scorecardresearch
 

धरती के आर-पार सुरंग हो तो दूसरी तरफ पहुंचने में कितना वक्त लगेगा?

कल्पना कीजिए, धरती के एक सिरे से दूसरे सिरे तक एक सीधी सुरंग बना दी जाए. अब अगर आप इस सुरंग में छलांग लगा दें, तो क्या होगा? क्या आप धरती के बीच से होते हुए दूसरी तरफ पहुंच पाएंगे? और अगर हां, तो वहां तक पहुंचने में आखिर कितना वक्त लगेगा? आइए, फिजिक्स के इस दिलचस्प सवाल का जवाब तलाशते हैं.

Advertisement
X
सेंटर को पार करने के बाद ग्रैविटी उसे दूसरी तरफ की दिशा में खींचेगी (Photo: Ai Generated)
सेंटर को पार करने के बाद ग्रैविटी उसे दूसरी तरफ की दिशा में खींचेगी (Photo: Ai Generated)

 धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक बिल्कुल सीधी सुरंग बना दी जाए. अब आप उस सुरंग में छलांग लगा दें. सवाल है- क्या आप धरती के दूसरी तरफ निकल पाएंगे और अगर हां, तो इसमें कितना वक्त लगेगा? इस सवाल का जवाब सुनकर शायद आपको यकीन न हो. आइये जानते हैं इस सवाल का जवाब कि आखिर कितना वक्त लगेगा.

यह कोई साइंस-फिक्शन कहानी नहीं, बल्कि फिजिक्स का एक मशहूर थॉट एक्सपेरिमेंट है. हालांकि, सफर का सही समय इस बात पर निर्भर करता है कि धरती के अंदर के घनत्व और गुरुत्वाकर्षण को किस मॉडल से समझा जा रहा है.

क्लासिक फिजिक्स मॉडल में माना जाता है कि धरती के अंदर पदार्थ का घनत्व हर जगह एक जैसा है. अगर धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक, बिल्कुल सीधी सुरंग बना दी जाए और वह धरती के सेंटर से होकर गुजरे, तो उसमें छलांग लगाने वाला व्यक्ति ग्रैविटी की वजह से नीचे की तरफ गिरने लगेगा.शुरुआत में वह तेजी से स्पीड पकड़ेगा. जैसे-जैसे वह धरती के सेंटर की तरफ जाएगा, उसकी स्पीड बढ़ती जाएगी.

धरती के सेंटर पर उसकी स्पीड सबसे ज्यादा होगी.

इसके बाद स्थिति बदल जाएगी. सेंटर को पार करने के बाद ग्रैविटी उसे दूसरी तरफ की दिशा में खींचेगी. उसकी स्पीड धीरे-धीरे कम होती जाएगी और दूसरी सतह के करीब पहुंचते-पहुंचते स्पीड फिर जीरो हो जाएगी.इस आइडियल मॉडल में एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने में करीब 42 मिनट लगते हैं.इस दौरान धरती के सेंटर के पास उसकी स्पीड लगभग 7.9 किलोमीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकती है.

Advertisement

लेकिन बात इतनी सिंपल भी नहीं है

यहीं पर यह सवाल और दिलचस्प हो जाता है. ये दुनिया कोई ऐसी गेंद नहीं है जिसके अंदर हर जगह एक जैसा पदार्थ भरा हो. इसकी अलग-अलग लेयर्स का डेंसिटी अलग है. क्रस्ट और मेंटल से नीचे जाने पर डेंसिटी बढ़ती जाती है और कोर के आसपास यह काफी ज्यादा हो जाता है. यानी अगर कैलकुलेशन में इस दुनिया की वास्तविक आंतरिक डेंसिटी को शामिल किया जाए तो नतीजा बदल जाता है.

2015 में मैकगिल यूनिवर्सिटी के छात्र अलेक्जेंडर क्लोट्ज ने इसी सवाल का एक अधिक रियलिस्टिक मॉडल तैयार किया था. इसमें धरती के अंदर घनत्व के वास्तविक डिस्ट्रीब्यूशन को ध्यान में रखा गया.इस कैलकुलेशन के मुताबिक धरती के आर-पार यह थ्योरिटिकल जर्नी करीब 38 मिनट में पूरी हो सकती है.यानी इस सवाल का जवाब सिर्फ 42 मिनट नहीं है. धरती के अंदर घनत्व को ज्यादा रियलिस्टिक तरीके से शामिल करने पर समय करीब 38 मिनट तक आ सकता है.

क्या छोटी सुरंग में भी इतना ही समय लगेगा?

अब एक और दिलचस्प सवाल सोचिए.अगर सुरंग धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक न जाकर सिर्फ दो शहरों को जोड़े, और वह धरती के अंदर से होकर जाए, तो क्या सफर का समय बहुत कम हो जाएगा?

लेकिन असली धरती के अंदर कूदना लगभग नामुमकिन है.अब तक की कैलकुलेशन सुनने में आसान लगती है, लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात छिपी है.ये सभी कैलकुलेशन आइडियल कंडीशंस पर आधारित हैं.वास्तविक धरती के अंदर ऐसी सुरंग बनाना आज की टेक्नोलॉजी से लगभग असंभव है.

Advertisement

सबसे बड़ी समस्या है टेम्परेचर.

जैसे-जैसे धरती के अंदर जाते हैं, तापमान बेहद ज्यादा होता जाता है. आउटर कोर में पदार्थ लिक्विड अवस्था में है, जबकि इनर कोर अत्यधिक तापमान और प्रेशर के बावजूद सॉलिड अवस्था में रहता है.

दूसरी समस्या है प्रेशर.

धरती के अंदर हजारों किलोमीटर नीचे जाने पर ऊपर मौजूद चट्टानों और पदार्थ का दबाव बेहद ज्यादा हो जाता है. ऐसी परिस्थितियों में किसी सामान्य मटेरियल से बनाई गई सुरंग को स्थिर रखना बेहद मुश्किल होगा.

सुरंग में हवा भर दी जाए तो क्या होगा?

अब कैलकुलेशन में एक और चीज जोड़िए- एयर रेजिस्टेंस. 42 या 38 मिनट वाले आइडियल कैलकुलेशन में आम तौर पर माना जाता है कि सुरंग के अंदर हवा नहीं है और कोई फ्रिक्शन नहीं है.लेकिन अगर सुरंग में हवा मौजूद हो तो गिरते हुए व्यक्ति पर ड्रैग फोर्स काम करेगा.

जैसे-जैसे उसकी स्पीड बढ़ेगी, हवा का रेजिस्टेंस भी बढ़ेगा. इससे उसकी गति कम होगी और वह थ्योरिटिकल मैक्सिमम स्पीड तक शायद पहुंच भी न पाए.

कुछ अलग-अलग कैलकुलेशन में एयर रेजिस्टेंस को शामिल करने पर यह यात्रा बेहद लंबी हो सकती है. कुछ एक्सट्रीम असम्प्शंस में थ्योरिटिकल जर्नी का समय करीब 1.8 साल तक पहुंचने का अनुमान भी सामने आया है.

हालांकि, इसे वास्तविक धरती के अंदर किसी इंसान के सफर का निश्चित समय नहीं माना जा सकता. यह अलग-अलग असम्प्शंस पर आधारित मैथमैटिकल मॉडल है.

Advertisement

इंसानों ने धरती के अंदर कितनी खुदाई की है?

धरती का डायमीटर करीब 12,742 किलोमीटर है.अब इसकी तुलना इंसानों की सबसे गहरी ड्रिलिंग से कीजिए.

सोवियत संघ का कोला सुपरडीप बोरहोल इंसानों की सबसे गहरी साइंटिफिक ड्रिलिंग प्रोजेक्ट्स में से एक था. इसकी गहराई करीब 12.3 किलोमीटर तक पहुंची थी.यानी पूरी धरती के डायमीटर की तुलना में इंसान अब तक धरती के अंदर सिर्फ बेहद छोटी दूरी तक ही पहुंच पाए हैं.और गहराई बढ़ने के साथ टेम्परेचर और प्रेशर जैसी चुनौतियां और गंभीर होती जाती हैं.

तो क्या सच में धरती के आर-पार जा सकते हैं?

गणित कहता है- एक आइडियल दुनिया में हां.

अगर हम ऐसी सुरंग की कल्पना करें जिसमें हवा न हो, फ्रिक्शन न हो, सुरंग कोलैप्स न करे और इंसान एक्सट्रीम टेम्परेचर और प्रेशर से पूरी तरह सुरक्षित हो, तो धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक गिरने में करीब 40 मिनट लग सकते हैं.

यूनिफॉर्म-डेंसिटी वाले पुराने मॉडल में यह समय करीब 42 मिनट आता है, जबकि धरती के वास्तविक डेंसिटी डिस्ट्रीब्यूशन को ध्यान में रखने वाले कुछ मॉडल्स में यह करीब 38 मिनट तक पहुंच जाता है.लेकिन वास्तविक दुनिया में ऐसा करना फिलहाल संभव नहीं है.

धरती के अंदर की गर्मी, अत्यधिक प्रेशर, अलग-अलग लेयर्स का पदार्थ और इतनी लंबी सुरंग बनाने की तकनीकी चुनौती इसे सिर्फ एक फिजिक्स थॉट एक्सपेरिमेंट बनाती है.

Advertisement

यानी धरती के आर-पार जाने के लिए करीब 12,742 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ेगा, लेकिन फिजिक्स के आइडियल नियमों में यह सफर एक घंटे से भी कम वक्त में पूरा हो सकता है.

और शायद इसी वजह से यह सवाल फिजिक्स के सबसे दिलचस्प सवालों में गिना जाता है- इतनी बड़ी दूरी, लेकिन सिर्फ करीब 40 मिनट!

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement