वाराणसी के गंगा घाटों की बारिश और बाढ़ के बाद हर साल विशेष सफाई की जाती है. इसके लिए बाकायदा टेंडर निकाला जाता है. जबकि, नगर निगम की तरफ से हर दिन घाटों की सफाई होती है. फिर भी साल में एक बार अच्छे से घाटों की साफ- सफाई की जरूरत क्यों पड़ती है?
हर साल मॉनसून के बाद बनारस के गंगा घाटों की अच्छे से साफ- सफाई होती है. घाटो की इसलिए सफाई की जाती है. क्योंकि, पानी बढ़ने के बाद उतरने पर घाटों पर भारी मात्रा में कीचड़, सिल्ट (गाद), प्लास्टिक और कचरा जम जाता है.
बारिश के मौसम के बाद बाढ़ का पानी जब वापस उतरता है, तो अपने पीछे बहुत सारी मिट्टी और गाद छोड़ जाता है जो सूखकर कीचड़ बन जाती है. उफनती नदी अपने साथ प्लास्टिक, पूजा सामग्री और शहर की गंदगी बहाकर लाती है जो घाटों की सीढ़ियों पर फंस जाती है. ज्यादा दिनों तक घाट की सीढ़ियों पर गाद जमा रहने की वजह से ये सूख जाती हैं. इस वजह से इनकी सफाई में मुश्किल हो सकती है. ऐसे में घाट पर आने वाले श्रद्धालुओं को असुविधा न हो.
देव दीपावली और त्योहारों से पहले जगमग हो जाते हैं घाट
वाराणसी में गंगा घाटों पर बाढ़ के बाद जमी गाद को हटाने के लिए वाराणसी नगर निगम (VNN) हर साल नियमित रूप से टेंडर निकालता है. मानसून और बाढ़ का पानी कम होने के बाद, विशेषकर देव दीपावली और बड़े त्योहारों से पहले घाटों को साफ करने के लिए नगर निगम निजी एजेंसियों और ठेकेदारों को ओपन टेंडर के माध्यम से काम सौंपता है.
गाद हटाने का यह बड़ा अभियान, भारी मशीनों और संसाधनों के इस्तेमाल से पूरा होता है. सफाई का यह काम टेंडर के जरिए होता है. जबकि रोजमर्रा की सामान्य साफ-सफाई और निगरानी की जिम्मेदारी नगर निगम के अपने सफाई कर्मचारियों और टास्क फोर्स के पास होती है.
दशाश्वमेध और मणिकर्णिका जैसे प्रसिद्ध घाटों पर दोबारा सुचारू रूप से गंगा आरती और धार्मिक अनुष्ठान शुरू करने के लिए स्वच्छता जरूरी होती है. पर्यटकों और स्थानीय श्रद्धालुओं को असुविधा न हो और बीमारी फैलने का खतरा टले, इसलिए नगर निगम और स्वयंसेवक मिलकर विशेष सफाई अभियान चलाते हैं.