History of Jalebi: जलेबी का नाम सुनते ही हर किसी के मुंह में पानी आ जाता है, लेकिन इसकी असल कहानी बहुत दिलचस्प है. बहुत कम लोग जानते हैं कि जलेबी भारतीय मूल की मिठाई नहीं है. यह असल में फारस (आज का ईरान) की देन है जो सदियों पहले व्यापारियों के साथ भारत पहुंची थी. समय के साथ भारत के माहौल में ढलकर और स्थानीय सामग्री के साथ मिलकर, यह विदेशी डिश पूरी तरह से हिंदुस्तानी बन गई और आज देश के अलग-अलग कोनों में जलेबी की कई वैरायटीज मौजूद हैं. तो आइए जलेबी कैसे भारत पहुंची, इस बारे में जान लीजिए.
फारस से शुरू हुआ जलेबी का सफर
जलेबी का असली नाम जुलबिया (Zulbia) है जो फारसी शब्द है. दरअसल, जो आज का ईरान (Iran) है, उसे ही पुराने समय में फारस (Persia) कहा जाता था. इतिहास के जानकारों और फूड हिस्टोरियंस के हिसाब से, जलेबी का जो सबसे शुरुआती रूप मिलता है, वह फारसी सभ्यता से ही जुड़ा है. वहां इसे 'जुलबिया' या 'जलाबिया' कहा जाता था.
होमग्राउन की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मिठाई 13वीं सदी के आसपास फारस में काफी फेमस थी. उस समय फारसी ट्रेडर्स जब व्यापार के लिए मिडिल ईस्ट और अन्य देशों में गए तो वे अपने साथ यह रेसिपी भी लेकर गए. फिर जब मध्यकालीन भारत में विदेशी व्यापारियों का आना-जाना शुरू हुआ तो जलेबी की रेसिपी भी उनके साथ हिंदुस्तान आ गई.
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस मिठाई का सबसे ठोस ऐतिहासिक प्रमाण इंडोलॉजिस्ट पी.के. गोडे के उस रिसर्च में मिलता है, जिसे उन्होंने 1943 में 'द न्यू इंडियन एंटीक्वेरी' (The New Indian Antiquary) मैग्जीन में पब्लिश किया था. गोडे ने स्पष्ट किया था कि कैसे 'जुलबिया' शब्द समय के साथ बदलते हुए भारतीय प्रभाव में 'जलेबी' बन गया और पुराने संस्कृत ग्रंथों जैसे 'गुणगुणबोधिनी' और जैन पांडुलिपियों में इसे 'कुंडलिका' के रूप में दर्ज किया गया.
कैसे 'जुलबिया' बनी हिंदुस्तान की जलेबी?
जैसे ही यह मिठाई भारत की रसोई में आई, यहां के खानसामों ने इसमें अपना तड़का लगाया. पुरानी संस्कृत और कन्नड़ किताबों में इसे जला-वल्लिका या कुंडलिका के नाम से जाना गया. इसके अलावा ऐतिहासिक शब्दकोश हॉब्सन-जॉब्सन (Hobson-Jobson) भी यह पुष्टि करता है कि 'जलेबी' शब्द अरबी-फारसी शब्द 'जलाबिया' का ही भाषाई रूपांतरण है. पुराने भारतीय ग्रंथों में इसे 'कुंडलिका' के नाम से भी दर्ज किया गया है.
भारतीय कारीगरों ने इसे और बेहतर बनाने के लिए फर्मेंटेशन का इस्तेमाल किया, जिसने इसे एक अलग क्रिस्पी टेक्सचर दिया. यह वह बदलाव था जिसने इसे मूल फारसी रेसिपी से बिल्कुल अलग और अधिक स्वादिष्ट बना दिया.
राजाओं की दावत से गलियों के नाश्ते तक फेमस
इतिहास के मुताबिक, जलेबी केवल शाही दावतों तक सीमित नहीं रही. मुगल काल से लेकर आधुनिक भारत तक, यह मिठाई हर वर्ग के लोगों की पसंदीदा रही है. इसकी खासियत यह है कि यह कम बजट में भी तैयार हो जाती है. आज भारत के हर कोने में इसे अलग-अलग तरीके से परोसा जाता है, जैसे उत्तर भारत में जलेबी-रबड़ी का फेमस कॉम्बो. फारस की गलियों से शुरू हुआ यह सफर आज हिंदुस्तान की पहचान बन चुका है.