आज फिटनेस का मतलब सिर्फ वजन कम करना या ट्रेडमिल पर दौड़ना नहीं रह गया है. खासकर युवाओं के बीच वर्कआउट करने का तरीका बदल रहा है. अब जिम में कार्डियो के साथ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, वेट्स और हाइब्रिड वर्कआउट पर भी ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है. इसके साथ ही रनिंग क्लब, ग्रुप एक्सरसाइज और फिटनेस कम्युनिटी भी लोगों को आकर्षित कर रही हैं. यानी फिटनेस अब सिर्फ शरीर को फिट रखने की कोशिश नहीं, बल्कि सोशल लाइफ और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा भी बन रही है.
ट्रेडमिल से वेट्स तक पहुंचा फोकस
बीबीसी की एक हालिया रिपोर्ट ने यूके में बदलती फिटनेस आदतों और युवाओं के बीच बढ़ते स्ट्रेंथ ट्रेनिंग ट्रेंड को समझाया है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 34 साल की एंटोनिया डफिन ने जब जिम जाना शुरू किया था, तो उनका मकसद वजन कम करना और शरीर को टोन करना था. बाद में जिम उनकी जिंदगी का इतना अहम हिस्सा बन गया कि उन्होंने पर्सनल ट्रेनर बनने का फैसला किया. अब वह मैनचेस्टर में महिलाओं का जिम चलाती हैं.
एंटोनिया बताती हैं कि उनके क्लाइंट्स के फिटनेस गोल अलग-अलग हैं. कुछ मजबूत बनना चाहते हैं, कुछ प्रेग्नेंसी के लिए खुद को फिट रखना चाहते हैं, जबकि कुछ एंडोमेट्रियोसिस जैसी परेशानियों के साथ बेहतर महसूस करने के लिए एक्सरसाइज करते हैं. उनके मुताबिक, हाय्रॉक्स जैसी हाइब्रिड ट्रेनिंग में सोशल और कॉम्पिटिटिव दोनों तरह का माहौल मिलता है.
युवा क्यों कर रहे हैं स्ट्रेंथ ट्रेनिंग?
स्पोर्ट इंग्लैंड के आंकड़ों के मुताबिक, नौ साल पहले की तुलना में अब ज्यादा युवा जिम, एक्सरसाइज मशीनों और वेट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं. बीबीसी की रिपोर्ट में 16 से 34 साल के लोगों के आंकड़ों का जिक्र है. इस आयु वर्ग में जिम सेशन और वेट्स से जुड़ी एक्सरसाइज की हिस्सेदारी बढ़ी है, जबकि कुछ पारंपरिक कार्डियो एक्टिविटीज की हिस्सेदारी घटी है.
पोर्ट्समाउथ यूनिवर्सिटी के एक्सरसाइज एक्सपर्ट डॉ. एंड्रयू स्कॉट बताते हैं कि जिम में रेजिस्टेंस ट्रेनिंग जैसे कई विकल्प मिलते हैं. उनका कहना है कि सोशल मीडिया का भी इस बदलाव में असर है. उनके मुताबिक, बहुत से लोग इन्फ्लुएंसर्स को देखकर वर्कआउट सीख रहे हैं और ये सोचते हैं कि अगर कोई दूसरा व्यक्ति कर सकता है तो वे भी कर सकते हैं.
अब सिर्फ लुक नहीं, ताकत भी जरूरी
19 साल के विल सेवर्ड ने स्कूल के दौरान जिम जाना शुरू किया था. शुरुआत में वो रनिंग मशीन और एक्सरसाइज बाइक का इस्तेमाल करते थे, लेकिन समय के साथ उन्होंने वेट्स के साथ ज्यादा एक्सप्लोसिव ट्रेनिंग शुरू कर दी. विल के मुताबिक, जिम का असर उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ा है. वो बताते हैं कि इससे उनका मूड बेहतर हुआ और उन्हें सामान्य तौर पर ज्यादा हेल्दी महसूस होने लगा.
एंटोनिया के जिम में बारबेल्स, केटलबेल्स, डंबेल्स और केबल मशीनों से स्ट्रेंथ ट्रेनिंग कराई जाती है. बीबीसी ने हालिया रिसर्च का भी जिक्र किया है, जिसके मुताबिक हर हफ्ते सुझाई गई स्ट्रेंथ ट्रेनिंग से नियमित एरोबिक एक्सरसाइज जैसे कई फायदे मिल सकते हैं. इनमें हार्ट डिजीज और स्ट्रोक से जुड़े जोखिम कम होने के साथ दिमाग और सेल्फ-एस्टीम से जुड़े फायदे भी शामिल हैं.
एक्सरसाइज अब सोशल भी हो रही है
फिटनेस का बदलता तरीका सिर्फ वर्कआउट तक सीमित नहीं है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, कई लोगों के लिए दूसरों के साथ एक्सरसाइज करना भी महत्वपूर्ण हो गया है.
जीपी, पर्सनल ट्रेनर और ट्रायथलीट डॉ. हुसैन अल-जुबैदी इसे फिटनेस का एक बड़ा इकोसिस्टम बताते हैं. इसमें जिम, रनिंग क्लब्स, फिटनेस ऐप्स, सोशल मीडिया और वियरेबल टेक्नोलॉजी शामिल हैं.
‘आवर फ्यूचर हेल्थ’ के करीब 20 लाख प्रतिभागियों के डेटा में भी उम्र के हिसाब से एक्सरसाइज के तरीके में अंतर दिखाई देता है. रिपोर्ट के मुताबिक, युवा लोग हर हफ्ते कम समय के लेकिन ज्यादा तेज और इंटेंस वर्कआउट करने की ज्यादा संभावना रखते हैं, जैसे फिटनेस क्लासेज, एरोबिक्स और फुटबॉल.
रनिंग का क्रेज खत्म नहीं हुआ
हालांकि कुल मिलाकर रनिंग की लोकप्रियता में गिरावट आई है, लेकिन युवा पुरुषों और महिलाओं के बीच ये अभी भी सबसे आम एक्सरसाइज है. अडल्ट्स के बीच भी रनिंग टॉप दो एक्टिविटीज में शामिल है.
वहीं, ग्रुप रनिंग का चलन भी बढ़ रहा है. पार्करन में बच्चों, 20 की उम्र वाले युवाओं और 50 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की भागीदारी बढ़ रही है. यूके में हर वीकेंड 1,400 से ज्यादा पार्करन इवेंट्स होते हैं और इनमें शामिल होना फ्री है.
लॉफबोरो यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर एस्थर वैन स्लुइस के मुताबिक, कम्युनिटी एक्सरसाइज लोगों को एक-दूसरे से जुड़ने का मौका देती है. उनका कहना है कि वर्क फ्रॉम होम के बढ़ते चलन के बीच घर के पास मौजूद कम्युनिटी क्लब्स खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
फिटनेस पर खर्च भी बढ़ा
फिट रहने की ये बढ़ती दिलचस्पी लोगों के खर्च में भी दिखाई दे रही है. यूके एक्टिव के डेटा के मुताबिक, 16 से 34 साल के 27% लोग जिम मेंबरशिप और फिटनेस को अपने खर्च की बड़ी प्राथमिकताओं में रखते हैं. अप्रैल 2024 में यह आंकड़ा 21% था.
बीबीसी के मुताबिक, द जिम ग्रुप के 2026 सर्वे में करीब एक तिहाई Gen Z ने बताया कि वे हर महीने हेल्थ और फिटनेस पर 26 से 50 पाउंड खर्च करते हैं, जबकि करीब एक चौथाई 50 पाउंड से ज्यादा खर्च करते हैं.
27 साल की कॉर्डेलिया शेरिडन हफ्ते में चार से पांच बार जिम जाती हैं. वह अपनी 45 पाउंड की जिम मेंबरशिप को 'जरूरी यूटिलिटी बिल' की तरह मानती हैं. उनकी पुरानी रूटीन में कार्डियो ज्यादा था, लेकिन अब वो वेट्स और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग पर ज्यादा ध्यान देती हैं.
कॉर्डेलिया कहती हैं कि अब उन्हें अपने टारगेट पूरे करने और पहले से ज्यादा भारी वेट उठाने में अच्छा लगता है. वो चाहती हैं कि 30 की उम्र में पहुंचते समय वह मजबूत रहें. उन्हें जिम का माहौल पहले के मुकाबले ज्यादा सोशल भी लगता है.
फिटनेस में अब ‘फन’ भी जरूरी
डॉ. अल-जुबैदी के मुताबिक, लोगों को एक्सरसाइज के लिए प्रेरित करने के लिए इसे आसान, सोशल और मजेदार बनाना जरूरी है. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने जिम, रनिंग क्लब्स और पैडल जैसी एक्टिविटीज की लोकप्रियता को इसी सोशल और मजेदार पहलू से जोड़ा.
यानी वर्कआउट का बदलता ट्रेंड सिर्फ ट्रेडमिल से वेट्स तक पहुंचने की कहानी नहीं है. लोग अब ऐसी फिटनेस एक्टिविटी तलाश रहे हैं जो उन्हें मजबूत बनाए, रोजमर्रा की जिंदगी में अच्छा महसूस कराए और साथ ही दूसरे लोगों से जुड़ने का मौका भी दे. जेन जी के बीच बढ़ती स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और ग्रुप फिटनेस इसी बदलते फिटनेस कल्चर की एक तस्वीर पेश करती है