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क्या सभी ट्रेन की पटरियों में हमेशा करंट आता है? क्यों उसे टच नहीं करना चाहिए

क्या रेलवे की सभी पटरियों में बिजली का करंट बहता है? जानिए ट्रेन को बिजली कैसे मिलती है, पटरी में करंट की क्या भूमिका होती है और रेलवे ट्रैक को छूना या पार करना क्यों खतरनाक हो सकता है.

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इलेक्ट्रिक रेलवे लाइन में ऊपर लगे तारों में करीब 25,000 वोल्ट बिजली होती है. ( Photo: ITG)
इलेक्ट्रिक रेलवे लाइन में ऊपर लगे तारों में करीब 25,000 वोल्ट बिजली होती है. ( Photo: ITG)

ट्रेन में सफर करते समय आपने रेलवे ट्रैक जरूर देखा होगा. दो लोहे की पटरियां, उनके नीचे लगी स्लीपर और आसपास बिछे पत्थर. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन पटरियों में करंट आता है या नहीं? क्या ट्रेन की हर पटरी में बिजली दौड़ती रहती है? अगर नहीं, तो फिर रेलवे ट्रैक पर उतरना खतरनाक क्यों माना जाता है?

दरअसल, रेलवे ट्रैक और ट्रेन को बिजली मिलने का तरीका थोड़ा अलग है. हर पटरी में लगातार करंट फ्लो नहीं होता , लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पटरी पर उतरना या उसे छूना सुरक्षित है. कुछ रेलवे लाइनों में बिजली से जुड़े उपकरण होते हैं, जबकि कुछ जगहों पर ट्रेन के गुजरने और सिग्नलिंग सिस्टम के कारण भी खतरा हो सकता है. चलिए जानते हैं रेलवे की पटरियों में बिजली कैसे काम करती है और उनसे दूर रहना क्यों जरूरी है.

1. क्या हर रेलवे ट्रैक में करंट आता है?
सभी रेलवे पटरियों में हर समय बिजली का करंट फ्लो नहीं करता. भारत में कई रेलवे लाइनें इलेक्ट्रिक ट्रेनों के लिए इस्तेमाल होती हैं, जबकि कुछ जगहों पर डीजल इंजन वाली ट्रेनें भी चलती हैं. हालांकि, किसी लाइन पर इलेक्ट्रिक ट्रेन चलती है या नहीं, सिर्फ इसी आधार पर पटरी को सुरक्षित नहीं माना जा सकता.

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इलेक्ट्रिक ट्रेनों को आमतौर पर ऊपर लगे बिजली के तारों से बिजली मिलती है. भारत की ज्यादातर बिजली मुख्य रेलवे लाइनों पर इन तारों में करीब 25,000 वोल्ट यानी 25 किलो वोल्ट की बिजली होती है. ट्रेन के ऊपर लगा पैंटोग्राफ नाम का उपकरण इन तारों से बिजली लेता है. ऊपर लगे बिजली के तार और नीचे की रेल की पटरी एक ही चीज नहीं हैं. बिजली देने वाले तार में बहुत ज्यादा वोल्टेज होता है, जबकि पटरियों का इस्तेमाल ट्रेन के पहियों को रास्ता देने के साथ-साथ कुछ बिजली और सिग्नलिंग सिस्टम में भी किया जाता है.

2. फिर रेलवे की पटरियों में बिजली क्यों होती है?
रेलवे ट्रैक में बिजली से जुड़े सिस्टम कई काम करते हैं. इन्हें समझने के लिए तीन बातें जानना जरूरी है.

पहली वजह: सिग्नलिंग सिस्टम
रेलवे में यह पता लगाना जरूरी होता है कि किसी ट्रैक के हिस्से पर ट्रेन मौजूद है या नहीं. इसके लिए कई जगह ट्रैक सर्किट का इस्तेमाल होता है. इसमें रेल की पटरियां इलेक्ट्रिक सर्किट का हिस्सा बनती हैं. जब ट्रेन के पहिए और एक्सल दोनों पटरियों को जोड़ते हैं, तो सर्किट में बदलाव आता है और सिस्टम को ट्रेन की मौजूदगी का पता चल सकता है. इसका मतलब यह नहीं है कि पूरी पटरी में घर की बिजली के तार जैसी लगातार तेज बिजली बह रही है. ट्रैक सर्किट का काम ट्रेन का पता लगाने के लिए इलेक्ट्रिकल सिग्नल का इस्तेमाल करना है.

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दूसरी वजह: बिजली की वापसी का रास्ता
इलेक्ट्रिक ट्रेन को ऊपर के तारों से बिजली मिलती है. बिजली का इस्तेमाल करने के बाद करंट को वापस विद्युत व्यवस्था तक पहुंचाने के लिए रेल की पटरियों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है. इसे रिटर्न करंट का रास्ता कहा जाता है. इसलिए कुछ परिस्थितियों में पटरी या उससे जुड़े हिस्सों पर खतरनाक वोल्टेज पैदा हो सकता है. यह व्यवस्था रेलवे के डिजाइन और सुरक्षा सिस्टम के अनुसार काम करती है.

तीसरी वजह: पटरी से जुड़े दूसरे इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट
रेलवे ट्रैक के आसपास सिग्नलिंग, बिजली की सप्लाई और दूसरे तकनीकी उपकरण लगे हो सकते हैं. इनकी वायरिंग या किसी खराबी के कारण खतरा पैदा हो सकता है. किसी व्यक्ति के लिए यह देखकर तय करना संभव नहीं है कि कोई पटरी या उससे जुड़ा हिस्सा पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं.

3. अगर पटरी में हमेशा करंट नहीं होता, तो उसे छूना खतरनाक क्यों है?
रेलवे ट्रैक को छूने से बचने की सबसे बड़ी वजह सिर्फ बिजली नहीं, बल्कि ट्रेन से होने वाला खतरा भी है. इसके पीछे कई कारण हैं.

करंट लगने का खतरा: इलेक्ट्रिक रेलवे लाइन में ऊपर लगे तारों में करीब 25,000 वोल्ट बिजली होती है. अगर कोई व्यक्ति इन तारों के संपर्क में आ जाए, तो जानलेवा करंट लग सकता है. इसके अलावा, खराबी या टूटे हुए बिजली के तार के पटरी पर गिरने से भी गंभीर खतरा हो सकता है.

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पटरी में लौटने वाला करंट: इलेक्ट्रिक ट्रेन की बिजली का कुछ करंट वापस लौटने के लिए रेल की पटरियों से गुजरता है. सामान्य व्यवस्था में इसे सुरक्षित तरीके से संभाला जाता है, लेकिन खराबी, टूटी पटरी या दूसरी तकनीकी समस्या के कारण खतरनाक वोल्टेज पैदा हो सकता है. इसलिए यह मानना गलत है कि पटरी को छूने से कभी करंट नहीं लग सकता.

चलती ट्रेन का खतरा: रेलवे ट्रैक पर ट्रेन बहुत तेजी से आ सकती है. कई बार मोड़ या दूसरी आवाजों के कारण ट्रेन का पता देर से चलता है. ट्रेन को अचानक रोकना भी आसान नहीं होता. ऐसे में पटरी पर उतरना या उसे पार करने की कोशिश करना जानलेवा साबित हो सकता है.

टूटे हुए तार और तकनीकी खराबी: अगर बिजली का तार टूटकर ट्रैक पर गिरा हो, तो उसके आसपास के हिस्से भी खतरनाक हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में तार या पटरी को छूने की कोशिश बिल्कुल नहीं करनी चाहिए. तुरंत रेलवे कर्मचारियों या रेलवे सुरक्षा बल को सूचना देनी चाहिए.

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4. क्या ट्रेन के गुजरने के बाद पटरी छूना सुरक्षित है?
सिर्फ इसलिए कि कोई ट्रेन अभी-अभी गुजर गई है, पटरी सुरक्षित नहीं हो जाती. दूसरी ट्रेन किसी भी समय आ सकती है. इसके अलावा, बिजली से जुड़े उपकरणों में खराबी या तार टूटने जैसी स्थिति का पता आम व्यक्ति को नहीं चल सकता. इसलिए पटरी पर उतरकर फोटो लेना, वीडियो बनाना, सामान उठाना या दूसरी तरफ जाने के लिए ट्रैक पार करना खतरनाक है. रेलवे भी लोगों को पटरियां पार करने के बजाय फुट ओवरब्रिज या निर्धारित रास्तों का इस्तेमाल करने की सलाह देता है.

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5. रेलवे ट्रैक पार करने का सही तरीका क्या है?
स्टेशन पर एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाने के लिए फुट ओवरब्रिज या अंडरपास का इस्तेमाल करें. कभी भी ट्रेन के नीचे से निकलने या खड़ी ट्रेन के नीचे से दूसरी तरफ जाने की कोशिश न करें. पटरी पर कोई तार टूटा हुआ दिखाई दे, तो उससे दूर रहें और रेलवे कर्मचारियों को सूचना दें. बच्चों को रेलवे ट्रैक से दूर रखें और उन्हें पटरी पर खेलने न दें. इलेक्ट्रिक ट्रेन के ऊपर लगे तारों या उनके आसपास के उपकरणों को कभी न छुएं.

रेलवे की हर पटरी में हर समय खतरनाक करंट नहीं बहता. लेकिन कुछ इलेक्ट्रिक लाइनों में पटरियां बिजली के रिटर्न सिस्टम का हिस्सा होती हैं और सिग्नलिंग सिस्टम भी उनमें इलेक्ट्रिकल सिग्नल का इस्तेमाल कर सकता है. तकनीकी खराबी के कारण खतरा भी पैदा हो सकता है. इसलिए सबसे जरूरी बात यह है कि रेलवे ट्रैक को कभी सुरक्षित मानकर न छुएं. वहां करंट हो या न हो, चलती ट्रेन और बिजली के उपकरणों से होने वाला खतरा जानलेवा हो सकता है. रेलवे ट्रैक पार करने के लिए हमेशा फुट ओवरब्रिज या अंडरपास का ही इस्तेमाल करें.

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