.
संविधान धर्म को मानने वाले व्यक्ति को यह छूट देता है कि वह जिस तरह चाहे अपने धर्म का पालन करे और जैसा समझे वैसा समझे. मुसीबत तब शुरू होती है जब कोई आदमी आकर यह ऐलान कर देता है कि धर्म का यही नियम है और औरत इसे किसी दूसरे तरीके से नहीं देख सकती. यह धर्म की आजादी नहीं है.
लेकिन जो लोग यह कह रहे हैं कि "यह तो मजहब का हिस्सा ही नहीं है", वे बात को बहुत दूर खींच रहे हैं. मुफ्ती साहब को अपने मामलों की अच्छी समझ है. आपने गूगल या Sunnah.com से जो दो-चार आयतें पढ़ी हैं, वे अपनी पूरी जिंदगी उसी पर सोच-विचार करने में बिता चुके हैं. एक मौलाना होने के नाते, उनके पास अपने मानने वालों को रास्ता दिखाने का अधिकार है.
यह तर्क पूरी तरह गलत साबित होता है कि वे मजहब की गलत व्याख्या कर रहे हैं. हां, यह तर्क बिल्कुल सही है कि संविधान महिलाओं को यह अधिकार देता है कि वे मजहबी बातों का जैसा चाहें वैसा अर्थ निकालें. इसलिए समर्थकों को संविधान वाले तर्क का सहारा लेना चाहिए. लेकिन हमारे देश के "प्रोफेशनली सेक्युलर" संविधान की धारा से काम चलाने के बजाय धर्मग्रंथों से ही हर बात पर मुहर लगवाना चाहते हैं. वे दो ऐसी चीजों के बीच जबरन तालमेल बिठाने की कोशिश करते हैं, जिनके बीच कोई तालमेल है ही नहीं.
इन पेशेवर धर्मनिरपेक्ष लोगों को जरा ध्यान से देखिए. जब कोई पाबंदी इनकी पसंद की होती है, तो ये 'माय बॉडी, माय चॉइस' (मेरा शरीर, मेरी मर्जी) पर 40 मिनट का लंबा भाषण दे डालेंगे. लेकिन जैसे ही वही मजहबी व्यवस्था यह कह दे कि औरतें सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए बनी हैं, तो अचानक इनकी आवाज ही बंद हो जाती है.
जब हिजाब की बात आए तो इसे औरत की अपनी मर्जी और सरकार के खिलाफ विरोध का नाम दे दिया जाता है. लेकिन जब उसी औरत को चार दीवारों में बंद करने की बात आए, तो कह देते हैं- 'अरे, मुफ्ती साहब ने बात को गलत समझ लिया.' इनके लिए नियम या सिद्धांत कभी मायने रखते ही नहीं थे. 'आजादी' या 'पसंद' इनके लिए कोई जीवन मूल्य नहीं है, बल्कि एक ऐसा पहनावा है जिसे वे शाम के माहौल के हिसाब से बदल लेते हैं.
इंडिया हैबिटेट सेंटर में ये मॉडर्न कपड़ों में दिखेंगे, और जब स्कूल में यूनिफॉर्म के खिलाफ प्रदर्शन करना हो तो अचानक हिजाब के समर्थक बन जाएंगे.
और इसके बाद आता है सबसे चालाकी भरा तर्क. जब औरतों को घरों में बंद रखने की बात का बचाव करना नामुमकिन हो जाता है, तो ये लोग इतिहास के पन्नों से पैगंबर साहब का जिक्र ले आते हैं और उन्हें दुनिया का पहला 'फेमिनिस्ट' बताने लगते हैं, जिन्होंने औरतों को उनके अधिकार दिए. लेकिन न तो इतिहास इस बात को मानता है और न ही मुफ्ती साहब का फरमान.
सातवीं सदी के अरब की कुछ कुप्रथाओं को सुधारने की बात सही है. जैसे जायदाद में हिस्सा देना या बेटियों को जिंदा दफनाने पर रोक लगाना. लेकिन यह आज के दौर का फेमिनिज्म नहीं था. और न ही यह कोई ऐसी अंतिम सीमा थी कि 14 सदियों बाद भी पूरा समाज उसी पुरानी चौखट के नीचे सिमट कर बैठा रहे और उस शुरुआती कदम को ही आखिरी मंजिल मान ले.
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फिर अपनी बात पर पक्की मुहर लगाने के लिए वे हजरत खदीजा (रजि.) का नाम आगे कर देते हैं. हजरत खदीजा की शख्सियत इतनी महान थी कि उनके हवाले से कुछ कहने वाले पुरुषों के दावों की धज्जियां उड़ जाती हैं. उस जमाने का अरब कोई औरतों के लिए जन्नत नहीं था. वहां बेटियों को दफनाया जाता था, लेकिन साथ ही किसी विधवा को जायदाद मिलने या किसी औरत को अपना कारोबार खड़ा करने की भी छूट (चाहे जैसे-तैसे ही सही) मिल जाती थी.
कारोबारी घराना उनका अपना था, सीरिया जाने वाले काफिले उनके थे, और उस नौजवान (पैगंबर साहब) को भी तनख्वाह वही देती थीं, जिन्हें उन्होंने काम पर रखा था. यह सब कुछ उनकी दौलत थी. उनका रुतबा. एक औरत का खुद फैसले लेने का साहस, जो इस्लाम के आने से सालों पहले का था.
जिस दौर को बाद में 'जाहिलियत' यानी अज्ञानता का दौर कहा गया, उस दौर में एक ऐसी औरत सामने आई जिसने अपनी मेहनत से कारोबारी साम्राज्य बनाया और पुरुषों को काम पर रखा. जबकि उसके बाद आए तथाकथित 'उजाले' ने एक ऐसा फरमान जारी कर दिया जो उनकी पोतियों को घर में ही बंद रहने की हिदायत देता है.
जिस हजरत खदीजा को ये लोग अपनी शान के सबूत के तौर पर पेश करते हैं, वे एक ऐसी महिला थीं जिन्हें इस मुफ्ती का फतवा सीधे घर में बिठा देता. उन्हें उसी मंच पर आने से रोक दिया जाता जहां ये लोग उनका नाम चिल्ला-चिल्लाकर लेते हैं. वे इन लोगों के पक्ष का सबूत नहीं हैं, बल्कि उनके खिलाफ सबसे बड़ी गवाह हैं.
दूसरी गवाह हैं हजरत आयशा (रजि.), जो जंग के मैदान में उतरीं और पैगंबर साहब की बातों की सबसे बड़ी जानकार बनीं. लेकिन कुछ ही पीढ़ियों के भीतर ऐसी महिलाओं को 'अनोखा अपवाद' मानकर किनारे कर दिया गया. ऐसी मिसालें, जिन्हें सिर्फ किताबों में दोहराया जा सकता है, लेकिन जिन पर अमल करने की इजाजत किसी को नहीं है. मजहब की चाबी उन उलेमाओं के हाथ में चली गई जो जन्नत का रास्ता बेचते हैं और फैसले अपने पास रखते हैं.
और इससे पहले कि भगवा खेमा कांतापुरम के इस कदम को 'मध्यकालीन सोच' कहकर बहुत ज्यादा तालियां बजाने लगे, उन्हें भी एक बात याद दिला दी जाए. यह वही केरल है जहां जब कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर के दरवाजे महिलाओं के लिए खोले थे, तो एक पूरे गुट ने महिलाओं को बाहर रखने को ही 'पवित्र परंपरा' बता दिया था. भगवान भले अलग हों, लेकिन सोच और दरवाजा वही है.
औरत एक ऐसी समस्या है जिससे निपटने का सबसे अच्छा तरीका उसे बाहर ही रखना है. भगवा साधुओं ने भी केरल में बिल्कुल वैसे ही फरमान जारी किए हैं जैसे मुफ्ती साहब ने दिए हैं. गुस्सा इस बात पर होना चाहिए कि गलत क्या है, न कि इस बात पर कि सामने वाला किस भगवान की पूजा करता है. इसे बहुत से लोग 'संतुलन बनाने की कोशिश' (मंकी-बैलेंसिंग) कहकर खारिज कर देंगे. लेकिन कड़वे सच से आंखें मूंद लेना भी एक ऐसी पसंद है जिसकी इजाजत संविधान सबको देता है.
सच तो यह है कि सारे मजहबों की शुरुआत उस दौर में हुई थी जब औरतों को जायदाद या संपत्ति माना जाता था. जब पुरुषों में संपत्ति और मालिकाना हक की भावना जागी, तो वंश आगे बढ़ाने के लिए औरतों को सुरक्षा में रखने की जरूरत महसूस हुई. औरतें तब कमजोर थीं और उनके साथ हिंसा आसान थी, उन्हें मवेशियों की तरह चुरा लिया जाता था. इसीलिए यह सुरक्षा का ताना-बाना बुना गया. जैसे-जैसे मजहबी किताबें लिखी गईं, इन्हें नियम बना दिया गया. वक्त के साथ नियम बदले, कुछ समाजों में यह बदलाव धीमा रहा तो कुछ में तेज.
इसी सदी में, जब नए देश बने और संवैधानिक नैतिकता ही देश चलाने का नियम बनी, ज्यादातर देशों ने मजहबी फरमानों को दरकिनार कर दिया है. कुछ देश आज भी तालमेल बिठाने के लिए जूझ रहे हैं, तो कुछ अब भी मध्यकाल के अंधेरे में जी रहे हैं. अफगानिस्तान इसका जीता-जागता उदाहरण है. वहां औरतों को घर की चार दीवारों में धकेल दिया गया है और दुनिया के मर्द इस अन्याय को न देखने का नाटक कर रहे हैं. क्योंकि, आखिर हमें किसी देश की संप्रभुता और उसके मजहब का 'सम्मान' जो करना है!
जब फेमिनिज्म की बात आती है, तो हर कोई अपनी शर्तों पर सौदा कर रहा होता है. लेकिन मोटे तौर पर नियम यही है- शरीर भले उसका हो, मर्जी पुरुष की चलेगी. घर भले उसका हो, फरमान पुरुष का चलेगा. हक उसे पूरे मिलेंगे, लेकिन 'उपलब्धता के आधार पर'.
90 साल के बुजुर्ग मुफ्ती तो सिर्फ एक बहाना हैं. आज जो लोग उनका विरोध कर रहे हैं, कल उनका बचाव करने लगेंगे, अगर मुफ्ती कोई ऐसा पॉलिटिकल स्टैंड ले लेंगे जो प्रोफेशनल सेकुलरों के फायदे वाला हो.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)