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जब अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने पेनिसिलिन की खोज की, यही थी पहली एंटीबायोटिक

आज के दिन ही मेडिकल साइंस के इतिहास में एक ऐसी खोज हुई, जिसने चिकित्सा जगत की पूरी तस्वीर बदल दी. आज ही के दिन अलेक्जेंडर फ्लेमिंग नाम के वैज्ञानिक ने पेनिसिलिन की खोज की थी. जिससे एंटिबॉयोटिक दवा बनाई जा सकी.

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आज के दिन ही पेनिसिलिन नाम की दावा की खोज हुई थी (Photo - Pexels)
आज के दिन ही पेनिसिलिन नाम की दावा की खोज हुई थी (Photo - Pexels)

3 सितंबर 1928 इतिहास में यह तारीख मेडिकल साइंस के लिए बेहद खास है. इसी दिन ब्रिटेन के एक वैज्ञानिक ने ऐसी खोज की, जिसने इंसानों को बैक्टीरियल इंफेक्शन के खिलाफ एक बेहद ताकतवर हथियार दिया. इस वैज्ञानिक का नाम था -अलेक्जेंडर फ्लेमिंग और उनकी खोज थी- पेनिसिलिन. यह मेडिकल साइंस के इतिहास में एक क्रांतिकारी खोज थी, जिसने आने वाले भविष्य में इंसानों की उम्र को बढ़ा दिया.

आज अगर किसी को बैक्टीरियल इंफेक्शन होता है तो डॉक्टर एंटीबायोटिक दवाओं का सहारा लेते हैं. लेकिन एक वक्त ऐसा भी था, जब निमोनिया, गोनोरिया और रूमेटिक फीवर जैसी बीमारियां जानलेवा साबित हो सकती थीं. छोटी सी चोट या खरोंच भी शरीर में गंभीर इंफेक्शन फैला सकती थी और डॉक्टरों के पास मरीज को बचाने के लिए बहुत कम विकल्प होते थे. फिर एक दिन लैब में हुई एक 'गलती' ने मेडिकल साइंस का इतिहास बदल दिया.

छुट्टी से लौटे फ्लेमिंग तो पेट्री डिश में दिखी अजीब चीज
3 सितंबर 1928 को लंदन के सेंट मैरी हॉस्पिटल में बैक्टीरियोलॉजी के प्रोफेसर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग छुट्टियां बिताकर वापस लौटे थे. लैब में उन्होंने स्टैफिलोकोकस बैक्टीरिया से भरी कई पेट्री डिश की जांच शुरू की. स्टैफिलोकोकस ऐसे बैक्टीरिया हैं, जो फोड़े, गले के संक्रमण और एब्सेस जैसी समस्याएं पैदा कर सकते हैं.

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इनमें से एक पेट्री डिश ने फ्लेमिंग का ध्यान खींच लिया. उसमें बैक्टीरिया की कॉलोनियां तो थीं, लेकिन एक जगह अजीब तरह से खाली थी. वहां एक फफूंद यानी मोल्ड उग आया था. फ्लेमिंग ने गौर किया कि मोल्ड के आसपास के इलाके में बैक्टीरिया मौजूद नहीं थे. ऐसा लग रहा था जैसे उस फफूंद ने कोई ऐसा पदार्थ छोड़ा हो, जिसने बैक्टीरिया को बढ़ने से रोक दिया हो. यही आगे चलकर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल खोजों में से एक बना.

ब्रेड पर लगने वाली फफूंद जैसी थी यह मोल्ड
फ्लेमिंग ने इस मोल्ड की पहचान पेनिसिलियम नोटेटम के रूप में की. यह उसी परिवार की फफूंद थी, जैसी कभी-कभी ब्रेड पर दिखाई देती है.उन्होंने इस मोल्ड से निकलने वाले पदार्थ को अनौपचारिक तौर पर 'मोल्ड जूस' कहा. जब उन्होंने इसका परीक्षण किया तो पता चला कि यह कई तरह के खतरनाक बैक्टीरिया को मार सकता है या उनकी बढ़त रोक सकता है. इसमें स्ट्रेप्टोकोकस, मेनिंगोकोकस और डिप्थीरिया पैदा करने वाले बैक्टीरिया भी शामिल थे. फ्लेमिंग को समझ आ गया कि उन्होंने कुछ असाधारण खोज लिया है.

1929 में दुनिया के सामने आया पेनिसिलिन
फ्लेमिंग और उनके सहयोगियों ने मोल्ड से शुद्ध पेनिसिलिन निकालने की कोशिश की. लेकिन यह काम आसान नहीं था. पेनिसिलिन बेहद अस्थिर पदार्थ था और उसे स्थिर रूप में तैयार करना मुश्किल साबित हुआ. उनके सहायक स्टुअर्ट क्रैडॉक और फ्रेडरिक रिडली ने इसे अलग करने की कोशिश की. वे केवल कच्चे पदार्थ के घोल तैयार कर पाए.

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इसके बावजूद फ्लेमिंग ने अपनी रिसर्च को आगे बढ़ाया और जून 1929 में British Journal of Experimental Pathology में अपने निष्कर्ष प्रकाशित किए. हालांकि उस समय उन्होंने पेनिसिलिन के इलाज में इस्तेमाल होने की संभावना का केवल संक्षिप्त उल्लेख किया था. बाद में इसी खोज ने एंटीबायोटिक युग की शुरुआत का रास्ता खोला.

एंटीबायोटिक से पहले इंफेक्शन का इलाज कितना मुश्किल था? आज किसी बैक्टीरियल इंफेक्शन के लिए एंटीबायोटिक मिलना सामान्य बात लगती है. लेकिन पेनिसिलिन से पहले की दुनिया बिल्कुल अलग थी. अस्पतालों में ऐसे मरीज बड़ी संख्या में आते थे, जिन्हें किसी कट या मामूली खरोंच से गंभीर इंफेक्शन हो गया था. कई बार शरीर में बैक्टीरिया फैलने से ब्लड पॉइजनिंग जैसी जानलेवा स्थिति पैदा हो जाती थी.

डॉक्टरों के पास ऐसे मरीजों के लिए बहुत सीमित विकल्प थे. वे इलाज करते, लेकिन कई मामलों में उन्हें सिर्फ इंतजार करना पड़ता था कि मरीज का शरीर इंफेक्शन से लड़ पाएगा या नहीं. पेनिसिलिन ने इस तस्वीर को बदलना शुरू किया.

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