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क्या है जंतर-मंतर के नाम का मतलब... वहां ही क्यों होते हैं इतने प्रोटेस्ट?

दिल्ली का जंतर-मंतर आज धरना-प्रदर्शन के लिए जाना जाता है, लेकिन करीब 300 साल पहले इसे खगोलीय गणनाओं के लिए बनाया गया था. जानिए इसका नाम कैसे पड़ा और यहां बने विशाल यंत्र किस काम आते थे.

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जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1724 में दिल्ली में इस वेधशाला का निर्माण करवाया था. ( Photo: Pexels)
जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1724 में दिल्ली में इस वेधशाला का निर्माण करवाया था. ( Photo: Pexels)

दिल्ली में जंतर-मंतर का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में धरना-प्रदर्शन की तस्वीर आती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इसका नाम जंतर-मंतर क्यों रखा गया? क्या यहां कभी कोई मंत्र पढ़े जाते थे? या फिर इस नाम का संबंध किसी धार्मिक जगह से है? दरअसल, जंतर-मंतर का इतिहास धरना-प्रदर्शन से कहीं ज्यादा पुराना और दिलचस्प है. यह जगह असल में खगोल विज्ञान (Astronomy) से जुड़ी हुई है. यहां बने विशाल यंत्रों की मदद से कभी सूर्य, चंद्रमा और दूसरे खगोलीय पिंडों के बारे में स्टडी की जाती थी.

'जंतर-मंतर' का मतलब क्या है?
जंतर-मंतर नाम को आम तौर पर संस्कृत के दो शब्दों 'यंत्र' और 'मंत्र' से जोड़कर बना है. यंत्र का मतलब होता है कोई उपकरण या ऐसी मशीन, जिसकी मदद से किसी काम को किया जाए. वहीं मंत्र शब्द का संबंध फॉर्मूला, कैलकुलेशन या सोच-विचार से जोड़ा जाता है. इस तरह यंत्र और मंत्र का संबंध ऐसे उपकरणों से माना जाता है, जिनकी मदद से खगोलीय गणनाएं की जाती थीं. समय के साथ बोलचाल की भाषा में 'यंत्र-मंत्र' का उच्चारण बदलते-बदलते 'जंतर-मंतर' हो गया. 

आखिर जंतर-मंतर बनाया किसने था?
भारत में मौजूद इन ऐतिहासिक वेधशालाओं (Observatories) का निर्माण जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने करवाया था. सवाई जय सिंह द्वितीय को एस्ट्रोनॉमी और मैथ्स में काफी इंटरेस्ट था. उस दौर में आसमान में सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की स्थिति के आधार पर समय और कैलेंडर से जुड़ी कैलकुलेशन की जाती थीं. लेकिन उस समय इस्तेमाल होने वाले कई खगोलीय उपकरण छोटे आकार के थे और उनसे मिलने वाले आंकड़ों में कुछ अंतर हो सकता था. इस वजह से जय सिंह द्वितीय ने बड़े आकार के स्थायी उपकरण बनवाने की योजना बनाई.

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जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1724 में दिल्ली में इस वेधशाला का निर्माण करवाया था. इसे बनाने के पीछे एक वजह उस समय मौजूद खगोलीय गणनाओं को ज्यादा सटीक करना भी थी. मुगल बादशाह मुहम्मद शाह की ओर से भी इस काम को बढ़ावा मिला था, क्योंकि उस समय इस्तेमाल होने वाली कई खगोलीय सारणियों (Astronomical Tables)  में काफी गलतियां थीं. सवाई जय सिंह द्वितीय उस दौर में इस्तेमाल होने वाली दूरबीनों से भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे.

इसलिए उन्होंने कुछ अलग तरीका अपनाया. उन्होंने छोटे उपकरणों की जगह पत्थर और गारे से बने बहुत बड़े-बड़े यंत्र बनवाए. इन यंत्रों का इतना बड़ा आकार सिर्फ दिखावे के लिए नहीं था. इन्हें बड़ा बनाने का मकसद था कि सूर्य और दूसरे खगोलीय पिंडों की स्थिति को ज्यादा बारीकी और सटीकता से मापा जा सके. यंत्र जितना बड़ा होता था, उसकी मदद से कोण और स्थिति को पढ़ने में होने वाली छोटी-मोटी गलती उतनी ही कम हो जाती थी.

सवाई जय सिंह द्वितीय को बचपन से ही मैथ्स और एस्ट्रोनॉमी में काफी दिलचस्पी थी. लेकिन सिर्फ 11 साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया. इसके बाद उन्हें कम उम्र में ही जयपुर की राजगद्दी संभालनी पड़ी और उनकी औपचारिक पढ़ाई बीच में ही छूट गई. राजा बनने के बाद भी उन्होंने पढ़ाई और सीखना नहीं छोड़ा. उन्होंने मैथ्स, एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोलॉजी की स्टडी की. इसी दौरान उन्होंने एस्ट्रोनॉमी से जुड़ी कई किताबें और अलग-अलग तरह के यंत्र भी इकट्ठा किए.

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अलग-अलग देशों के विद्वानों को साथ लाए
सवाई जय सिंह द्वितीय की खास बात यह थी कि वह सिर्फ अपने देश के विद्वानों तक सीमित नहीं रहे. उन्होंने हिन्दू, इस्लामी और यूरोपीय खगोलविदों को एक साथ लाकर खगोल विज्ञान से जुड़े विषयों पर चर्चा करवाई. वह चाहते थे कि अलग-अलग जगहों पर विकसित हुई खगोलीय जानकारी को समझा जाए और उससे बेहतर गणनाएं की जाएं. अपनी इसी रुचि के चलते सवाई जय सिंह द्वितीय ने भारत से एक ग्रुप को यूरोप भी भेजा. इसका मकसद वहां के खगोल विज्ञान से जुड़ी नई जानकारियां, किताबें और यंत्रों के बारे में जानकारी जुटाना था.

यह ग्रुप वापस भारत आया तो अपने साथ कुछ किताबें, दस्तावेज और वैज्ञानिक यंत्र लेकर आया. हालांकि, वह उस समय के यूरोप के प्रमुख वैज्ञानिकों जैसे न्यूटन, गैलीलियो, कोपरनिकस और केप्लर की रचनाएं या उनकी किताबें हासिल नहीं कर सका. इसके बावजूद सवाई जय सिंह द्वितीय की खगोल विज्ञान में रुचि और नई जानकारी जुटाने की कोशिश जारी रही. आगे चलकर इसी रुचि ने उन्हें भारत में बड़ी-बड़ी खगोलीय वेधशालाएं और विशाल वैज्ञानिक यंत्र बनवाने की दिशा में आगे बढ़ाया.

देश के 5 शहरों में बनीं वेधशालाएं
सवाई जय सिंह द्वितीय ने 18वीं शताब्दी में दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में वेधशालाओं का निर्माण करवाया. इनमें दिल्ली का जंतर-मंतर सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है. हालांकि, जयपुर का जंतर-मंतर आज भी एक बड़े और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक खगोलीय परिसर के रूप में मौजूद है. इन जगहों पर पत्थर और ईंट से बेहद बड़े-बड़े यंत्र बनाए गए. इन्हें देखकर आज भी हैरानी होती है कि उस समय बिना आधुनिक कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक मशीनों के इतनी बड़ी संरचनाओं की मदद से खगोलीय गणनाएं कैसे की जाती थीं.

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इन विशाल यंत्रों से क्या पता चलता था?
जंतर-मंतर में बने यंत्र सिर्फ देखने के लिए नहीं थे. इनका इस्तेमाल कई तरह की खगोलीय गणनाओं के लिए किया जाता था. इनकी मदद से सूर्य की स्थिति देखकर समय का अनुमान, खगोलीय पिंडों की स्थिति का अध्ययन और दूसरी गणनाएं की जाती थीं. इन यंत्रों का आकार बड़ा रखने के पीछे भी एक वैज्ञानिक वजह थी. बड़े उपकरणों पर कोण और स्थिति को ज्यादा बारीकी से पढ़ना संभव होता था. यानी जिस जगह को आज लोग एक ऐतिहासिक स्मारक के तौर पर देखते हैं, कभी वहां वैज्ञानिक गणनाएं की जाती थीं.

यहां पत्थर के इतने बड़े यंत्र क्यों बनाए गए?
आज हमारे पास समय देखने के लिए घड़ी और आसमान की जानकारी के लिए कंप्यूटर, सैटेलाइट और आधुनिक दूरबीनें हैं. लेकिन करीब 300 साल पहले ऐसी आधुनिक तकनीक मौजूद नहीं थी. जंतर-मंतर के सबसे प्रसिद्ध उपकरणों में सम्राट यंत्र का नाम आता है. यह एक विशाल सूर्य घड़ी (Sundial) है. इसकी संरचना ऐसी है कि सूर्य की छाया के आधार पर समय का अनुमान लगाया जा सकता है. इसकी विशाल सीढ़ीनुमा संरचना और बीच में बनी ऊंची दीवार जैसी आकृति पहली नजर में किसी बड़ी इमारत का हिस्सा लग सकती है. लेकिन असल में इसका डिजाइन खगोलीय गणनाओं के लिए किया गया था.

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क्या यहां ग्रहों को देखा जाता था?
इन वेधशालाओं में बनाए गए अलग-अलग यंत्रों का इस्तेमाल आकाशीय पिंडों की स्थिति और गति से जुड़ी गणनाओं के लिए किया जाता था. उस समय आधुनिक दूरबीन और कंप्यूटर जैसी तकनीक उपलब्ध नहीं थी. इसलिए मैथ्स, ज्योमेट्री और एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेशन के आधार पर काम किया जाता था. जंतर-मंतर इसी वैज्ञानिक परंपरा का एक बड़ा उदाहरण है.

फिर जंतर-मंतर धरना-प्रदर्शन की जगह कैसे बन गया?
जंतर-मंतर का दूसरा बड़ा अध्याय कई साल बाद शुरू हुआ. दिल्ली में पहले बड़े धरने और प्रदर्शन अक्सर इंडिया गेट के पास बोट क्लब लॉन में होते थे. लेकिन 1980 के दशक में वहां बड़े प्रदर्शनों के बाद प्रदर्शन की जगह को लेकर बदलाव किए गए. इसके बाद सरकार और प्रशासन ने जंतर-मंतर को ही शांतिपूर्ण प्रदर्शन और धरने के लिए आधिकारिक रूप से तय कर दिया. यह इलाका हाई-सिक्योरिटी जोन (संसद) से ठीक बाहर है, जिससे प्रदर्शनकारी बिना सुरक्षा नियमों को तोड़े सरकार का ध्यान अपनी तरफ खींच सकते हैं. धीरे-धीरे 1990 के दशक की शुरुआत तक जंतर-मंतर दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन की एक प्रमुख जगह बन गया.

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