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भारी विरोध के बाद बैकफुट पर वसुंधरा सरकार, सेलेक्ट कमेटी को भेजा विवादित विधेयक

जब यह अध्यादेश विधानसभा में पेश किया गया तो इसका विरोध दो बीजेपी विधायकों ने भी किया. बीजेपी विधायक नरपत सिंह राजवी और घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि ये अध्यादेश बीजेपी के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के विरोध में लाया गया अध्यादेश है.

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वसुंधरा राजे, मुख्यमंत्री राजस्थान
वसुंधरा राजे, मुख्यमंत्री राजस्थान

पांच दिनों की किरकिरी के बाद आखिरकार वसुंधरा सरकार ने लोकसेवकों पर बिना इजाजत मुकदमा नहीं दर्ज करने वाले विवादित बिल प्रवर समिति में भेजने के नाम पर ठंडे बस्ते में डाल दिया है. गौरतलब है कि 6 सितंबर 2017 को जारी इस विवादित अध्यादेश को बिल के रुप में सोमवार को वसुंधरा सरकार के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने विधानसभा में रखा था. उसके बाद देश भर में हंगामा मचा हुआ था.

सोमवार देर शाम वसुंधरा राजे ने अपने मंत्रियों की बैठक बुलाकर इस विधेयक में परिवर्तन की बात कही थी. मंगलवार को जैसे ही विधानसभा कार्यवाही शुरू हुई विपक्ष ने इस बिल के विरोध में बेल में आकर विरोध करना शुरू कर दिया. हंगामे के बीच गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने घोषणा की और सदन के सदस्यों की मांग पर इस बिल को प्रवर समीति को भेजने का एलान किया.

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42 दिन जारी रहेगा विवादित अध्यादेश

कटारिया ने घोषणा की कि दो महीने के अंदर 15 सदस्यों की प्रवर समिति बनेगी जिसके अध्यक्ष गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया रहेंगे और इसमें सभी दलों के सदस्य रहेंगे. प्रवर समिति के सुझाव के बाद अगले सत्र में संसोधित बिल पेश किया जाएगा. लेकिन कटारिया ने साफ किया कि अगले 42 दिनों तक ये विवादित अध्यादेश जारी रहेगा जब तक प्रवर समीति में ये विधेयक नहीं जाता है.

इससे पहले संसदीय कार्यमंत्री राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि सरकार के बारे में ऐसा भ्रम फैला था कि वो मीडिया और ज्यूडिश्यरी को काबू में करना चाहती है जबकि ऐसा नहीं था. इसीलिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इसमें बदलाव के लिए कहा है.

बीजेपी में बिल पर असंतोष

इससे पहले बीजेपी के अंदर ही इस विधेयक को लेकर असंतोष देखने के मिला.विरोध करनेवाले बीजेपी विधायकों में घनश्याम तिवाड़ी और नरपत सिंह राजवी के अलावा प्रहलाद गुंजल, कैलाश भंसाली और ज्ञानदेव आहूजा भी शामिल हो गए. घनश्याम तिवाड़ी ने दावा किया कि ज्यादातर विधायक इस बिल के खिलाफ हैं.

सचिन पायलट ने बताया जनता की जीत

कांग्रेस ने इस बिल को ही वापस लेने के लिए सदन के बेल में हंगामा किया जिसके बाद सदन को एक बजे तक के लिए स्थगित करना पड़ा. बिल को पारित नहीं होने को कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने कांग्रेस पार्टी और जनता की जीत बताया और कहा कि जब तक ये बिल वापस नहीं होता कांग्रेस इसका विरोध करती रहेगी.

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पत्रकारों ने भी किया विरोध

उधर आज जयपुर के पत्रकारों ने भी इस बिल का विरोध किया और काली पट्टी बांध कर प्रेस क्लब से विधानसभा तक मार्च किया और गिरफ्तारियां दीं. सेशन कोर्ट में वकीलों ने भी इस बिल के खिलाफ प्रदर्शन किया.

बीजेपी नेता ने लगाए सरकार पर गंभीर आरोप

वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ बीजेपी के वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवारी ने गंभीर आरोप लगाए हैं. तिवारी का कहना है कि सरकार ने मूर्ख (सदन को) बनाया है. तिवारी कहते हैं कि सरकार ने एक चयन समिति को विवादित अध्यादेश के बजाय दूसरा अध्यादेश भेजा है.

सोमवार शाम वसुंधरा ने की थी पुनर्विचार की बात

इससे पहले सोमवार शाम को ही राजस्थान की मुख्यमंत्री चहुंओर उठे विरोध के चलते अध्यादेश को लेकर बैकफुट पर नजर आ रही थीं. उन्होंने सोमवार शाम अपने मंत्रियों को आवास पर बुलाया था और उन्हें अध्यादेश पर एक बार फिर विचार करने का निर्देश दिया था.

राजस्थान सरकार के इस विवादित अध्यादेश को कांग्रेस ने काला कानून बताते हुए जोरदार विरोध किया. इसके खिलाफ कांग्रेस ने जहां सदन से वाक आउट किया वहीं कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की अगुवाई में विधानसभा के बाहर प्रदर्शन किया गया. प्रशासन ने कांग्रेस के विरोध मार्च की इजाजत नहीं दी तो कांग्रेस ने गिरफ्तारियां दी. सचिन पायलट ने इसे काला कानून बताते हुए कहा कि जब तक ये अध्यादेश वापस नहीं होगा तब तक हम चैन से नही बैठेंगें.

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जब यह अध्यादेश विधानसभा में पेश किया गया तो इसका विरोध दो बीजेपी विधायकों ने भी किया. बीजेपी विधायक नरपत सिंह राजवी और घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि ये अध्यादेश बीजेपी के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के विरोध में लाया गया अध्यादेश है. इसलिए हम इसका समर्थन नहीं करेंगे. राजवी ने कहा कि ये बिल्कुल गलत कानून है. इससे भ्रष्टाचार बढ़ेगा.

सोमवार को इस विवादित अध्यादेश की लड़ाई राजस्थान हाईकोर्ट भी पहुंच गई. इस अध्यादेश को एक वकील ने चुनौती दी है. जानकारी के मुताबिक वकील ए. के. जैन ने राजस्थान हाईकोर्ट में वसुंधरा राजे सरकार के अध्यादेश को चुनौती दी है.

द एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने राजस्थान सरकार से उस हानिकारक अध्यादेश को वापस लेने की मांग की जो लोकसेवकों, न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों के खिलाफ आरोपों पर उसकी मंजूरी के बिना रिपोर्टिंग करने से मीडिया को रोकता है. गिल्ड ने एक बयान में कहा कि यह अध्यादेश मीडिया को परेशान करने वाला एक खतरनाक यंत्र है. बयान में कहा गया है, "ऐसा दिख रहा है कि राज्य सरकार का पिछले महीने जारी अध्यादेश बजाहिर फर्जी प्राथमिकी से न्यायपालिका और नौकरशाही की रक्षा करने के लिए लाया गया है."

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