scorecardresearch
 

'उड़ने पर आओ तो दुनिया कितनी छोटी लगती है...', नामचीन शायरों से गुलज़ार हुआ 'मुशायरा-ए-लखनऊ'

साहित्य आजतक लखनऊ में ‘मुशायरा-ए-लखनऊ’ की महफिल में वसीम बरेलवी, शकील आज़मी, नवाज़ देवबंदी, अज़हर इकबाल, अज़्म शाकरी, शाहिद अंजुम, अना देहलवी और तबरेज़ राना जैसे नामचीन शायरों ने शेर-ओ-शायरी से समां बांध दिया. वसीम बरेलवी की गजल पर दर्शक खड़े होकर तालियां बजाने लगे, शकील आज़मी के असरदार शेरों ने माहौल को जोश से भर दिया और अंत में नवाज़ देवबंदी ने अपने अंदाज में महफिल को खूबसूरत समापन दिया.

Advertisement
X
साहित्य आजतक लखनऊ में आयोजित मुशायरा-ए-लखनऊ में देश के जाने-माने शायरों ने शिरकत की. (Photo: ITG)
साहित्य आजतक लखनऊ में आयोजित मुशायरा-ए-लखनऊ में देश के जाने-माने शायरों ने शिरकत की. (Photo: ITG)

साहित्य आजतक लखनऊ में आज शेर-ओ-शायरी की भी महफिल सजी. 'मुशायरा-ए-लखनऊ' में देश के नामचीन शायरों ने शिरकत की, जिसमें वसीम बरेलवी, शकील आज़मी और नवाज़ देवबंदी जैसे शामिल रहे. अदब के शहर लखनऊ में दर्शकों ने इन दिग्गज शायरों को दिल खोलकर सुना और खूब सराहा.  

मुशायरे की शुरुआत की मशहूर शायर मुनव्वर राना के बेटे तबरेज़ राना ने, जिनका अंदाज बिल्कुल उनके पिता जैसा ही है. उन्होंने शेर पढ़ा,

"है मुझको दर्द कितना ये कहां हुलिया बताता है
यतीमी मुझ पर हावी है मेरा चेहरा बताता है
मेरे वालिद मेरे अंदर हैं ज़िंदा लोग कहते हैं, 
मैं जब भी बात करता हूं मेरा लहजा बताता है"

इसके बाद माइक पर आईं अना देहलवी जिन्होंने तरन्नुम में गजल पढ़ी. उन्होंने शेर पढ़ा,

"जिंदगी जिस पर मैंने वारी थी
हर अदा जिसकी मुझको प्यारी थी
वो नजर से उतर गया है 'अना'
मैंने जिसकी नजर उतारी थी"

अना देहलवी के बाद मंच हुआ शाहिद अंजुम के हवाले जिन्होंने गज़ल पढ़ी,

"जब तक हम मिट्टी के घर में रहते थे
गांव के सारे लोग असर में रहते थे

अब इस्लामाबाद में भी महफूज़ नहीं 
अच्छे खासे रामनगर में रहते थे

Advertisement

आंखों में एक सांवली लड़की रहती थी
हम उसके गालों के भंवर में रहते थे

तेरी ख्वाहिश पंख लगाए फिरती थी
पहले हम दिन-रात सफर में रहते थे

तेरे मिलने की कोई उम्मीद ना थी
फिर भी तेरी राहगुजर में रहते थे"

 
उनके एक शेर ने सुनने वालों में ज़बरदस्त उत्साह भर दिया,

"आंसुओं ने मेरी आंखों से बगावत की है
फिर तेरी याद के मौसम ने सियासत की है

मेरे बच्चों से भी मासूम हैं उसके बच्चे
मैंने ये सोचकर दुश्मन की हिफाजत की है"

इसके बाद मंच पर आए अज़हर इकबाल जो शायरी में अपने खास अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं. वह उर्दू शायरी में हिंदी के शब्दों का बेहद खूबसूरती से इस्तेमाल करते हैं. अज़हर इकबाल नई पीढ़ी के शायर हैं और सोशल मीडिया पर काफी पॉपुलर हैं. वह युवाओं के बीच खासतौर पर लोकप्रिय हैं. उन्होंने लोगों की डिमांड पर अपना मशहूर शेर पढ़ा, 

"बात बनाओ बात बनाती अच्छी लगती हो 
खाओ झूठी कसमें खाओ अच्छी लगती हो 
सिगरेट बस यूं पीता हूं तुम मना करो मुझको 
तुम समझाओ तुम समझाती अच्छी लगती हो"

इसके बाद मंच संचालक शम्स ताहिर खान ने एक शेर पढ़कर वसीम बरेलवी को आवाज दी,

"पानी पर तैरती लाश देखिए और सोचिए,
डूबना कितना मुहाल है"

Advertisement

वसीम बरेलवी ने शेर पढ़ा,

"लहराती बलखाती चिड़िया हवा से कहती लगती है
उड़ने पर आओ तो दुनिया कितनी छोटी लगती है"

उनकी एक गज़ल सुन लोग खड़े होकर तालियां बजाने लगे. वसीम बरेलवी ने पढ़ा,

"चर्चे हमारे फ़न के कहां पर नहीं हुए,
लेकिन कभी हम आपे से बाहर नहीं हुए

अपनी जमीं को हमने बनाया है आसमां
ऊंचे किसी के कांधों पर चढ़कर नहीं हुए

उड़ने का एक जुनूं था कि मरहम बना रहा
पथराव कब हमारे परों पर नहीं हुए
 
एक हम कि दर पर दस्तकें देते नहीं थके
एक तुम कि घर में होके भी घर पर नहीं हुए

मालिक तेरा करम कि बड़ी लंबी उम्र दी
और उस पर ये कि बोझ किसी पर नहीं हुए"

वसीम बरेलवी के बाद मंच पर आए अज़्म शाकरी, जिन्होंने शेर पढ़ा,

"हमारे ख्वाब थे वो बुन रही थी
अंधेरी रात तारे चुन रही थी

मैं आंखों से बयां गम कर रहा था
वो आंखों से ही बैठी सुन रही थी

अज़्म शाकरी ने कुछ शेर तरन्नुम में भी पढ़े, जैसे:

"खून आंसू बन गया आंखों में भर जाने के बाद
आप आए तो मगर तूफां गुजर जाने के बाद"

इसके बाद मंच पर आए शकील आज़मी जिनका शेर पढ़ने का एक खास अंदाज़ है. उन्होंने कई शेर पढ़े जिन्हें सुनकर लोग झूम उठे,

Advertisement

"आबाद मेरी बांहों का घेरा नहीं हुआ
मैं हो गया हूं उसका वो मेरा नहीं हुआ"

सांपों को मैंने रहने दिया उनके हाल पर
मंतर भी सीखकर मैं सपेरा नहीं हुआ

ये जिंदगी भी एक महाभारत का युद्ध है
लड़ते रहो 'शकील' अंधेरा नहीं हुआ"

और,

"रास्ते खिलकर मुस्कुरा रहे थे
हम कहीं उसके साथ जा रहे थे

एक पत्थर गिरा था आकर वहीं
हम जहां आईना बना रहे थे

मैंने पलकों तले जबां रख दी
उसकी आंखों में आंसू आ रहे थे"
 

और,

"किसी खंजर ना तीर ने मारा
बादशाह को वजीर ने मारा

एक लैला ने मारा मजनू को
एक रांझे को हीर ने मारा

जिनके सीनों में रौशनी उठी
उन मुरीदों को पीर ने मारा

जी गया आह का लगा हुआ शख्स
बद्दुआ को फकीर ने मारा

जो अदालत से बच गया था 'शकील'
उसको उसके जमीर ने मारा"

आखिर में आए डॉ नवाज़ देवबंदी, जिन्होंने शेर पढ़ा,

"ये कैसा गम है खुशी बेशुमार होते हुए
करार क्यों नहीं मुझको, करार होते हुए

वो मेरे भेजे हुए फूल उसके जूड़े में
मैं खुद को देख रहा था बहार होते हुए

तुम्हारी जीत में शामिल हूं मैं बराबर का
मैं खुश हुआ था बहुत अपनी हार होते हुए"

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement