scorecardresearch
 

दस पैसे और दादी | गुलज़ार | STORYBOX WITH JAMSHED

सिर्फ दस पैसे के लिए दादी से लड़ाई करके घर से भागा 'चक्कू' गुस्से में रेलवे स्टेशन पहुंच गया और चलती ट्रेन में बैठ गया लेकिन ट्रेन में बैठने के बाद उसने देखी एक दूसरी दुनिया जहां गरीबी थी, दर्द था और थी एक लावारिस लाश - सुनिये गुलज़ार की लिखी कहानी 'दस पैसे और दादी' स्टोरीबॉक्स में जमशेद कमर सिद्दीक़ी से

Advertisement
X
Dus Paise Aur Dadi Storybox
Dus Paise Aur Dadi Storybox

राइटर - गुलज़ार

बस एक दस पैसे के लिए झगड़ा हो गया दादी से और चक्कू घर से भाग गया। “दस पैसे भी कोई चीज़ होती है? राम मनोहर की जेब में कितनी रेज़गारी रहती है, जब चाहे जाकर पतंग खरीद सकते हैं। एक कटी और दूसरे की कन्नी बँध गई। माँजे की चरखी बस भरी ही रहती है और सद्दी के कितने सारे पत्ते रखे हैं घर में ”  - ये सब याद आते ही गुस्सा आ गया उसे। “दादी है ही ऐसी घुन्नी, इसलिए इतनी झुर्रियाँ हैं उसकी शक्ल पर। राम की दादी की शक्ल पर तो एक भी नहीं”  एक के बाद एक उसे दादी के सारे नुक्स याद आने लगे। “कान कितने ढीले-ढाले हैं। जब भी गालों पर चूमती है तो आँखों पर लटक जाते हैं और पलकें तो हैं ही नहीं। रात को सोती है तो आधी आँखें खुली रहती हैं। मुँह भी खुला रहता है”  - दादी के कार्टून बनाता वो नंगे पाँव ही रेलवे स्टेशन तक आ गया। बिना किसी इरादे के वो स्टेशन में घुस गया और जैसे ही गार्ड ने सीटी दी, वो दौड़कर गाड़ी में चढ़ गया। (बाकी की कहानी नीचे है लेकिन अगर इसी कहानी को अपने फोन पर जमशेद कमर सिद्दीक़ी से सुनना हो तो नीचे दिए SPOTIFY या APPLE PODCAST पर क्लिक करें)

Advertisement

इसी कहानी को SPOTIFY पर सुनने के लिए यहां क्लिक करें -




इसी कहानी को APPLE PODCASTS पर सुनने के लिए यहां क्लिक करें - 

गाड़ी चलने के बाद ही उसने सोचा चलो घर से भाग जाएँ और गाड़ी में ही उसने फैसला किया कि ज़िन्दगी में खुद-मुख्तार होना बहुत ज़रूरी है। ये भी कोई ज़िन्दगी है? एक-एक पतंग के लिए इतने बूढ़े-बूढ़े लोगों के सामने हाथ फैलाना पड़ें। इसीलिए तो उसके बड़े भाई भी दादी को छोड़कर मुंबई चले गए थे और अब कभी नहीं आते, कितने साल हुए।

गाड़ी के दरवाज़े के पास बैठे-बैठे उसे नींद आ गई। बहुत देर बाद जब आँख खुली तो बाहर अँधेरा हो चुका था और तब उसे पहली बार एहसास हुआ कि वो वाकई घर से भाग आया है। दादी पर गुस्सा तो कुछ कम हुआ था, लेकिन गिला और शिकायतें अभी तक गले में रुँधी हुई थीं।

दस पैसे कौन-सी ऐसी बड़ी चीज़ है? अब अगर पूजा की कटोरी से उठाए तो चोरी थोड़े ही हुई। भगवान की आँखों के सामने लेकर गया था... तो उन्होंने बताया, क्यों नहीं दादी को? वो तो समझती हैं मैंने चोरी की है। दादी के भगवान भी उसी जैसे हैं। घुन्ने, कम सुनते हैं, कम देखते हैं।”

किसी ने दरवाज़े से हटकर अंदर बैठने के लिए कहा। स्टेशन आ रहा था शायद। गाड़ी आहिस्ता हो रही थी। गाड़ी के रुकते-रुकते एक बार तो ख्याल आया कि लौट जाए। लेकिन स्टेशन पर टहलते हुए पुलिस वालों को देखकर उसका दिल दहल गया। वो बिना टिकट था, ये ख्याल भी पहली बार हुआ उसे। उसने सुना था, बिना टिकट वालों को पुलिस पकड़कर जेल भेज देती है और वहाँ चक्की पिसवाती है।

Advertisement

दरवाज़े के पास ठण्ड बढ़ गई थी। वो अंदर की तरफ सीटों के दरमियान आकर बैठ गया। गाड़ी चली और लोग अपनी-अपनी जगहों पर लौटे तो सन्दूक, पेटी, बिस्तर के ऊपर-नीचे से होता हुआ वह खिड़की के बिलकुल नीचे जाकर फिट हो गया।

थोड़ी देर बाद उसे भूख और प्यास का एहसास सताने लगा। खुद-मुख्तारी के मस्ले एक-एक करके सामने आने लगे। उसे भूख भी सता रही थी, प्यास भी। ऊपर वाली बर्थ पर सोए हुए हज़रत की सुराही मुसलसल ट्रेन के हिचकोलों से झूल रही थी और सुराही के मुँह पर औंधा लगा हुआ ग्लास भी मुसलसल किट-किट किए जा रहा था।

उसी वक्त नीली वर्दी पर पीतल का चमकता हुआ बिल्ला लगाए टिकट चैकर दाखिल हुआ। उसके पीछे-पीछे उसका असिस्टेंट, एक बिना टिकट वाले को गुद्दी से पकड़कर दाखिल हुआ। चक्कू की तो जान ही निकल गई। सीट के नीचे ही नीचे, घिसटता, खिसकता वो नीली वर्दी के पीछे की तरफ जा पहुँचा। फिर वहाँ से खिसकता हुआ डब्बे के दूसरी तरफ जा निकला, जहाँ उसे टॉयलेट नज़र आ गया। बस उसी में घुस गया और निकर खोल के कमोड पर बैठ गया। अब यहां थोड़े ही कोई टिकट पूछने आएगा। ये ख्याल भी आया कि दूसरे लोग ये तरकीब क्यों नहीं इस्तेमाल करते और वो चेचक के दागों वाला तो कर ही सकता था, जिसे टी.सी. के असिस्टेंट ने गुद्दी से पकड़ रखा था। बहुत देर बैठा रहा। नंगी टाँगों पर ठण्ड लग रही थी, हवा भी। थोड़ी देर कमोड पर बैठे-बैठे नींद भी आने लगी थी।

Advertisement

फिर गाड़ी ने पटरी बदली। एक धक्का-सा लगा। रफ्तार भी कुछ कम होने लगी। बड़ी एहतियात से उसने टॉयलेट का दरवाज़ा खोला। बाहर कोई स्टेशन आ रहा था। झाँककर देखा तो नीली वर्दी कहीं नज़र नहीं आई। “ज़रूर कहीं छुपकर बैठा होगा। वरना चलती गाड़ी से कहाँ जाता?” गाड़ी रुकी तो फौरन उतर गया।

सुनसान-सा स्टेशन। आधी रात का वक्त। कोई उतरा भी नहीं। गाड़ी थोड़ी देर खड़ी हाँफती रही। फिर भक-भक करती हुई आगे चल दी।

चक्कू एक बेंच पर सिकुड़कर, अपनी टांगों में मुँह देकर बैठ गया और फौरन ही तकिए की तरह लुढ़क गया। ठक-ठक करता, लालटेन हाथ में लिए, एक चौकीदार आया और कान से पकड़कर उसे उठा दिया।

“चल बाहर निकल! घर से भाग के आया है क्या? चल निकल, नहीं तो चौकी वाले धर के ले जाएँगे। चक्की पिसवाएँगे जेल में।”

एक ही धमकी में वह लड़खड़ाकर खड़ा हो गया। चौकीदार ठक-ठक करता फिर गायब हो गया। चक्कू प्लेटफॉर्म के नीचे की तरफ टहल गया, जहाँ मद्धिम-सी रोशनी में एक बोरियों का ढेर नज़र आ रहा था। बोरियों के पीछे ही कोई बुढ़िया, दादी की तरह मुँह खोले सो रही थी। फटा-पुराना एक लिहाफ ओढ़े। कोई भिखारन होगी। नींद और बर्दाश्त नहीं हो रही थी। वो उसी भिखारन के लिहाफ में घुस गया। उसे लगा था जैसे दादी के लिहाफ में घुस रहा है। गाँव में अक्सर ये होता था। मीरासन अपने पास सुलाती थी और वो रात को उठकर दादी के लिहाफ में जा घुसता था। सर ज़मीन पर टिकाते ही सो गया।

Advertisement

सुबह जब उठा तो वैसे ही बुढ़िया से लिपटकर सोया हुआ था। भिखारन के सिरहाने पड़े कटोरे में रेज़गारी पड़ी थी। फिर वही कटोरी याद आ गई। कल रात की भूख उभर आई। “इतनी सारी रेज़गारी, क्या करेगी बुढ़िया?” दादी से पूछो तो कहती थी, “मर कर भी तो ज़रूरत पड़ती है पैसों की, वरना इस काठी को जलाएगा कौन?”

“झूठी, कितनी तो लकड़ियाँ पड़ी थीं घर में” उसकी नज़र फिर कटोरी पर गई। “एक दस पैसे निकाल भी लिए तो क्या है? यहाँ तो भगवान भी नहीं, दादी भी नहीं। माँग लूँ तो शायद खुद ही दे दे” उसने इधर-इधर देखा, कैंटीन के पास रखी अँगीठी का धुँआ कोहरे के ऊपर चढ़ता जा रहा था। उसने दस पैसे उठा लिए। बुढ़िया का लिहाफ ठीक किया और वहां से सामने दिख रहे बाथरूम तक चला गया। वापस आकर मिट्टी से हाथ धोए। दादी ने सिखाया था, “साबुन न हो तो चूल्हे की राख से हाथ माँझ लिया करो।”

“और राख भी न हो तो?”

“तो गमले से थोड़ी-सी मिट्टी ले लो, लेकिन बाथरूम से आकर हाथ ज़रूर धोया करो” उसने ठण्डे पानी से हाथ धोए। किसी ने कोयला मसलकर रखा था होदी पर। मंजन किया होगा। थोड़ा से ले लिया उंगली पर और दाँत भी माँझ लिए। मुँह-हाथ भी धोया, हाथ झटक के सुखाए, और नेकर की जेब में हाथ डालकर पोंछे, तो ठण्डा-ठण्डा दस पैसे का सिक्का छुआ...  

Advertisement

वापस लौटा तो बुढ़िया के पास तीन-चार आदमी खड़े थे। एक उसके सिर के पास बैठा हुआ था। कह रहा था, “बिलकुल अकड़ गई है, मरे भी आठ घंटे तो हो गए होंगे।”

“रात नींद में चल बसी शायद।”

चक्कू वहीं घबराकर खड़ा हो गया। वेटिंग रूम से भी कुछ लोग उसी तरफ आ रहे थे।

“अब क्या होगा इसका?”

“स्टेशन मास्टर आएगा तो किसको खबर करेगा।”

“किसको?”

“म्युनिसिपेल्टी को, वही जलाएगी ले जाकर!”

जो पास बैठा था उसने लिहाफ खींचकर मुँह ढक दिया। चक्कू ने सुना आठ घंटे... तो यानि वो बुढ़िया की लाश से लिपटकर सोया था? कोहरे वाली ठंड में उसके कान गर्म होने लगे.... सांस तेज़ होने लगी और ऐसा लगा जैसे पूरे जिस्म में गुदगुदी हो रही है.... उसने नेकर की जेब से दस पैसे निकाले और बुढ़िया के कटोरे में फेंक दिए।

सिक्का कटोरे पर टन की आवाज़ से गिरा तो वहां खड़े लोगों ने उसकी तरफ देखा… लेकिन उसने किसी की तरफ नहीं देखा और वह भाग लिया। तेज़, बहुत तेज़ दादी के पास।

 

(ऐसी ही और कहानियों के लिए अपने फोन पर खोलें SPOTIFY, APPLE PODCAST या AMAZON MUSIC और सर्च करें STORYBOX WITH JAMSHED)

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement