विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा.
सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसाने वाला,
वीरों को हरषाने वाला, मातृभूमि का तन-मन सारा.
झंडा ऊंचा रहे हमारा… बचपन में हर 15 अगस्त और 26 जनवरी यह गीत सुनते हुए बीता है. भारतीय तिरंगे को देखकर नीले आसमान में लहराता हुआ गरिमा से भरा हमारा ध्वज, या किसी विशेष अवसर पर पड़ोस के पार्क में या फिर स्वतंत्रता दिवस समारोह या लाल किले पर फहराया जाता तिरंगा, अनिवार्य रूप से हममें राष्ट्रप्रेम की गहरी भावनाओं को जगाता है. यह हममें गर्व, पुरानी यादें, आकांक्षाएं, इच्छाएं और एक बड़े राष्ट्र का हिस्सा होने की भावना के साथ ही उन लोगों के प्रति श्रद्धा भी भरता है, जो हमसे पहले आए, हमारे लिए लड़े, या हमारी स्वतंत्रता के लिए खुद को बलिदान कर दिया. 15 अगस्त पर लालकिला के प्राचीर से लेकर ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के चलते चहुंओर हमारे राष्ट्र ध्वज को वह स्थान मिला है, जिसका वह हकदार था. लेकिन ध्वज की अपनी गरिमा के साथ ही इसका एक इतिहास भी है, और यहां तक पहुंचने के लिए इसने लंबी यात्रा की है.
पूर्व राजनयिक और जाने-माने लेखक नवतेज सरना ने तिरंगे की यात्रा और गौरव-गाथा को अपनी पुस्तक 'अ फ्लैग टू लिव एंड डाई फार' में दर्ज किया है. सरना अमेरिका और इजराइल में भारत के राजदूत, ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त रह चुके हैं. उन्होंने भारत सरकार में सचिव और विदेश कार्यालय के प्रवक्ता भी रहे हैं. इससे पहले वे मॉस्को, वारसॉ, थिम्फू, तेहरान, जिनेवा और वाशिंगटन डीसी में राजनयिक पदों पर कार्यरत थे. सरना की साहित्यिक कृतियों में उपन्यास 'क्रिमसन स्प्रिंग', 'द एग्जाइल' और 'वी वेरेंट लवर्स लाइक दैट' शामिल है. 'क्रिमसन स्प्रिंग' को 2022 का कलिंग साहित्य महोत्सव कथा पुस्तक पुरस्कार मिल चुका है. उपन्यास लघुकथा संग्रह 'विंटर इवनिंग्स', गैर-कथा रचनाएँ 'द बुक ऑफ नानक', 'सेकंड थॉट्स' और 'इंडियंस एट हेरोड्स गेट', साथ ही दो अनुवाद 'जफरनामा' और 'सैवेज हार्वेस्ट' शामिल हैं. वे विदेश नीति और साहित्यिक मामलों के जानेपहचाने स्तंभकार और टिप्पणीकार हैं.
लेखक ने प्राचीन प्रतीकों से लेकर इसे अपनाए जाने तक राष्ट्रीय ध्वज की उस असाधारण यात्रा का वर्णन किया है, जिसने कपड़े के एक साधारण टुकड़े को आजादी की लड़ाई के दौरान प्रतिरोध और एकता का, तो स्वतंत्रता के पश्चात पवित्र राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में बदल दिया. सरना लिखते हैं कि भारत का तिरंगा युद्धक्षेत्रों से लेकर ओलिंपिक के मैदान में, लाल किला से लेकर छोटे से छोटे गांव के चौक-चौराहों पर लहराया जाता है. इसने शहीदों के शव को लपेटने के साथ ही विरोध प्रदर्शनों और अनशनों को भी ताकत दी है. इसमें समाहित रंग भारत के मूलभूत मूल्यों की गहराई को समोए हुए हैं- केसरिया रंग त्याग और बलिदान का प्रतीक है, सफेद रंग शांति और सत्य का, तो हरा रंग जीवन और विकास का प्रतीक है. इसकी उपस्थिति भारत के स्वतंत्रता संग्राम में औपनिवेशिक प्रभुत्व के विरुद्ध प्रेरित जनता की विजय और उसके द्वारा एक असाधारण राष्ट्र के निर्माण में निहित दृढ़ता और बलिदान की याद दिलाती है.
पुस्तक वर्ष 1948 में अगस्त की 12 तारीख को लंदन के वेम्बली स्टेडियम की एक घटना के उल्लेख से शुरू होती है. वहां ब्रिटेन और भारत के बीच ओलिंपिक हाकी का फाइनल मुकाबला चल रहा था. वह भारत जो महज एक साल पहले तक ब्रिटेन का गुलाम था. उसी नव-स्वतंत्र भारत ने अपने शासक रहे औपनिवेशिक साम्राज्य इंग्लैंड को चुनौती दी थी. हर भारतीय के लिए यह एक बेहद खास और भावुक क्षण था, जब इंग्लैंड की ही धरती पर उन्हीं लोगों के बीच भारत ने ब्रिटेन को 4-0 से हराकर जब स्वर्ण पदक जीता था उस मुकाबले में दो गोल दिग्गज हाकी खिलाड़ी सेंटर-फारवर्ड बलबीर सिंह सीनियर ने किए थे. सत्तर साल बाद जब चंडीगढ़ में उस ऐतिहासिक जीत की याद में एक समारोह हुआ तो बलबीर सिंह के शब्द थे, 'जब हमारा राष्ट्रगान वहां बजा और राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया, तो मुझे लगा कि तिरंगे के साथ मैं भी उड़ रहा हूं. देशभक्ति की वह भावना दुनिया की किसी भी भावना से परे थी.'
पुस्तक प्राचीन भारत से शुरू होती है- महाभारत और अर्थशास्त्र में उल्लिखित ध्वज और केतु का उल्लेख करती है. फिर वह आधुनिक राष्ट्रवादी ध्वजों की ओर बढ़ती है, जिसमें 1906 में कोलकाता के पारसी बागान लेन पर फहराया गया पहला राष्ट्रीय ध्वज, जिसे कलकत्ता फ्लैग या वंदे मातरम् फ्लैग के नाम से जाना जाता है, के बारे में बताती है. यह बंगाल विभाजन के एक साल पूरा होने के विरोध में फहराया गया था. इस झंडे को सचिंद्र प्रसाद बोस और उनके मित्र सुकुमार मित्र ने डिजाइन किया था. यह फ्रांसीसी क्रांति के झंडे से प्रेरित था. इसमें लाल, पीला और हरा रंग की पट्टियां थीं. आठ आधे खुले कमल ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतीक थे. सूर्य और अर्धचंद्राकार चंद्रमा क्रमशः हिंदू और मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करते थे. झंडे पर देवनागरी में ‘वंदे मातरम’ लिखा था.
राष्ट्रीय ध्वज की कहानी इस एहसास के साथ आगे बढ़ी कि स्वतंत्रता आंदोलन का अपना एक अलग प्रतीक होना चाहिए. पुस्तक बहन निवेदिता के लाल बैनर और एनी बेसेंट के होम रूल ध्वज की भी चर्चा करती है.
पुस्तक पिंगली वेंकय्या की अहम भूमिका के बारे में विस्तार से बताती है. वेंकय्या को ‘सच्चा नायक’ बताते हुए सरना कहते हैं, ‘वह एक अनोखा व्यक्तित्व थे- उन्होंने बोअर युद्ध में भाग लेने के साथ ही, प्लेग इंस्पेक्टर और रेलवे गार्ड का काम भी किया था. 1906 में जब उन्होंने दादाभाई नौरोजी को कलकत्ता में झंडा फहराते देखा तो वे भारत के लिए एक अलग राष्ट्रीय झंडे की धुन में पड़ गए. 1916 में पिंगली वेंकय्या ने अपनी किताब ‘A National Flag for India’, तेलुगु में Bharata Desaniki Oka Jatiya Patakam प्रकाशित की. इसमें उन्होंने 24, कुछ स्रोतों के अनुसार 30 तरह के राष्ट्रीय झंडों के संभावित डिजाइन प्रस्तावित किए थे. यह किताब सीपी रामास्वामी अय्यर जैसे लोगों के सहयोग से छपी थी. उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों से पता चलता है कि इस झंडे की मुख्य विशेषताओं में धर्म-केंद्रित सोच शामिल थी. जैसे इंद्रधनुष के सात रंगों को भारत के सात प्रमुख धर्मों, सम्प्रदायों के प्रतीक के रूप में आवंटित किया गया था. जैनों के लिए शुद्ध सफेद जगह छोड़ी गई. साथ ही हिंदू पौराणिक और सांस्कृतिक प्रतीक इस्तेमाल किए गए थे, जैसे कमल, लक्ष्मी, सरस्वती, काली और अन्य भगवान तो थे ही भीष्म, अर्जुन, त्रिशूल, मोर, धनुष-बाण, कैलाश पर्वत और वज्र भी शामिल था. देश की 19 प्रमुख भाषाओं के प्रतीक के रूप में 19 तारे भी रखे गए थे. हर डिजाइन में छोटा ब्रिटिश ध्वज- यूनियन जैक शामिल था, क्योंकि उस समय तक भारतीय स्वतंत्रता की मांग स्वायत्तता तक सीमित थी. झंडे के अन्य तत्वों में विभिन्न रंगों की पट्टियां, प्रतीकात्मक आकृतियां, जो भारत की विविधता और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती थीं, शामिल थे. लेकिन ये डिजाइन गांधीजी या कांग्रेस को बहुत प्रभावित नहीं कर पाए. हां इतना अवश्य हुआ कि वेंकय्या की लगन ने झंडे की बहस को ज़िंदा रखा.
पुस्तक स्पष्ट रूप से यह बताती है कि 1920 के दशक के मध्य तक, ध्वज का बुनियादी डिजाइन तय होने लगा था- एक तिरंगा, जिसके बीच में चरखा हो, पर शर्त यह थी कि यह खादी का बना हो. यह असल में कांग्रेस का ध्वज भी था, हालांकि इसे आधिकारिक तौर पर उस रूप में अपनाया नहीं गया था. लेकिन इसे महात्मा गांधी का समर्थन हासिल था. हरा रंग मुसलमानों के लिए, लाल हिंदुओं के लिए और सफेद रंग अन्य वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे. गांधीजी ने 13 अप्रैल, 1921 को ‘यंग इंडिया’ में लिखा - “मैं हमेशा श्री वेंकय्या की लगन की सराहना करता रहा हूं, लेकिन वे मुझे कभी उत्साहित नहीं कर पाए. उनके डिजाइनों में मुझे राष्ट्र को गहराई तक छूने वाली कोई बात नहीं दिखी.” पर वेंकय्या ने हार नहीं मानी.
पिंगली वेंकय्या, जिन्हें डायमंड खदान में काम करने के चलते डायमंड वेंकय्या भी कहा जाता था, को आखिरकार 1921 में विजयवाड़ा में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के दौरान अपनी डिजाइन को मनवाने में सफलता मिली. लाला हंसराज के सुझाव ने इसमें मदद की, जिसने अंततः गांधीजी को प्रभावित किया कि झंडे में चरखा शामिल किया जाए. उस समय स्वतंत्रता आंदोलन जोर पकड़ चुका था. गांधी टोपी और चरखा विरोध के प्रतीक बन चुके थे. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विश्व में भारत की धारणा बदल रही थी, इसलिए झंडे की जरूरत महसूस की गई. तब जो झंडा बना, उसमें ‘लाल को हिंदू रंग और हरे को मुस्लिम रंग मान उसकी पृष्ठभूमि पर चरखा रखा गया था. जैसा कि गांधीजी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा, वेंकय्या इतने उत्साही थे कि उन्होंने तीन घंटे में झंडा बना कर ला दिया. गांधीजी ने सफेद पट्टी जोड़ दी, जो अन्य सभी धर्मों का प्रतीक थी. उन्होंने लिखा- “अगर हिंदू और मुस्लिम एक-दूसरे को सहन कर सकते हैं, तो वे अन्य सभी धर्मों को भी सहन करने के लिए बाध्य हैं.” सरना लिखते हैं कि उद्देश्य विभाजन का नहीं, बल्कि एकता का था.
पुस्तक राष्ट्रीय आंदोलन के अहम पड़ाव- जैसे स्वदेशी आंदोलन, होम रूल आंदोलन, खिलाफत और असहयोग आंदोलन के दौरान ध्वज डिजाइन के अलग-अलग चरणों को भी चिह्नित करती है. 1923 में नागपुर ध्वज सत्याग्रह हुआ था. मार्च 1923 में यह सत्याग्रह नगरपालिका भवनों पर स्वराज झंडा फहराने की इच्छा से शुरू हुआ. सी राजगोपालाचारी के नेतृत्व में डॉ राजेंद्र प्रसाद, सेठ जमनालाल बजाज और देवदास गांधी का एक प्रतिनिधि मंडल जबलपुर पहुंचा. ब्रिटिशों ने भारी विरोध किया. इससे ‘राष्ट्रीय झंडे की गरिमा’ बचाने के लिए सत्याग्रह शुरू हुआ, जिसमें सैकड़ों लोग गिरफ्तार हुए. जबलपुर से शुरू होकर यह नागपुर तक फैला और पांच महीने चला. इससे झंडे की अवधारणा भारतीयों के दिलो-दिमाग में गहराई से बस गई. 1929 लाहौर में पूर्ण स्वराज की घोषणा और 1930 में गांधी जी के नमक सत्याग्रह, डांडी मार्च जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं के माध्यम से सरना दर्शाते हैं कि कैसे तिरंगा स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया. सरना महाभारत जैसे महाकाव्यों में झंडों के प्राचीन भारतीय संदर्भों और शुरुआती राष्ट्रवादी डिजाइनों से करते हैं, जिनमें एनी बेसेंट का होम रूल झंडा और गांधी का स्वराज झंडा- जिसमें आत्मनिर्भरता का प्रतीक चरखा भी शामिल था- से करते हैं. यह किताब 1931 में कांग्रेस की उन बहसों का भी ज़िक्र करती है जिनमें रंगों को बदलकर केसरिया- साहस, सफेद- सत्य और हरा-आस्था के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया था. मुस्लिम लीग जैसे उन समूहों के विरोध के बावजूद जो हरे रंग के पक्ष में थे. सरना की राजनयिक पृष्ठभूमि उनकी भाषा को सटीक और दिलचस्प बनाती है. वे जेल के कपड़ों से बने झंडों जैसे किस्सों को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भगवा झंडे और लीग के अर्धचंद्र जैसे प्रतीकों के बीच की प्रतिद्वंद्विता जैसी अनसुनी जानकारी के साथ जोड़ते हैं.
पुस्तक राष्ट्रीय ध्वज को अपनाने और इसके अंतिम स्वरूप के विभिन्न तत्वों- जैसे चरखे के स्थान पर अशोक चक्र का समावेश- के एकीकरण और गणतंत्र के अंतर्गत इसके मानकीकरण की प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन करती है. सरना बताते हैं कि अंततः राष्ट्रीय ध्वज का एक स्वरूप आम भारतीयों की सामूहिक सोच में केंद्र में आ गया था. हालांकि जब आम सहमति मजबूत हो रही थी, तब भी कुछ अलग और विरोधी आवाजें भी उठ रही थीं. कुछ सिख समूह चाहते थे कि तिरंगे के डिजाइन में एक अलग रंग-पीला-जोड़ा जाए, ताकि उनकी अलग अल्पसंख्यक पहचान जाहिर हो सके. मुस्लिम लीग की अपनी और भी बुनियादी आपत्तियां थीं, जो कुछ हद तक कांग्रेस के साथ बढ़ती दूरी को दिखाती थीं. नए डिजाइनों पर विचार किया गया, लेकिन यह साफ हो गया कि तिरंगे पर आम सहमति बहुत मजबूत थी और आखिरकार, कांग्रेस ने थोड़ा बदला हुआ डिजाइन आधिकारिक तौर पर अपनाया- केसरिया, सफेद और हरा रंग, जिसमें बीच में गहरे नीले रंग का चरखा हो. रियासतों को लगा कि उनकी अलग पहचान-जो उनके अलग-अलग ध्वजों में दिखती थी- कमज़ोर हो रही है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य हिंदू समूहों की ओर से केसरिया ध्वज की मांगें भी उठीं. आखिरी फैसले में सिर्फ एक बड़ा बदलाव किया गया- चरखे की जगह सारनाथ के अशोक चक्र को शामिल किया गया ताकि संतुलन बना रहे और धर्म व प्रगति के प्राचीन प्रतीक को दर्शाया जा सके.
नेहरू ने इसके सौंदर्य और गैर-सांप्रदायिक स्वरूप पर ज़ोर दिया था. सरना उन तनावों को भी सामने लाते हैं, जिनमें गांधी की शुरुआती आपत्तियां भी शामिल हैं, और यह दिखाते हैं कि कैसे झंडा विरोध के प्रतीक से बदलकर संप्रभुता का प्रतीक बन गया. झंडे की कहानी को दोहराते हुए सरना हमें याद दिलाते हैं कि दरारें भले ही मौजूद थीं, लेकिन उन्हें भुलाने, सबको जोड़ने और सबको साथ-साथ लेकर चलने की भावना भी थी. केसरिया, सफेद और हरा- ये तीन रंग भारतीय संस्कृति में अपने प्रतीकात्मक अर्थ के कारण चुने गए. नेहरू ने स्पष्ट किया कि डिजाइन में कोई ‘सांप्रदायिक’ महत्व नहीं है, बल्कि यह ‘सुंदर है, क्योंकि राष्ट्र का प्रतीक सुंदर होना चाहिए.’ यह झंडा सामूहिक प्रयास था. कनॉट प्लेस के एड्डे ड्रेपर्स एंड टेलर्स ने पहला झंडा सिला. डॉ एनएस हरदिकर ने अमेरिका से लौटकर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होकर झंडे की रस्मों को आकार दिया. स्पष्ट है कि 1947 में संविधान सभा ने सांप्रदायिक तर्क और मांग की जगह भारत और भारतीयता के सार्वभौमिक आदर्श को अपनाया. पर पुस्तक यहीं नहीं रुकती.
लेखक बताते हैं कि स्वतंत्रता के पश्चात 1950 तक राष्ट्रीय ध्वज के इस्तेमाल और उसे फहराने के कड़े नियमों वाला एक विस्तृत 'फ़्लैग कोड' भी लागू हो चुका था. लगभग आधी सदी तक, झंडे की पहचान एक राष्ट्रीय प्रतीक के तौर पर ही रही, जिसका इस्तेमाल ज़्यादातर सरकारी कामों के लिए होता था. लेकिन जब भारतीय गणतंत्र 50 साल का हुआ, तो आम लोगों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के ज़्यादा इस्तेमाल की मांग बढ़ने लगी. इस सदी की शुरुआत में नवीन जिंदल के प्रयासों के चलते एक नया 'फ़्लैग कोड' लागू किया गया, जिसने झंडे को फहराने के नियमों को आसान बनाया और आम लोगों को भी इसके इस्तेमाल की इजाजत दी. देश कितना बदल गया था, यह इस बात से भी पता चलता है कि पहले झंडा सिर्फ़ खादी का ही बन सकता था, लेकिन बाद में इस नियम में बदलाव किया गया. राष्ट्रीय प्रतीक अब ज़्यादा लोगों की पहुंच में है, लेकिन सरना इसके ‘व्यापारीकरण’ की ओर भी ध्यान दिलाते हैं. यह किताब राष्ट्रीय ध्वज के विकास के इतिहास को बहुत संवेदनशीलता और आसानी से समझ आने वाले अंदाज में बयान करती है. सरना बहुत अच्छे से बताते हैं कि कैसे तिरंगे की कहानी में हमारे देश का जीवंत इतिहास समाया हुआ है और जैसे-जैसे हमारा गणतंत्र मजबूत और विकसित होगा, यह कहानी भी आगे बढ़ती रहेगी.
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किताब: ‘A Flag to Live and Die For: A Short History of India’s Tricolour’
लेखक: Navtej Sarna
विधा: History / Non-Fiction
भाषा: English
प्रकाशक: Aleph Book Company
पृष्ठ संख्या:
मूल्य: ₹499