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महायुति में नो एंट्री... फडणवीस क्या सीरियस हैं या सिर्फ पार्टी की छवि सुधार रहे हैं?

देवेंद्र फडणवीस का ताजा बयान के बाद महाराष्ट्र 'ऑपरेशन लोटस' जैसी आशंकाओं पर तत्काल प्रभाव से विराम लग गया है. अव्वल तो यह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का छवि सुधार कार्यक्रम ही लगता है, लेकिन तब क्या होगा जब दिल्ली से कोई फरमान आ गया? जैसे एक बार डिप्टी सीएम बनना पड़ा था.

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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार और उद्धव ठाकरे. (Photo: PTI)
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार और उद्धव ठाकरे. (Photo: PTI)

देवेंद्र फडणवीस ने महायुति में किसी भी नए राजनीतिक दल के लिए नो एंट्री का बोर्ड लगा दिया है. महायुति महाराष्ट्र में सत्ताधारी गठबंधन है. बीजेपी के साथ महायुति में फिलहाल एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की पार्टी एनसीपी शामिल है. बीजेपी के देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री हैं. साथ ही, एकनाथ शिंदे और एनसीपी-एपी की सुनेत्रा पवार डिप्टी सीएम हैं. 

आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और फिर शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों और विधायकों का बीजेपी की ओर बहाव राजनीतिक विश्लेषकों को स्वाभाविक नहीं लगा है. ऑपरेशन लोटस की हेडलाइनों का दबाव बीजेपी में भी महसूस हो रहा है. देवेंद्र फडणवीस का स्टैंड तो यही बता रहा है. महाराष्ट्र में तो ऑपरेशन टाइगर भी सफल हो चुका है. महाराष्ट्र बीजेपी में नेताओं का एक तबका यह भी मानता है कि देवेंद्र फडणवीस के लेटेस्ट स्टैंड के पीछे बीजेपी के संगठन को मजबूत और सुरक्षित रखना भी एक बड़ी वजह है. 

2019 में जब उद्धव ठाकरे और बीजेपी नेतृत्व के बीच टकराव जोर पकड़ने लगा तो देवेंद्र फडणवीस एक बार नागपुर में संघ मुख्यालय पहुंचे थे. तब जो खबर आई थी, उसके मुताबिक संघ की सलाह थी कि उद्धव ठाकरे जो चाहें करें, लेकिन बीजेपी को तोड़फोड़ में शामिल नहीं होना चाहिए. फिर भी देवेंद्र फडणवीस ने अचानक बागी बने अजित पवार को साथ लेकर देर रात फैसला किया, और सुबह सुबह मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली थी. 72 घंटे में ही फिर से पूर्व मुख्यमंत्री हो गए थे. और, उसके बाद 2022 में एक्टिव हुए, और एकनाथ शिंदे ने बगावत कर दी. बीजेपी गठबंधन की सरकार तो बन गई, लेकिन देवेंद्र फडणवीस को डिप्टी सीएम बनना पड़ा था - 2024 की बंपर चुनावी जीत के साथ देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन बहुत कुछ दांव पर ही लगा हुआ है. 

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महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों में से बीजेपी के 132 विधायकों के दम पर देवेंद्र फडणवीस बेहद मजबूत स्थिति में हैं, लेकिन एकनाथ शिंदे के साथ शीत युद्ध खत्म नहीं हो रहा है. ऊपर से शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों और विधायकों के साथ आ जाने से एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र से ज्यादा दिल्ली में मजबूत हो चुके हैं.

पार्टी का विस्तार अपनी जगह है, लेकिन महाराष्ट्र बीजेपी के नेताओं का मानना है कि अपने ही विधायकों की अपेक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं को संभालना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है - ऐसे हालात में लगता है महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस कोई बीच का रास्ता अख्तियार कर चलने की कोशिश कर रहे हैं. 

देवेंद्र फडणवीस क्यों कह रहे हैं महायुति में नो एंट्री की बात?

दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने तमाम अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि महायुति में और किसी सहयोगी दल को शामिल करने की बीजेपी की कोई योजना नहीं है. बोले, महाराष्ट्र बीजेपी अब किसी नए सहयोगी दल को साथ नहीं जोड़ेगी. हमने नए दलों के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं. ऐसी सारी बातें बेबुनियाद हैं कि हम शरद पवार की पार्टी एनसीपी (एसपी) को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

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देवेंद्र फडणवीस का यह बयान ऐसे वक्त आया है, जब ऐसी जोरदार चर्चा थी कि मॉनसून सत्र में शरद पवार के सांसद साथ छोड़ सकते हैं, ताकि एनडीए सरकार के प्रस्तावित विधेयकों को पास कराने की राह आसान हो सके. खबर यह भी थी कि एनसीपी (एसपी) के एक वरिष्ठ नेता मुंबई में बीजेपी के बड़े नेताओं से मिलकर एनडीए में शामिल होने की संभावना टटोल रहे थे. लेकिन, दिल्ली में देवेंद्र फडणवीस के सियासी तस्वीर साफ करते ही, मुंबई में महाराष्ट्र बीजेपी अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने साथी नेताओं को साफ हिदायत दी है कि वे दूसरी पार्टियों के नेताओं को किसी तरह का आश्वासन न दें. 

सूत्रों के हवाले से आई इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, शिवसेना (यूबीटी) के कम से कम दो नेताओं ने पहले बीजेपी से संपर्क किया था, लेकिन पार्टी ने उन्हें शामिल करने से इनकार कर दिया. लिहाजा बाद वे एकनाथ शिंदे के साथ चले गए. एनसीपी (एसपी) के भी कुछ नेताओं की तरफ से आए ऐसे प्रस्तावों को भी बीजेपी ने ठुकरा दिया है. 

हाल ही में, उद्धव ठाकरे के 6 लोकसभा सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हुए थे, जिसे महाराष्ट्र की अनौपचारिक राजनीतिक चर्चाओं में ऑपरेशन टाइगर नाम दिया गया था. रिपोर्ट के अनुसार, 'ऑपरेशन टाइगर' के दौरान भी महाराष्ट्र बीजेपी के सीनियर नेता पूरे घटनाक्रम को लेकर खास उत्साहित नहीं थे. उनका मानना था कि ऐसी घटनाएं सरकार के कामकाज से लोगों का ध्यान हटाकर दलबदल की तरफ मोड़ देती हैं. साथ ही, लोकसभा में एकनाथ शिंदे के सांसदों की संख्या 7 बढ़कर 13 पहुंच गई, और दिल्ली में उनकी राजनीतिक हैसियत स्वाभाविक तौर पर बढ़ गई.

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इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बीजेपी के एक सीनियर नेता का कहना था, जब दूसरे दलों के नेता बीजेपी में शामिल होते हैं, तो हर कोई मान लेता है कि यह सत्ता से जुड़ा राजनीतिक समझौता होता है. ऐसे नेताओं को जगह देने की कीमत अक्सर पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को चुकानी पड़ती है. पहले हम ऐसे नेताओं को शामिल करने को बीजेपी के विस्तार का हिस्सा बताकर सही ठहरा सकते थे. लेकिन अब, जबकि हम विधानसभा में सबसे बड़े दल हैं, स्थानीय निकायों में भी हमारा मजबूत संगठन है, फिर तो हमारा ध्यान अब संगठन को अंदर से और मजबूत करने पर होना चाहिए.

शरद पवार वाया दिल्ली महायुति में आ गए तो?

सूत्रों के मुताबिक, महाराष्ट्र बीजेपी के नेताओं का का मानना है कि अगर शरद पवार गुट के नेताओं को पार्टी में शामिल किया गया, तो डिप्टी सीएम सुनेत्रा पवार भी नाराज हो सकती हैं, और बीजेपी की राजनीतिक रणनीति पर भी असर हो सकता है. बीजेपी के सूत्रों का मानना है कि सांसदों और विधायकों को बीजेपी में शामिल किए बिना भी तो एनसीपी (एसपी) का मुद्दों के आधार पर समर्थन हासिल किया जा सकता है. 

साल की शुरुआत में हुए स्थानीय निकाय चुनावों को याद करें, तो बीजेपी जिला और तहसील स्तर पर लगातार सदस्यता कार्यक्रम चला रही थी, और विपक्षी दलों के स्थानीय नेताओं को पार्टी में शामिल किया जा रहा था. उस लिहाज से देखें तो महायुति में किसी नए पार्टनर को शामिल न किए जाने का फैसला बिल्कुल अलग लगता है. महाराष्ट्र बीजेपी की कोर कमेटी के एक सदस्य का इंडियन एक्सप्रेस से कहना था, हमें चौथे या पांचवें सहयोगी की जरूरत नहीं है. गठबंधन में तीन दल ही कई बार काफी होते हैं. फिर अलग से बोझ क्यों ढोया जाए?

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बेशक देवेंद्र फडणवीस दिल्ली में अमित शाह से मुलाकात के बाद दूसरे दलों के नेताओं के लिए नो एंट्री की बात कर रहे हैं, लेकिन शरद पवार का अपना अलग प्रभाव है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके बड़े ही अच्छे रिश्ते हैं. राष्ट्रीय मुद्दों पर जब तब शरद पवार की राय को काफी तवज्जो मिलती है, और साइड इफेक्ट यह होता है कि गठबंधन साथी कांग्रेस नेतृत्व के लिए भी कुछ बोलते नहीं बनता - सवाल है कि तब क्या होगा, अगर शरद पवार दिल्ली में एनडीए के साथ हो गए, फिर देवेंद्र फडणवीस महायुति से एनसीपी (एसपी) को कैसे अलग रख पाएंगे?

⁠उद्धव ठाकरे का जब सबकुछ लुट गया, तो बीजेपी की नो एंट्री का क्या मतलब?

देश की राजनीति में हाल के तीन घटनाक्रम काफी महत्वपूर्ण रहे, नफा-नुकसान से प्रभावित चाहे जो भी हुआ हो. एक, आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों का बीजेपी में शामिल हो जाना. तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों का NCPI के रास्ते एनडीए के सपोर्ट में खड़े हो जाना. और, उद्धव ठाकरे के 6 सांसदों का एकनाथ शिंदे के साथ चले जाना. 

सांसदों के बाद आदित्य ठाकरे के करीबी माने जाने वाले सचिन अहीर का एकनाथ शिंदे के साथ चला जाना उद्धव ठाकरे के लिए एक और बड़ा झटका था. उद्धव ठाकरे खेमे में मचे हड़कंप के बीच मातोश्री में एक आपात बैठक बुलाई गई थी. बैठक के बाद शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने सोशल साइट X पर एक तस्वीर साझा करते हुए लिखा, मातोश्री पर उद्धव ठाकरे जी के नेतृत्व में सभी विधायकों की बैठक हुई. कोई चिंता की बात नहीं. ऑल इज वेल. सब ठीक है.

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उद्धव ठाकरे के पास 9 में से सिर्फ 3 सांसद ही बचे हैं, और 20 विधायक भी अभी साथ हैं. भला उद्धव ठाकरे के लिए देवेंद्र फडणवीस के नो एंट्री का कोई मतलब रह गया है क्या?

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