जर्मनी में एक फिल्म बनी है. उसमें एक अमीर अमेरिकी यूरोप में रहता है. वो देखता है कि कुछ माइग्रेंट लगातार लड़कियों पर बलात्कार और अत्याचार कर रहे हैं. पुलिस और अदालत कुछ नहीं करती हैं. आखिर में वो खुद बंदूक उठा लेता है और अपराधियों को सबक सिखाने लगता है. बिल्कुल धुरंधर की तरह. फिल्म का नाम है- सिटिजन विजिलांटे (Citizen Vigilante). आर्मी हैमर हीरो है. उवे बोल ने बनाई है.
जर्मनी ने 19 जून को रिलीज होने से पहले फिल्म को पूरी तरह बैन कर दिया. थिएटर में, डीवीडी पर, ऑनलाइन कहीं भी नहीं दिखा सकते. वजह? सरकार कहती है ये माइग्रेंट्स के खिलाफ हिंसा भड़काती है. लेकिन एलन मस्क ने पूरी फिल्म की लिंक एक्स (ट्विटर) पर डालकर इसे ग्लोबल रिलीज कर दिया है. पोलैंड के यूरोपीय संसद सदस्य डोमिनिक टार्जिन्स्की ने भी मूवी शेयर की है. दस दिन के भीतर अब ये फिल्म दुनिया भर में चर्चा और बहस का विषय बन गई है.
फिल्म का बैन ही उसका सबसे बड़ा प्रचार बन गया. जर्मनी के सेंसर बोर्ड ने मूवी को उम्र की रेटिंग देने से मना कर दिया. मतलब कानूनन दिखाना मुश्किल है. फिल्म के निर्देशक कहते हैं कि ये सोची-समझी सेंसरशिप है. फिल्म में दिखाया गया है कि एक जज गैंग रेप करने वाले नाबालिग माइग्रेंट लड़कों को भी ‘पीड़ित’ बताता है. ये कहानी असल घटनाओं से ली गई है. बैन के बाद लाखों लोग देख चुके हैं.
मूवी के दो सबसे विवादास्पद और चर्चित सीन :
यूरोप का दर्द और माइग्रेंट समस्या
यूरोप में पिछले कई सालों से बड़े पैमाने पर माइग्रेशन हुआ. खासकर 2015 के बाद. कई देशों में बलात्कार और यौन अत्याचार के मामले बढ़ गए. स्वीडन में दो-तिहाई से ज्यादा दोषी माइग्रेंट या उनके बच्चे हैं. ब्रिटेन में ‘ग्रूमिंग गैंग्स’ का मामला बहुत बड़ा है. पाकिस्तानी मूल के गिरोहों ने हजारों श्वेत लड़कियों को फंसाया. पुलिस ने सालों तक चुप्पी साध ली, क्योंकि ‘नस्लवाद’ का डर था.
फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन - हर जगह ऐसी खबरें आती रहती हैं. फिल्म इसी डर को दिखाती है. हीरो देखता है - बस में किराया न देने वाले, दुकानों से चोरी, लड़कियों को छेड़ना. फिर एक 14 साल की लड़की का गैंगरेप. अदालत अपराधियों को छोड़ देती है- ‘उनकी उम्र कम है, शरणार्थी हैं, वो एडजस्ट नहीं हो पा रहे हैं’. हीरो जज को मारता है और आगे बढ़ता है.
मूवी के इन दृश्यों को देखकर कुछ लोग इसे ‘रेप जिहाद’ कह रहे हैं. मतलब एक खास समुदाय द्वारा लड़कियों पर संगठित अत्याचार. आंकड़े विवादित हैं, लेकिन कुछ जगहों पर साफ दिखता है कि ये अपराध ज्यादा हो रहे हैं. यूरोप की सरकारें और मीडिया इसे ‘राइट-विंग प्रोपगैंडा’ कहकर टाल देते हैं. लेकिन आम लोग डर गए हैं.
यूरोप में फेल होती माइग्रेंट पॉलिसी
यूरोप की ओपन बॉर्डर पॉलिसी और ‘सबको साथ रखो’ का सपना टूट रहा है. अपराध बढ़ रहे हैं. माइग्रेंट को लेकर गुस्सा बढ़ रहा है. दक्षिणपंथी पार्टियां मजबूत हो रही हैं क्योंकि पुरानी पार्टियां समस्या को नजरअंदाज करती रहीं.
फिल्म दिखाती है कि सिस्टम अपराधियों की रक्षा करता है और पीड़ितों को दोबारा घायल करता है. हीरो का गुस्सा सिस्टम पर भी है. ये यूरोप का असली दर्द है. लोग महसूस करते हैं कि नेता, मीडिया और जज उनकी सुरक्षा से ज्यादा ‘विविधता’ को महत्व देते हैं. एलन मस्क और डोमिनिक जैसे लोग फिल्म शेयर करके कह रहे हैं – ये हकीकत है, दबाओ मत.
सरल शब्दों में समझें तो सिटिजन विजिलांटे का बैकग्राउंड भारत में लव जिहाद की बहस से जुड़ता है. भारत में आरोप लगता रहा है कि मुस्लिम लड़के हिंदू या ईसाई लड़कियों को प्यार के जाल में फंसाते हैं, धर्म बदलवाते हैं और फिर शोषण करते हैं. केरल स्टोरी फिल्म इसी पर बनी. उसमें दिखाया गया कि कैसे केरल की सैकड़ों लड़कियां लव जिहाद के जरिए ISIS में चली गईं. कश्मीर फाइल्स में कश्मीरी पंडितों के साथ जो अत्याचार हुआ, वो दिखाया गया.
सिटिजन विजिलांटे ठीक उसी तरह यूरोप में माइग्रेंट लड़कियों पर अत्याचार की कहानी है. दोनों जगह एक ही पैटर्न – खास समुदाय से महिलाओं पर ज्यादा अपराध, सिस्टम का चुप रहना या नरम रवैया, पीड़ितों की आवाज दबाना.
सिटिजन विजिलांटे पर रिएक्शन
फोर्ब्स, वेरायटी जैसी पत्रिकाओं ने एलन मस्क के बहाने सिटिजन विजिलांटे को आड़े हाथों लिया. और कहा कि मस्क एक ऐसी फिल्म को प्रमोट कर रहे हैं जो अप्रवासियों को क्रिमिनल मानकर हमला करने के लिए प्रेरित करती है. कोई इसे सनक को प्रोत्साहित करने वाला कह रहा है. तो किसी के लिए यह एक ऐसी फिल्म है, जो अपनी मनगढ़त धारणाओं को सही ठहराने के लिए बनाई गई है. यह पूरी फिल्म पूर्वाग्रह से भरी हुई है. नेशनल रीव्यू के लिए जियानकार्लो सोपो लिखते हैं कि फिल्म के हीरो के पास न तो बदला लेने की कोई वजह है, न वह स्वाभाविक लगता है और न ही वह कुछ साबित कर पाता है. पूरी फिल्म एक फैंतासी है.
बैन ने फिल्म को ग्लोबल बना दिया
निर्देशक कहते हैं – अगर बैन न होता तो फिल्म कुछ थिएटर तक सीमित रहती. मस्क ने एक्स पर डालकर इसे पूरी दुनिया तक पहुंचा दिया. भारत में भी लोग चर्चा कर रहे हैं. ठीक वैसे ही केरल स्टोरी बॉयकॉट के बावजूद सफल हुई.
इस बात पर बहस चलती रहेगी कि फिल्म पूरी तरह सही है या नहीं. लेकिन इसका मैसेज साफ है – ये फिल्म डराने से ज्यादा जगाने के लिए काम आनी चाहिए. ताकि समाज और उसके हुक्मरान अपनी महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था चाकचौबंद करें.
भारत में भी चिंता इसी बात को लेकर है कि डेमोग्राफी चेंज, संस्कृति का टकराव और महिलाओं की सुरक्षा को नजरअंदाज न किया जाए. सिटिजन विजिलांटे, केरल स्टोरी, कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्में असहज सवाल पूछती हैं. क्या पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए या अपराधियों को ‘विक्टिम कार्ड’? क्या खुली बहस सेंसरशिप से बेहतर है? ये फिल्म यूरोप का दर्द सामने लाई है. बहस जारी रहेगी.
यूरोपियन यूनियन पार्लियामेंट के सदस्य ने पूरी फिल्म ही X पर शेयर कर दी :