मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने 27 फीसदी आरक्षण की मांग वाली सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए आरक्षण को 14 फीसदी तक ही सीमित रखा है. हाईकोर्ट की जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने 159 पेज के साझा आदेश में 95 याचिकाओं का निपटारा करते हुए 2019 में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने वाले कानून को असंवैधानिक करार दिया है. साथ ही 13 फीसदी आरक्षण के तहत रोके गए पदों पर तीन महीने के भीतर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने का आदेश दिया है.
हाईकोर्ट ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य सरकार 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए जरूरी और पर्याप्त आंकड़े पेश नहीं कर पाई. कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ और जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल मामलों में तय किए गए सिद्धांतों का भी जिक्र किया.
कोर्ट ने कहा कि आरक्षण की कुल सीमा 50 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए. ओबीसी आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने के लिए जरूरी असाधारण परिस्थितियां भी स्थापित नहीं की गईं. इसी आधार पर अदालत ने 27 फीसदी आरक्षण की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया.
सरकार ने आरक्षण बढ़ाने के समर्थन में महाजन आयोग की 1982 की रिपोर्ट का हवाला दिया था. अदालत ने आरक्षण बढ़ाने के लिए समकालीन, वैज्ञानिक और मात्रात्मक आंकड़ों की जरूरत पर जोर दिया. कोर्ट के अनुसार, केवल किसी समुदाय की आबादी अधिक होने के आधार पर आरक्षण बढ़ाने का फैसला नहीं किया जा सकता. सरकारी सेवाओं और उच्च शिक्षा में ओबीसी के प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़ों को भी अदालत ने अपने विचार में शामिल किया.
बता दें कि यह मामला साल 2019 का है, जब तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने OBC आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया था. इसके बाद मामला कोर्ट पहुंच गया. हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लंबी सुनवाई हुई. ओबीसी पक्ष के वकीलों ने आरक्षण को 27 प्रतिशत ही बनाए रखने की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने इन याचिकायों को स्वीकार नहीं किया.
पूर्व सीएम कमलनाथ ने बीजेपी पर साधा निशाना
हाईकोर्ट के फैसले के बाद प्रदेश के पूर्व सीएम कमलनाथ ने बीजेपी पर निशाना साधा. उन्होंने एक्स पोस्ट में कहा, 'भाजपा का ओबीसी विरोधी चेहरा अब पूरी तरह प्रदेश के सामने आ चुका है. वर्ष 2019 में मेरे मुख्यमंत्री कार्यकाल में कांग्रेस सरकार ने देश के अन्य राज्यों की तरह प्रदेश में भी ओबीसी को 27% आरक्षण दिया था. लेकिन भाजपा की सरकारें शुरू से ही इस आरक्षण को समाप्त करने का षड्यंत्र कर रही थीं. सरकार की कमजोर पैरवी और आधी-अधूरी सूचनाएं देने से माननीय हाई कोर्ट ने ओबीसी को 27% आरक्षण को रद्द कर दिया है.'
उन्होंने आगे लिखा कि इस तरह से भाजपा ने अदालत में कमजोर पक्ष रखकर ओबीसी वर्ग की पीठ में छुरा घोंपा है. अदालत के आदेश से साफ़ है कि भाजपा सरकार अदालत को अपने तर्कों से संतुष्ट नहीं कर पाई. असल में भाजपा शुरू से ही आरक्षण के ख़िलाफ़ थी और कोशिश कर रही थी कि ख़ुद आरक्षण खत्म करने के बजाय अदालत के माध्यम से यह काम कराए. मैं भाजपा को चेतावनी देता हूं कि ओबीसी वर्ग के साथ यह अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, हर स्तर पर ओबीसी वर्ग को 27% आरक्षण दिलाने की लड़ाई लड़ी जाएगी.'