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टूटते रिश्तों की खौफनाक कहानियां और जान देकर कीमत चुकाते बच्चे

पति-पत्नी के झगड़े, शक, घरेलू हिंसा, आर्थिक तंगी और टूटते रिश्तों की कीमत अबोध बच्चे चुका रहे हैं. बेंगलुरु, हरियाणा, केरल और आंध्र प्रदेश की हालिया घटनाएं बताती हैं कि परिवार के भीतर का संकट कैसे बच्चों को ‘कोलेटरल डैमेज’ बना रहा है. मामला किसी जाति, धर्म, आर्थिक वर्ग या शिक्षा का नहीं, बल्कि उस सोच का है जिसमें बच्चे भी बड़ों के फैसले की सजा भुगतते हैं.

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ये तस्वीर है हरियाणा की रहने वाली आंगनवाड़ी वर्कर सुबोध और उसके दो बच्चों की, जिसमें महिला ने घर के कलह से तंग आकर अपनी तो जान दी है, पहले बच्चों की जान ले ली. (Photo: Jitender)
ये तस्वीर है हरियाणा की रहने वाली आंगनवाड़ी वर्कर सुबोध और उसके दो बच्चों की, जिसमें महिला ने घर के कलह से तंग आकर अपनी तो जान दी है, पहले बच्चों की जान ले ली. (Photo: Jitender)

पारिवारिक कलह को नजरअंदाज करने की पुरानी कहावत है- ‘घर में दो बर्तन होंगे तो टकराएंगे ही’. लेकिन, अब ये दो बर्तन जब टकरा रहे हैं तो चार बर्तन टूट रहे हैं. पति-पत्नी के बिखरते रिश्तों में अबोध बच्चे पिस रहे हैं. जान गंवा रहे हैं.

पति-पत्नी के झगड़े में अब तक पीढ़ी दर पीढ़ी यही समझाया गया कि- घर है, थोड़ा बहुत तो चलता है. आज लड़ेंगे, कल मान जाएंगे. रिश्ते हैं तो खटास भी होगी. लेकिन अब बात सिर्फ इतनी सी नहीं रह गई है.

मंगलवार सुबह कर्नाटक के कलबुर्गी में पत्नी से परेशान एक शख्स के सिर पर मौत सवार हो गई. पति से अलग होकर पत्नी तीन बच्चों के साथ मायके में रह रही थी. और ये शख्स सब कुछ खत्म करने की नीयत से कमर में विस्फोटक जेलेटिन की छड़ें बांधकर उसके घर पहुंच गया. भीतर आकर दरवाजा बंद किया, और खुद को उड़ा लिया. विस्फोट से 15 की बेटी की भी मौत हो गई. जबकि पत्नी और बेटा जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं.

अब आप ही बताइए कि इस घर की कलह में बच्चों का अपराध क्या था? उन्हें किस बात की सजा मिली?

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इससे एक दिन पहले बेंगलुरु के फाइव स्टार होटल के एक कमरे में मौत का मंजर था. 10 अगस्त को 40 साल के एसजी इमरान ने अपनी दो बेटियों की गला दबाकर हत्या कर दी. एक 10 साल की थी और दूसरी 5 साल की. कैब सर्विस कंपनी में मैनेजर रहे पिता ने गला रेंतकर खुद की भी जान लेने की कोशिश की. पुलिस के मुताबिक कमरे से मिले नोट में पत्नी की बेवफाई का जिक्र है.

इस कहानी में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पति-पत्नी के बीच क्या हुआ था. वह जांच का विषय है. असली सवाल यह है कि दो वयस्कों के बीच जो कुछ भी हुआ, उसकी सजा पांच और दस साल की दो बच्चियों को क्यों मिली?

वे न पत्नी थीं, न पति. न उन्हें किसी कथित अफेयर का पता था, न उस पर उनका कोई फैसला था. फिर भी किसी बड़े के गुस्से ने उनकी जिंदगी का फैसला कर दिया.

कुछ ही दिन पहले हरियाणा के फतेहाबाद से आई तस्वीर इससे भी ज्यादा डरावनी थी.

7 अगस्त को मेहुवाला गांव में 31 साल की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सुदेश और उसके 10 साल के बेटी ज्योति और 8 साल के बेटे विनीत के शव घर के पानी के टैंक से मिले. जांच में सामने आया कि सुदेश ने बच्चों को जहर दिया और फिर खुद भी जहर खाया. इसके बाद तीनों पानी के टैंक में चले गए. सुदेश ने खुद अपने फोन पर इस पूरे वाकये को रिकॉर्ड किया, जिसमें वह बच्चों को जहरीला पदार्थ पिलाती दिखाई देती है.

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पुलिस की जांच में पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद की बात सामने आई है. 2014 में दोनों ने लव-मैरेज किया था, लेकिन सुदेश के भाई ने बताया कि बाद में पति नशा करने लगा था और फिर परिवार को प्रताड़ित कर रहा था. पति को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया है. पुलिस अब इन आरोपों की जांच कर रही है. वजह चाहे जो हो, बच्चों के लिए नतीजा एक ही था. वे उस लड़ाई में शामिल नहीं थे. फिर भी लड़ाई ने उन्हें निगल लिया.

अब केरल चलिए.

जून के आखिरी हफ्ते में मुवत्तुपुझा नदी में पहले एक महिला और उसके दो साल के बेटे के शव मिले. अगले दिन महिला के पति का शव भी बरामद हो गया. और उसके अगले परिवार की सात वर्षीय बड़ी बेटी, जो दूसरी कक्षा में पढ़ती थी, उसकी लाश भी नदी से ही मिली. ये परिवार गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था. पुलिस ने उसके रहने का कुछ इंतजाम भी किया था, और कुछ खर्च स्थानीय चर्च से मिल रहा था. लेकिन, परिवार ने हिम्मत हार दी.

यहां कहानी में न कोई कथित प्रेम प्रसंग था, न वैवाहिक शक. यहां पैसे की कमी थी. लेकिन नदी में मिली लाशों में सात और दो साल के बच्चे भी थे.

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यानी वजह बदल गई, बच्चा फिर भी मर गया.

आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में 22 जून को एक परिवार के चार लोगों की मौत ने यही सवाल फिर सामने खड़ा कर दिया. बांगेरेड्डीपल्ली गांव में दामोदर, उनकी पत्नी निर्मला और उनके दो बच्चे मृत मिले. बेटा दिलीप आठवीं कक्षा में और बेटी श्रीविद्या छठी कक्षा में पढ़ती थी. पुलिस के मुताबिक दामोदर ने पत्नी और बच्चों को जहर दिया और बाद में खुद फांसी लगा ली. मौके पर मिले संदेश में अंतिम संस्कार के लिए बैंक में रखे पैसे इस्तेमाल करने की बात थी. जांच में पत्नी की बीमारी और उससे जुड़ा तनाव सामने आया.

फिर वही सवाल- पत्नी बीमार थी. पति परेशान था. घर संकट में था. लेकिन बच्चों ने क्या किया था? कुछ नहीं.

'कोलेटरल डैमेज'

इन तमाम घटनाओं की सबसे डरावनी समानता है- बड़ों की जिंदगी में पैदा हुए संकट का बच्चों की मौत का कारण बन जाना. बल्कि, यूं कहें कि बच्चों की हत्या का कारण बन जाना.

इसे सिर्फ 'आत्महत्या' कहकर आगे बढ़ जाना भी कहानी को अधूरा छोड़ देना है.

क्योंकि यहां बच्चे सिर्फ मर नहीं रहे. उन्हें दर्दनाक मौत मारा जा रहा है. एक ऐसे गुनाह के लिए जो उन्होंने किया ही नहीं. कहीं उन्हें जहर दिया गया. कहीं गला दबाया. कहीं उन्हें अपने साथ पानी में ले डूबे. उन्हें कहीं पिता ने मारा तो कहीं पत्नी ने. बच्चों को जिंदगी देने वालों ने उनकी मौत का भी फैसला कर दिया.

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बच्चे अब सिर्फ परिवार के सदस्य नहीं रह गए हैं. वे पति-पत्नी के रिश्ते के टूटने का 'कोलेटरल डैमेज' बनते जा रहे हैं. यह शब्द युद्ध में इस्तेमाल होता आया है. दो पक्ष लड़ते हैं और बीच में वे लोग मारे जाते हैं, जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं होता.

पति-पत्नी लड़ रहे हैं. वजह अलग-अलग है. शक हो सकता है, घरेलू हिंसा हो सकती है, पैसे की तंगी हो सकती है, बीमारी हो सकती है, नशा हो सकता है या रिश्ता टूटने की कगार पर हो सकता है. लेकिन उस लड़ाई की सीधी चोट बच्चों पर पड़ रही है.

इन परिवारों को एक ही आर्थिक, सामाजिक, जातीय या धार्मिक खाने में नहीं रखा जा सकता. यह भी नहीं कहा जा सकता कि यह सिर्फ अनपढ़ परिवारों की समस्या है.

असल संकट कहीं और है

न्यूक्लियर परिवारों की सबसे बड़ी ताकत उनकी आजादी है. लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी. पहले परिवार बड़े थे. हर बात अच्छी होती थी, ऐसा नहीं था. उनमें दखल भी था, दबाव भी था और कई बार गलत परंपराएं भी थीं. लेकिन घर में संकट आने पर कोई न कोई बीच में पड़ जाता था. दादा, दादी, चाचा, मामा, पड़ोसी- कोई दरवाजा खटखटा देता था.

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अब सारे दरवाजे बंद हैं. अंदर झगड़ा है. बाहर किसी को पता नहीं. और जब दरवाजा खुलता है तो कहानी खत्म हो चुकी होती है.

हर पति-पत्नी का झगड़ा पुलिस का मामला नहीं है. हर पारिवारिक विवाद में पड़ोसियों का घुसना भी जरूरी नहीं है. लेकिन जब झगड़ा रोज का हो जाए, हिंसा शुरू हो जाए, बच्चों के सामने धमकियां दी जाने लगें, कोई बार-बार कहे कि वह खुद को या बच्चों को खत्म कर देगा, या घर में कोई अचानक असामान्य तरीके से व्यवहार करने लगे तब इसे 'घर की बात' कहकर छोड़ना खतरनाक है.

सबसे पहले यह समझना होगा कि बच्चा किसी पति-पत्नी के रिश्ते की संपत्ति नहीं है. शादी टूट सकती है. रिश्ता टूट सकता है. भरोसा टूट सकता है. घर टूट सकता है. लेकिन बच्चे की जिंदगी नहीं टूटनी चाहिए. शायद अब उस पुराने मुहावरे को भी बदलने का समय आ गया है- 'घर में दो बर्तन होंगे तो टकराएंगे ही'. क्योंकि दो बर्तन टकरा रहे हैं, तो चार क्यों टूट रहे हैं. पति-पत्नी की वजह से बच्चे क्यों मर रहे हैं?

(सुसाइड का ख्याल एक गंभीर मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम है. यदि आपका कोई नजदीकी ऐसे ख्याल से गुजर रहा है, तो तुरंत मदद करें. भारत सरकार की 'जीवन आस्था' हेल्पलाइन नंबर 1800 233 3330 पर कॉल करें. आपकी मदद से एक नहीं, कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं.)

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