भारत में आरक्षण (Reservation) सिर्फ नौकरी या कॉलेज की सीट का मामला नहीं है. यह सामाजिक न्याय, बराबरी के मौके और लंबे समय से चले आ रहे भेदभाव से जुड़ा मुद्दा है. संविधान ने SC, ST और OBC समुदायों को शिक्षा व सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण का रास्ता बनाया. इसका मकसद उन लोगों को मुख्यधारा में लाना था, जिन्हें पीढ़ियों तक सामाजिक और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा.
आज आरक्षण पर बहस फिर तेज है. एक तरफ कुछ युवा और छात्र कहते हैं कि कोटे का आधार जाति के बजाय परिवार की आर्थिक स्थिति होना चाहिए. उनका तर्क है कि गरीबी हर जाति में होती है और अवसर जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए. दूसरी तरफ आरक्षण समर्थक मानते हैं कि सिर्फ आय देखकर सामाजिक भेदभाव को नहीं समझा जा सकता. अच्छी आय वाले परिवारों के लोग भी जाति के आधार पर भेदभाव और प्रतिनिधित्व की कमी का सामना कर सकते हैं.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आर्थिक आधार जाति आधारित पिछड़ेपन की जगह ले सकता है. आरक्षण मूल रूप से गरीबी हटाने की स्कीम नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और सम्मान से जुड़ी नीति के रूप में बनाया गया था. इसलिए आर्थिक मदद और आरक्षण को एक ही चीज मानना आसान नहीं है. जरूरत यह है कि दोनों स्तरों पर काम हो- गरीब परिवारों के लिए छात्रवृत्ति, बेहतर स्कूल और रोजगार सहायता, जबकि सामाजिक रूप से वंचित समूहों को उचित प्रतिनिधित्व मिले.
OBC आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ का नियम भी बहस का हिस्सा है. इसका मतलब है कि अपेक्षाकृत संपन्न OBC परिवारों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखना, ताकि फायदा ज्यादा जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे. आलोचकों का कहना है कि इसकी सीमा और लागू करने के तरीके की नियमित समीक्षा होनी चाहिए.
मेरिट का मुद्दा भी अक्सर उठता है. लेकिन मेरिट केवल परीक्षा के नंबरों से तय नहीं होती. एक छात्र के पास अच्छी कोचिंग, सुरक्षित घर, इंटरनेट और बेहतर स्कूल हो सकता है, जबकि दूसरे के पास ये सुविधाएं नहीं होतीं. इसलिए बराबर मुकाबले के लिए शुरुआती मौके बराबर होना जरूरी है.
आगे का रास्ता टकराव नहीं, ठोस समीक्षा है. सरकार को डेटा के आधार पर देखना चाहिए कि लाभ किन तक पहुंच रहा है, शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुधरे और निजी क्षेत्र में अवसर कैसे बढ़ें. आरक्षण पर बहस संवेदनशील है.
जातिगत आरक्षण में बदलाव की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच बीजेपी प्रवक्ता अजय आलोक के बयान ने नई बहस छेड़ दी है. उन्होंने EWS आरक्षण और OBC से जुड़े मोदी सरकार के फैसलों का जिक्र करते हुए आंदोलन की दिशा पर सवाल उठाए. वहीं आरक्षण सुधार के समर्थकों ने पलटवार करते हुए सामान्य वर्ग को भी आरक्षण पर बोलने का अधिकार देने की मांग की है.
दिल्ली में सवर्ण समाज के प्रदर्शन का बताकर वायरल किया जा रहा वीडियो असल में मध्य प्रदेश के भोपाल का है. वीडियो में 29 जुलाई को MSP पर मूंग की खरीद और अन्य मांगों को लेकर हुए किसानों के प्रदर्शन को दिखाया गया है.
आरक्षण और जातिगत राजनीति के मुद्दे ने उत्तर प्रदेश समेत चुनावी राज्यों में सियासी हलचल तेज कर दी है. सवर्णों के प्रदर्शन और विपक्ष के हमलों के बीच फंसी बीजेपी के लिए यह स्थिति 'एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई' जैसी बन गई है. बीजेपी के सामने डबल चैलेंज खड़ा हो गया है?
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मोदी सरकार पर चोर दरवाजे से आरक्षण खत्म करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि सरकारी पद खाली रखकर और PSU बेचकर आरक्षण खत्म किया जा रहा है. इस बीच केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताया और कहा कि उनके सरकार में होते हुए इसे खत्म नहीं किया जा सकता.
आरपीआई (ए) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने कहा है कि आरक्षण संविधान की ओर से दिया गया अधिकार है और इसका विरोध करने वाले असंवैधानिक हैं.
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर एससी, एसटी और ओबीसी के जाति आधारित आरक्षण के विरोध में हुए प्रदर्शन पर कड़ी नाराजगी जताई है.
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने बिहार के पटना एयरपोर्ट पर आरक्षण को संविधान से मिला अधिकार बताया. उन्होंने कहा कि इसे किसी की मांग पर खत्म नहीं किया जा सकता. उन्होंने जंतर-मंतर पर हो प्रोटेस्ट पर कहा कि प्रदर्शनकारियों से बातचीत होनी चाहिए.
डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने आरक्षण विरोधी प्रदर्शनकारी छात्रों की मांगें केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने और दो दिन बाद केंद्रीय मंत्री के साथ बैठक कराने का भरोसा दिया. वहीं, अखिलेश यादव ने ‘आरक्षण सुधार’ के नाम पर आरक्षण खत्म करने की साजिश का आरोप लगाते हुए कहा कि आरक्षण पीडीए का अधिकार है.
गुजरात सरकार ने दिव्यांग अधिकारियों और कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण का लाभ देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने इस संबंध में उचित नीति तैयार करने के लिए 5 सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है. समिति कानूनी प्रावधानों, कोर्ट के फैसलों और दूसरे राज्यों की नीतियों का अध्ययन कर सरकार को अपनी सिफारिश देगी.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर यूजीसी और जातिगत आरक्षण को लेकर प्रदर्शन कर रहे सवर्ण समाज के लोगों पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स ने धरना स्थल से हटाना शुरू कर दिया है. जानकारी के मुताबिक पुलिसका कहना है कि प्रदर्शनकारियों के पास प्रदर्शन की अनुमति नहीं है.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुक्रवार को हजारों सामान्य वर्ग के प्रदर्शनकारियों ने यूजीसी के इक्विटी नियमों के खिलाफ और जाति आधारित आरक्षण में सुधार की मांग को लेकर प्रदर्शन किया. प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने SC/ST एक्ट का भी विरोध किया और इसे वापस लेने की मांग की.
उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने आरक्षण को लेकर बड़ा बयान दे दिया है. उन्होंने साफ कहा है कि वे आरक्षण के पक्षधर हैं और इस मुद्दे पर वे संजय निषाद के साथ हैं. अगर संजय निषाद आरक्षण की मांग को लेकर धरना देंगे तो वे भी उनका साथ देंगे.
यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री संजय निषाद ने परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह से आरक्षण के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से तत्काल वार्ता करने की अपील की है. उन्होंने कहा कि समाज की आवाज को सुनते हुए इस आरक्षण को जल्द से जल्द लागू करने की दिशा में ठोस पहल होनी चाहिए.