कर्नाटक के कन्नड़ और संस्कृति मंत्री शिवराज एस. तंगडागी ने राज्य में काम कर रहे सभी बैंकों से कन्नड़ में सेवाएं देने और भर्ती के दौरान कन्नड़ भाषा जानने वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने की मांग की है.
तंगडागी ने कहा कि कर्नाटक में काम करने वाले हर बैंक की जिम्मेदारी है कि वह कन्नड़ लोगों से कन्नड़ में बातचीत करे और कारोबार करे. उन्होंने इसे उनका भाषाई अधिकार बताया. बैंक ऑफ बड़ौदा के स्थानीय भाषा जानने वाले अधिकारियों की नियुक्ति के फैसले का स्वागत करते हुए उन्होंने इस कदम के लिए अभियान चलाने वाले कन्नड़ संगठनों और स्थानीय लोगों को बधाई दी.
उन्होंने अन्य बैंकों से भी इसी तरह कदम उठाने की अपील की. साथ ही, केंद्रीय वित्त मंत्रालय से कर्नाटक में भर्ती नियमों में कन्नड़ बोलने वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने का प्रावधान करने की मांग की.
हर संस्था का कर्तव्य है
तंगडागी ने कहा कि कन्नड़ लोगों को अपनी ही जमीन पर बैंकिंग या किसी अन्य सेवा का इस्तेमाल करते समय भाषा की बाधा का सामना नहीं करना चाहिए. कन्नड़ में सेवाएं हासिल करना उनका अधिकार है और यह सुनिश्चित करना हर संस्था का कर्तव्य है. उन्होंने कहा कि यह मांग सिर्फ रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि कन्नड़ लोगों के भाषाई अधिकार और आत्मसम्मान से जुड़ी है.
कर्नाटक में भाषा को लेकर व्यापक अभियान
तंगडागी का बयान कर्नाटक में प्रशासन और कारोबार में कन्नड़ के इस्तेमाल को बढ़ाने की व्यापक कोशिशों के बीच आया है. सरकार ने कर्नाटक आधिकारिक भाषा अधिनियम, 1963 के तहत अपने कार्यालयों को आधिकारिक पत्राचार, आदेश, फाइल नोटिंग और सार्वजनिक सूचनाओं में कन्नड़ का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया है. हालांकि, केंद्र सरकार, अन्य राज्यों और न्यायपालिका के साथ होने वाले संवाद को इससे छूट दी गई है. कन्नड़ विकास प्राधिकरण ने कई विभागों में अंग्रेजी के लगातार इस्तेमाल की जानकारी दी है. सरकार ने नियमों का पालन नहीं करने वाले अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी है.
व्यावसायिक साइनबोर्ड पर कन्नड़
बेंगलुरु में व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को अपने साइनबोर्ड की 60 फीसदी जगह कन्नड़ के लिए आरक्षित करनी होगी. इस व्यवस्था को कर्नाटक विधानसभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित कानून का समर्थन प्राप्त है.
इसके समर्थकों का कहना है कि कन्नड़ की रक्षा और राज्य की भाषा में सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए ऐसे कदम जरूरी हैं. हालांकि, आलोचकों ने जबरन लागू किए जाने वाले प्रावधानों और निजी क्षेत्र की भर्ती में भाषा के आधार पर प्राथमिकता की मांग पर आपत्ति जताई है. उनका तर्क है कि कन्नड़ को बढ़ावा देने से दूसरी भाषाओं के इस्तेमाल या रोजगार के लिए लोगों की आवाजाही पर रोक नहीं लगनी चाहिए.