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दिल्ली में प्रदूषण रोकने के लिए ढेरों पाबंदियां, पर मजदूरों की रोजी का क्या?

दिल्ली में सर्दियों के प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार ने निर्माण गतिविधियों पर कई पाबंदियां लगाने का फैसला किया है. इसका मकसद हवा में धूल और प्रदूषण को कम करना है, लेकिन इन फैसलों का असर उन मजदूरों पर भी पड़ेगा, जिनकी रोजी-रोटी निर्माण कार्यों से चलती है. ऐसे में सवाल है कि प्रदूषण पर लगाम लगाने के साथ क्या मजदूरों की आय बचाने का भी कोई रास्ता निकाला जा सकता है?

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सर्दियों में दिल्ली-एनसीआर की हवा लगातार हो जाती है खराब. (Photo: ITG)
सर्दियों में दिल्ली-एनसीआर की हवा लगातार हो जाती है खराब. (Photo: ITG)

दिल्ली को सर्दियों में गैस चैंबर बनने से बचाने के लिए सरकार का समय रहते सक्रिय होना निश्चित रूप से स्वागत योग्य है. हर साल अक्टूबर-नवंबर आते ही दिल्ली-एनसीआर की हवा जहरीली होने लगती है और उसके बाद सरकारें आनन-फानन पाबंदियां लगाती हैं. इस बार दिल्ली सरकार ने पहले से तैयारी करते हुए 1 नवंबर से 31 जनवरी तक धूल पैदा करने वाले डिमोलिशन और खुले में होने वाले सिविल निर्माण कार्यों पर रोक लगाने का फैसला किया है. इसके अलावा 10 दिसंबर से 20 जनवरी तक निर्माण और डिमोलिशन गतिविधियों पर पूर्ण रोक रहेगी.

प्रदूषण से निपटने के लिए सख्त फैसले जरूरी हैं. दिल्ली की हवा किसी एक सरकार या किसी एक मौसम की समस्या नहीं है. हर साल सर्दियों में खराब होती हवा लाखों लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है. इसलिए सरकार यदि पहले से तैयारी करती है, निगरानी बढ़ाती है और प्रदूषण के स्रोतों पर कार्रवाई करती है तो उसका स्वागत होना चाहिए. लेकिन इस पूरी रणनीति का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर उतनी ही गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.

निर्माण गतिविधियों पर रोक का सीधा असर उन हजारों-लाखों मजदूरों पर पड़ता है, जिनकी रोजी-रोटी इसी काम पर निर्भर है. दिल्ली-एनसीआर में बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, राजस्थान और दूसरे राज्यों से आए बड़ी संख्या में श्रमिक निर्माण क्षेत्र में काम करते हैं. इनमें बहुत से ऐसे हैं जो रोज कमाते हैं और रोज अपने परिवार का खर्च चलाते हैं. उनके लिए चार महीने या डेढ़ महीने का निर्माण प्रतिबंध केवल किसी परियोजना के रुकने का सवाल नहीं, बल्कि घर के चूल्हे का सवाल है.

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इसलिए सवाल यह होना चाहिए कि क्या निर्माण रोकना ही प्रदूषण से निपटने का सबसे प्रभावी रास्ता है? दरअसल, निर्माण अपने आप में प्रदूषण का पर्याय नहीं है. निर्माण के दौरान धूल को नियंत्रित करने के लिए पहले से विस्तृत नियम और एसओपी मौजूद हैं. सड़क काटने और निर्माण गतिविधियों के लिए धूल रोकने के उपायों में पानी का छिड़काव, मिट्टी और निर्माण सामग्री को ढककर रखना, वाहनों को पूरी तरह ढककर चलाना, सड़क पर निर्माण सामग्री न डालना और धूल पैदा करने वाले क्षेत्रों को नियंत्रित रखना जैसी व्यवस्थाएं निर्धारित हैं.

फिर समस्या कहां है? समस्या काफी हद तक नियमों के पालन और निगरानी की है. यदि किसी निर्माण स्थल पर नियमित पानी का छिड़काव हो, निर्माण सामग्री को ढककर रखा जाए, मलबे को खुले में न छोड़ा जाए, ट्रकों को ढककर चलाया जाए और सड़क पर गिरी मिट्टी को तत्काल साफ किया जाए तो धूल का फैलाव काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. केंद्रीय वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग यानी सीएक्यूएम ने भी इस साल फरवरी में माना था कि निर्माण और डिमोलिशन से पैदा होने वाली धूल प्रदूषण में लगातार योगदान देती है और निरीक्षणों में नियमों के अनुपालन में कमियां सामने आई हैं.

यानी कि बीमारी की पहचान सरकार को भी है और उसके इलाज के नियम भी मौजूद हैं. दिक्कत इलाज लागू कराने की है. दिलचस्प बात यह है कि नियमों के पालन की चुनौती केवल निजी बिल्डरों तक सीमित नहीं है. सरकारी एजेंसियां भी कई बार सड़क निर्माण और मरम्मत के दौरान वही सावधानियां नहीं बरत पातीं, जिनका पालन निजी निर्माण एजेंसियों से अपेक्षित होता है. सड़क खोद दी जाती है, मिट्टी और मलबा किनारे पड़ा रहता है, कई दिनों तक पानी का छिड़काव नहीं होता और निर्माण सामग्री खुले में पड़ी रहती है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सरकारी परियोजनाओं में ही धूल नियंत्रण के नियमों का पूरा पालन नहीं हो पाता तो केवल निजी निर्माण पर रोक लगाकर प्रदूषण की समस्या का समाधान कैसे होगा?

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दिल्ली सरकार ने निगरानी के लिए डस्ट पोर्टल और एआई आधारित कैमरों के इस्तेमाल की बात भी कही है. 500 वर्ग मीटर से बड़े निर्माण स्थलों की निगरानी के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. यह अच्छी पहल है. लेकिन तकनीक तभी प्रभावी होगी जब उससे मिलने वाली सूचना पर तत्काल कार्रवाई भी हो. कैमरा उल्लंघन पकड़ ले और अधिकारी कार्रवाई करने में कई दिन लगा दें तो तकनीक केवल प्रदर्शन बनकर रह जाती है.

सरकार के सामने असली चुनौती यही है. उसे प्रदूषण नियंत्रण को 'काम बंद करो' वाली नीति से आगे ले जाना होगा. जिन निर्माण स्थलों पर नियमों का पालन हो रहा है, उन्हें काम जारी रखने की अनुमति क्यों न दी जाए? और जो नियम तोड़ रहे हैं, उन पर भारी जुर्माना, काम बंद करने का आदेश और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही क्यों न तय की जाए? इससे नियम मानने वाले और नियम तोड़ने वाले के बीच स्पष्ट फर्क भी पैदा होगा.

हां, ऐसे क्षेत्रों में जहां प्रदूषण का खतरा असाधारण रूप से अधिक हो या जहां धूल नियंत्रण संभव न हो, वहां अस्थायी रोक उचित हो सकती है. लेकिन सामान्य परिस्थितियों में निर्माण बंद करना अंतिम उपाय होना चाहिए, पहला नहीं. खासकर तब, जब दिल्ली-एनसीआर में आवास, सड़क, मेट्रो, अस्पताल और दूसरी सार्वजनिक परियोजनाओं का काम लगातार चल रहा है.

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इसके अलावा सरकार को निर्माण मजदूरों के लिए भी वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार करना चाहिए. यदि किसी अवधि में निर्माण पर पूर्ण रोक लगती है तो प्रभावित श्रमिकों के लिए रोजगार सहायता, कौशल प्रशिक्षण या अन्य सार्वजनिक कार्यों से जोड़ने की व्यवस्था हो सकती है. प्रदूषण कम करने की कीमत उस व्यक्ति से नहीं वसूली जानी चाहिए जिसकी आय पहले से सीमित है.

निर्माण गतिविधियों पर लंबे समय तक रोक का असर केवल मजदूरों की रोजी-रोटी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शहरों के विकास की रफ्तार पर भी पड़ता है. दिल्ली-एनसीआर जैसे तेजी से बढ़ते महानगरों में सड़क, फ्लाईओवर, मेट्रो, आवास, अस्पताल और दूसरी बुनियादी परियोजनाएं लगातार चलती रहती हैं. कई महीनों तक काम रुकने से परियोजनाओं की समयसीमा आगे बढ़ती है और उनका लाभ लोगों तक देर से पहुंचता है.

इसका सीधा असर परियोजनाओं की लागत पर भी पड़ता है. निर्माण सामग्री की कीमतें बढ़ सकती हैं, मशीनरी और श्रमिकों की लागत बढ़ती है तथा ठेकेदारों के सामने अतिरिक्त वित्तीय बोझ खड़ा होता है. कई बार दोबारा काम शुरू करने के लिए संसाधनों की फिर से व्यवस्था करनी पड़ती है. अंततः यह अतिरिक्त लागत सरकार या निजी क्षेत्र के जरिए जनता और उपभोक्ताओं पर ही आती है.

दिल्ली की हवा को साफ करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए आसान रास्ता चुनना पर्याप्त नहीं होगा. सरकार को वाहनों, सड़क की धूल, निर्माण, कचरा जलाने और औद्योगिक उत्सर्जन, हर स्रोत पर समान गंभीरता से काम करना होगा. निर्माण रोकना कुछ समय के लिए धूल कम कर सकता है, लेकिन स्थायी समाधान बेहतर निगरानी और नियमों के प्रभावी पालन में ही है.

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दिल्ली को हर साल सर्दियों में 'गैस चैंबर' बनने से रोकना है तो सरकार को केवल यह नहीं देखना होगा कि कौन काम कर रहा है, बल्कि यह भी देखना होगा कि कौन नियमों का पालन कर रहा है और कौन नहीं. निर्माण मजदूर की रोजी बचाते हुए भी हवा बचाई जा सकती है. जरूरत निर्माण रोकने की नहीं, बल्कि सरकारी निगरानी को बदलने की है.

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