एशियन गेम्स में सोमवार को 25 मीटर पिस्टल का फाइनल ईशा सिंह के लिए सिर्फ एक मेडल की लड़ाई नहीं था. यह अपने भीतर चल रही उस लड़ाई को जीतने का भी मौका था, जो पेरिस ओलंपिक के बाद से उनके साथ थी. फाइनल से एक रात पहले नींद गायब थी, दिमाग में दबाव था और अगले दिन के मुकाबले का तनाव हावी था. तभी मां का फोन आया और प्यार की बजाय मिली जोरदार डांट.
21 साल की ईशा ने खुद बताया, ‘मुझे बहुत दबाव महसूस हो रहा था. रात को नींद भी नहीं आ रही थी. मां से बात हुई तो उन्होंने पूछा कि मैं इतना तनाव क्यों ले रही हूं. उन्होंने कहा कि इसे इंजॉय करो. हर किसी को ऐसा मौका नहीं मिलता. मुझे लगता है कि मुझे उस डांट की जरूरत थी.’
मां यहीं नहीं रुकीं. ईशा के मुताबिक, वह सहानुभूति की उम्मीद कर रही थीं, लेकिन मां ने पूरा लेक्चर दे दिया. आखिर में सीधा आदेश मिला- ‘चुप करो और सो जाओ.’
शायद यही डांट ईशा के लिए सबसे जरूरी मानसिक खुराक बन गई. अगले दिन जब वह 25 मीटर पिस्टल के मैराथन जैसे फाइनल में उतरीं तो चेहरे पर दबाव जरूर था, लेकिन हिम्मत नहीं टूटी. शुरुआती दौर में बढ़त भी बनाई, फिर लय बिगड़ी, कई बार बाहर होने का खतरा आया, लेकिन ईशा हर बार वापस लौटीं और आखिर तक सोने के लिए नहीं, गोल्ड के लिए लड़ती रहीं.
ईशा ने कहा, ‘जब आप खेल रहे होते हैं तो यह विचार बहुत भटकाता है कि अगले ही पल आप बाहर हो सकते हैं. शुरुआत में मैं लीड कर रही थी, लेकिन चीजें मेरे मुताबिक नहीं हो रही थीं. फिर भी मैंने फोकस बनाए रखा. मुझे पता था कि मैं कर सकती हूं और आखिरी तक लड़ती रही.’
यह मुकाबला इतना लंबा और तनावपूर्ण था कि ईशा का शूटिंग वाला हाथ तक जवाब देने लगा. बार-बार हाथ झटकना और कलाई घुमाना उनके संघर्ष को साफ दिखा रहा था. उन्होंने बताया कि गोल्ड के लिए लड़ने वालों में उन्होंने सबसे ज्यादा शूट किया, इसलिए हाथ बेहद कड़ा और थका हुआ महसूस हो रहा था.
फाइनल में जजों की कुछ गलतियों ने भी ईशा को अनजाने में राहत दे दी. जहां आम तौर पर ऐसी गलती प्रतियोगिता का हिस्सा होती है, वहीं ईशा के लिए वे कुछ अतिरिक्त सांसों का मौका बन गईं. उन्होंने इसे ‘भगवान की कृपा’ तक बताया.
ईशा सिंह ने कहा, ‘मैं उन गलतियों के लिए थोड़ी आभारी थी क्योंकि मुझे कुछ आराम मिल गया. शायद यह भगवान की कृपा थी, जिसने मुझे सोचने के लिए थोड़ा समय दिया. बाकी खिलाड़ियों के लिए भले ही जोन टूट रहा था, लेकिन मेरे लिए इससे मदद मिली.’

ईशा के लिए यह सिल्वर इसलिए भी खास है क्योंकि पेरिस ओलंपिक में वह उस दबाव से नहीं निकल पाई थीं. इस बार हालात फिर वैसे ही थे, लेकिन ईशा वैसी नहीं थीं. फाइनल से पहले क्वालिफिकेशन में आठवें स्थान पर रहकर उन्होंने किसी तरह जगह बनाई थी. वह अपने प्रदर्शन से खुश नहीं थीं, लेकिन क्वालिफिकेशन के दौरान वापसी करने का भरोसा उनके साथ था.
ईशा ने कहा, ‘इस तरह का दबाव मैंने पहले महसूस नहीं किया था. यह ओलंपिक स्तर का दबाव था. इस अनुभव ने मुझे बहुत कुछ दिया क्योंकि मुझे फिर से उस दौर से गुजरने का मौका मिला, जहां मैं पहले वह सब नहीं कर पाई थी. अब मुझे सच में लगता है कि मैं ज्यादा मजबूत हूं.’
फाइनल की आखिरी सीरीज ने तो ईशा को खुद अपने बारे में एक जवाब दे दिया. उन्होंने कहा, ‘आखिरी सीरीज ने मुझे एहसास कराया कि मैं इतना दबाव संभालने के लिए मजबूत हूं.’
10 मीटर एयर पिस्टल में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाने के बाद भी ईशा ने खुद को संभाला. उन्होंने माना कि कई बार खिलाड़ी को लगता है कि उसकी पहचान सिर्फ मेडल से तय हो रही है. ऐसे समय में उन्होंने खुद को याद दिलाया कि वह किसी को कुछ साबित करने के लिए नहीं खेलतीं.
एशा ने कहा, ‘मैंने खुद से कहा कि मैं किसी की देनदार नहीं हूं. मैं किसी के लिए नहीं खेलती. मैंने यह खेल इसलिए चुना क्योंकि मुझे इससे प्यार है, इसमें मेरा जुनून है. मैं दर्शकों या किसी टीम के लिए नहीं खेलती.’
चार मेडल जीतकर पिछले एशियन गेम्स से लौटीं ईशा ने अब एक और पदक जोड़ लिया है, लेकिन इस बार कहानी सिर्फ सिल्वर की नहीं है. यह उस मानसिक मजबूती की कहानी है, जो दबाव, नींद की कमी, थकान और पुराने दर्द के बीच तैयार हुई.
ईशा ने कहा, ‘जैसे-जैसे प्रतिष्ठा बढ़ती है, उसका बोझ भी बढ़ता है. लेकिन मुझे लगता है कि ये सारी चीजें मुझे मजबूत बनाने की कोशिश कर रही हैं और मैं इस अनुभव को अपना रही हूं.’
गोल्ड हाथ से निकल गया, लेकिन ईशा के हाथ में सिल्वर था और भीतर एक नया भरोसा. ऐसा फाइनल उन्होंने पहले कभी नहीं खेला था. उनके शब्दों में, ‘यह मेरे शानदार अनुभवों की सूची में जरूर जाएगा. मैं हर पल के लिए आभारी हूं. यह नर्वस करने वाला था, लेकिन शानदार भी.’
इनपुट- PTI