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कभी इतनी लग्जरी थी चीनी... राजा-महाराजा भी 'सजावट', दवाई के काम में लेते थे!

क्या आप जानते हैं जो चीनी आज हर किसी की थाली या डाइट का हिस्सा है, वो कभी राजा-महाराजाओं के घर का ही हिस्सा हुआ करती थी.

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यूरोप में चीनी सिर्फ अमीर लोग ही खरीद पाते थे. (Photo: AI Generated)
यूरोप में चीनी सिर्फ अमीर लोग ही खरीद पाते थे. (Photo: AI Generated)

बढ़ते भाव के वजह से सोशल मीडिया पर भी चीनी की काफी चर्चा हो रही है. इसके साथ ही चीनी के बढ़ते भाव को लेकर कई मीम्स भी शेयर किए जा रहे हैं. लेकिन, क्या आप जानते हैं आज हर घर में इस्तेमाल होने वाली चीनी कभी एक लग्जरी आइटम हुआ करता था. ये इतनी लग्जरी थी कि राजा-महाराजा इससे सजावटी सामान बनाते थे और इसे दवाइयों में इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन, बदलते वक्त के साथ ये गरीब से अमीर हर घर में अपनी जगह बना चुकी है, तो जानते हैं कैसे ये लग्जरी आइटम हर घर की जरूरत बन गई है. 

टाइम मैगजीन पर छपे एक आर्टिकल के अनुसार, कई सालों पहले चीनी के सफेद क्रिस्टल इतने कीमती थे कि सम्राट, राजा और खलीफा इसे मूर्तियों के रूप में ढालकर अपने भव्य भोज की मेजों को सजाते थे. चीनी को दवाई के रूप में भी बहुत महत्व दिया जाता था.  थोड़े से पानी में घोलने पर यह आंतों के रोगों से पीड़ित लोगों के लिए चमत्कारिक रूप से कारगर साबित होती थी और आम तौर पर थके हुए शरीर को नई ऊर्जा प्रदान करती थी. चीनी की वैल्यू भी अन्य मसालों की तरह थी और व्यापारी इसे लेकर लंबे-लंबे रास्ते पार किया करते थे. 

फिर धीरे-धीरे चीनी शहरों में पहुंची, इसकी मांग बढ़ी, उत्पादन के नए तरीके सामने आए और सरकारों की नीतियों ने इसे और सस्ता बनाया. देखते ही देखते यह ऐसी चीज बन गई, जो आम लोगों की रोजमर्रा की खपत का हिस्सा बन गई. इसके आम होने के पीछे व्यापार, गुलामी, औद्योगिक उत्पादन, सरकारी नीतियां और बदलती खान-पान की आदतों जैसी कई चीजें छिपी हैं. हालांकि, भारत में स्थिति थोड़ी अलग थी और चीनी उतनी ज्यादा लग्जरी नहीं थी, क्योंकि लंबे समय से यहां चीनी का उत्पादन हो रहा था. 

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1500 के बाद चीनी हुई आम

पहले चीनी का उत्पादन भी कम था और चीन का इस्तेमाल भी कम था. करीब 1200 ईस्वी तक उत्तरी यूरोप में चीनी इतनी दुर्लभ थी कि बहुत कम लोग इसके बारे में जानते थे. 13वीं सदी तक यह महंगी लग्जरी बनी रही. कई ऐसे उल्लेख हैं, जिनमें पता चलता है कि राजा महाराजाओं ने अपने घर के लिए चीनी खरीदी थी. साल 1287 में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड-I की ओर से करीब 2,867 पाउंड यानी 1.3 टन चीनी खरीदी गई थी. 15वीं सदी तक ये स्टेट्स सिंबल थी, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि साल 1403 में हेनरी IV की शादी की दावत में चीनी से जानवरों, वस्तुओं और इमारतों की आकृतियां तक बनाई गई थीं. 

15वीं शताब्दी के बाद स्थिति बदलने लगी. पश्चिमी यूरोप में चीनी धीरे-धीरे शहरी उपभोग का हिस्सा बनने लगी. साल 1500 तक यूरोप में चीनी की मांग भूमध्यसागरीय क्षेत्र में होने वाले उत्पादन से ज्यादा हो गई. अब सवाल था कि इतनी बढ़ती मांग पूरी कहां से होगी? इसका जवाब अमेरिका में मिला. चीनी उत्पादन के लिए अमेरिका में बड़े पैमाने पर बागान विकसित किए गए, लेकिन इस मीठे कारोबार की कीमत बेहद भयावह थी. 

लाखों अफ्रीकियों के गुलाम की वजह बनी चीनी

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अमेरिका में चीनी के बागानों में काम करने के लिए बड़ी संख्या में अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाकर ले जाया गया. अटलांटिक महासागर के पार अफ्रीका से अगवा किए गए करीब 1.25 करोड़ लोगों में से लगभग दो-तिहाई चीनी के बागानों में काम करने लगे. बागानों में काम करने वाले गुलामों की स्थिति बेहद खराब थी. अमेरिका के अलग-अलग बागानों में हालात भयानक थे, लेकिन चीनी के बागानों में स्थितियां सबसे खराब मानी गईं. यानी यूरोप में जिस चीनी की मांग बढ़ रही थी, उसके पीछे अमेरिका में होने वाला ऐसा उत्पादन था जिसकी बड़ी कीमत गुलामों को चुकानी पड़ रही थी.

चीनी का विरोध भी हुआ

फिलाडेल्फिया, लंदन और पेरिस जैसे शहरों में चीनी का इस्तेमाल करने वाले लोगों तक चीनी बनाने वाले मजदूरों की कहानी पहुंची और इस गुलामी का विरोध होने लगा. उस वक्त ये कहा जाने लगा कि चीनी 'इंसानी खून के धब्बों से सनी' है. लेकिन, चीनी का उत्पादन और उपभोग जारी रहा. अब चीनी बनाने के दूसरे रास्ते तलाशे जाने लगे. जर्मन आविष्कारक कार्ल फ्रांज अकार्ड ने गन्ने के बजाय चुकंदर की जड़ों से सुक्रोज निकालने की औद्योगिक प्रक्रिया विकसित की.

दूसरी तरफ कुछ कारोबारी भारत के साथ व्यापार बढ़ाने की वकालत करने लगे. उनका तर्क था कि भारत में चीनी ज्यादा मात्रा में और कम कीमत पर हासिल की जा सकती है. लेकिन न भारतीय चीनी गुलामी खत्म कर सकी और न ही चुकंदर से बनने वाली चीनी. उस समय तक चीनी दुनिया की सबसे ज्यादा व्यापार की जाने वाली वस्तु बन चुकी थी.

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चीनी इतनी सस्ती कैसे हुई?

19वीं शताब्दी के दौरान चीनी के उत्पादन को सरकारी सब्सिडी से भी मदद मिली. इससे उत्पादन बढ़ता गया और कीमतें लगातार गिरती गईं. कीमत कम हुई तो खपत बढ़ी. यूरोप में 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में किसानों ने गेहूं की जगह चुकंदर की खेती करना शुरू कर दिया. इससे चुकंदर की चीनी का उत्पादन तेजी से बढ़ा. 1900 तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार होने वाली चीनी का करीब 50 फीसदी हिस्सा चुकंदर से बनने वाली चीनी हो चुका था. 

यानी चीनी अब केवल किसी खास वर्ग की चीज नहीं रह गई थी. इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा और कीमतों में गिरावट ने इसे ज्यादा लोगों की पहुंच में ला दिया. 1898 के बाद अमेरिका ने हवाई, क्यूबा, प्यूर्टो रिको और फिलीपींस पर अपना साम्राज्य स्थापित किया. इसके बाद उसने भी एक मजबूत चुकंदर चीनी उद्योग विकसित किया. अमेरिकी सरकार ने 1934 में 'शुगर प्रोग्राम' शुरू किया. यह ऐसी व्यवस्था थी, जिसने अमेरिकी किसानों को संरक्षण दिया और उनके सहयोगी देशों के लिए बाजार उपलब्ध कराया. 1902 के ब्रुसेल्स सम्मेलन और 1937 के अंतरराष्ट्रीय चीनी समझौते जैसे प्रयास किए गए. लेकिन ये कोशिशें सफल नहीं रहीं और दुनिया में सस्ती चीनी की आपूर्ति जारी रही. फिर चीनी की कीमत कम होती चली गई. 

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चीनी के आदी कैसे हुए लोग?

अब सबसे बड़ा सवाल था कि लोग इतनी ज्यादा चीनी खाने के आदी कैसे हो गए...1800 में एक व्यक्ति की साप्ताहिक चीनी खपत करीब एक चम्मच के स्तर पर बताई गई थी. आज एक औसत अमेरिकी करीब एक किलोग्राम चीनी प्रति सप्ताह खाता है. 19वीं शताब्दी में शहरों में काम करने वाले मजदूर अक्सर कुपोषित और ऊर्जा की कमी से जूझते थे. उस समय के चिकित्सा ज्ञान के मुताबिक सही आहार के लिए पर्याप्त कैलोरी हासिल करना जरूरी माना जाता था. चीनी कैलोरी पाने का सस्ता और तेज तरीका थी.

यही वजह थी कि अमेरिकी सेना के नेतृत्व ने सैनिकों के राशन में चीनी शामिल की. यूरोप और जापान में भी उनके समकक्षों ने ऐसा किया. आगे चलकर यही कहानी चॉकलेट बार और कोका-कोला जैसे उत्पादों तक पहुंची. ये चीजें उन सैनिकों के साथ भी यूरोप पहुंचीं, जो नाजी शासन से यूरोप को मुक्त कराने गए थे. इसके बाद कई सामानों में चीनी ने अपनी जगह बनाई और हर व्यक्ति तक चीनी की पहुंच आसान हो गई. 

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