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परिसीमन पर लड़ाई क्या है? महिला आरक्षण पर सरकार का दांव भी समझ लीजिए

महिला आरक्षण और सीटों के परिसीमन से संबंधित तीन संशोधन बिल मोदी सरकार लेकर आ रही है, जिसे संसद में पेश किया जाएगा. इसके लिए तीन दिन का विशेष संसद का सत्र बुलाया गया है, लेकिन संशोधन बिल को लेकर सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं. अब देखना है कि सरकार कैसे इसे पास कराती है?

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महिला आरक्षण के साथ परिसीमन बिल पास कराने का प्लान (Photo-PTI)
महिला आरक्षण के साथ परिसीमन बिल पास कराने का प्लान (Photo-PTI)

देश की राजनीति एक बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ी है. आज से संसद का विशेष सत्र शुरू हो रहा है, जिसमें तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए जाएंगे. इनका उद्देश्य 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून- नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पूरी तरह लागू करना है.

मोदी सरकार ने लोकसभा में पेश करने के लिए तीन बिलों की सूची जारी की है. इनका मकसद 2029 तक महिलाओं के लिए आरक्षण कानून को लागू करना और लोकसभा की सदस्य संख्या को बढ़ाकर 850 तक करना है.

केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल पहले दो बिल पेश करेंगे, वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीसरा बिल पेश करेंगे. लोकसभा की कार्य मंत्रणा समिति ने इस चर्चा के लिए 18 घंटे का समय तय किया है, जो शुक्रवार तक भी चल सकती है. लोकसभा से पास होने के बाद राज्यसभा में इन बिलों पर चर्चा होगी. परिसीमन इस रणनीति का सबसे पेचीदा हिस्सा है.

कौन से तीन विधेयक पेश होने हैं?

1. केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026
दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तय करना है.

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2. संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026
जनसंख्या की नई परिभाषा, बढ़ती आबादी के मद्देनजर संसद में सदस्यों की संख्या को बढ़ाना इसका मकसद.

3. परिसीमन विधेयक 2026
लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों की संख्या बढ़ाने की योजना है. सीटों का फिर से निर्धारण होगा.

सरकार के कदम से क्या बदल सकता है?

ये तीनों विधेयक पास होते हैं तो 2029 के आम चुनाव से ही महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू होने का रास्ता साफ हो सकता है. ये प्रस्ताव 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर आधारित हैं, जिसमें महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान था. 

सबसे बड़ा प्रस्ताव- लोकसभा की सीटों को बढ़ाना. अभी लोकसभा में 543 सीटें हैं, लेकिन सरकार चाहती है कि इन्हें बढ़ाकर अधिकतम 850 किया जाए, ताकि बढ़ती जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व बेहतर हो सके.

दूसरा अहम प्रस्ताव- सरकार ने सुझाव दिया कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई (33%) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएं, ताकि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ सके.

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हालांकि उस कानून को लागू करने की शर्त ये थी कि पहले नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन हो. उस समय चिंता जताई गई थी कि ये आरक्षण लागू होने में काफी समय (शायद एक दशक या उससे ज्यादा) लग सकता है. अब नए विधेयकों के जरिए सरकार उस प्रक्रिया को तेज करना चाहती है, ताकि 2029 के आम चुनाव तक महिलाओं को आरक्षण मिल सके.

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कैसे बदलेगी राजनीतिक दशा और दिशा
दक्षिण भारत के कई राज्यों को डर है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा होने से उनकी राष्ट्रीय स्तर पर ताकत कम हो सकती है. हालांकि, सरकार का कहना है कि सीटें घटेंगी नहीं, बल्कि सभी राज्यों की सीटें बढ़ेंगी, जिससे संतुलन बना रहेगा. फिर भी, क्षेत्रीय दल इसे अपने प्रभाव में संभावित कमी के रूप में देख रहे हैं. कुल मिलाकर, ये सिर्फ एक विधेयक नहीं, बल्कि आने वाले समय की राजनीति की दिशा तय करने वाला कदम है.

असल में, ये कहानी 2023 से शुरू होती है, जब संसद ने “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” पारित किया था. इस कानून में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान तो था, लेकिन इसे लागू करने के लिए पहले नई जनगणना और परिसीमन जरूरी बताया गया था. इसी कारण कई लोगों को लगा कि इस बदलाव को जमीन पर उतरने में काफी समय लग सकता है.

लेकिन हर कहानी में एक दूसरा पक्ष भी होता है. जैसे ही ये विधेयक सामने आए, विपक्षी दलों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. उनका कहना है कि यह कदम पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले महिलाओं को आकर्षित करने की कोशिश है और इसे उन्होंने तुष्टिकरण की राजनीति बताया. अब सबकी नजरें उस विशेष संसद सत्र पर टिकी हैं, जहां तय होगा कि ये प्रस्ताव कानून बनते हैं या नहीं.

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सरकार के समर्थन में उतरी मायावती
संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि कुछ लोग डिलिमिटेशन के गलत आंकड़े दकर महिला आरक्षण मामले में दक्षिण के राज्यों को बरगला रहे हैं. लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण देने में किसी तरह की राजनीति नहीं होनी चाहिए. सभी राजनीतिक पार्टियां नारी शक्ति के लिए एकजुट हैं.

मोदी सरकार के द्वारा लाए जा रहे संशोधन विधेयक के खिलाफ विपक्ष खड़ा नजर आ रहा है, लेकिन बसपा प्रमुख मायावती समर्थन में है. मायावती ने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का स्वागत किया है. उन्होंने इसे ऐतिहासिक कदम बताते हुए इसमें SC, ST और OBC महिलाओं के लिए अलग से कोटा देने की मांग की. मायावती ने कहा कि उनकी पार्टी महिलाओं के लिए 50% आरक्षण के पक्ष में है.

राहुल किस बात की जता रहे चिंता

राहुल गांधी ने बुधवार को केंद्र सरकार के प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन के प्रस्तावों पर तीखा हमला बोलते हुए इसे सत्ता कब्जाने की कोशिश करार दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार डिलिमिटेशन (परिसीमन) और जेरीमेंडरिंग (चुनावी क्षेत्रों में हेरफेर) के जरिए सत्ता हथियाने की कोशिश कर रही है. राहुल गांधी ने साफ किया कि कांग्रेस पार्टी महिला आरक्षण के मुद्दे पर पूरी तरह समर्थन में है.

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उन्होंने याद दिलाया कि संसद ने 2023 में महिला आरक्षण बिल को सर्वसम्मति से पास किया था, जो अब संविधान का हिस्सा है. लेकिन मौजूदा प्रस्ताव का महिला आरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है. राहुल गांधी ने कहा कि ओबीसी, दलित और आदिवासी समुदायों का चोरी नहीं होने दी जाएगी.

साथ ही आरोप लगाया कि सरकार जातिगत जनगणना के आंकड़ों को नजरअंदाज कर रही है. ऐसे में दक्षिण भारत, उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम और छोटे राज्यों के साथ किसी तरह का अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

परिसीमन के खिलाफ विपक्ष एकजुट

दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर विपक्ष की अहम बैठक हुई. इसमें करीब 20 दलों के वरिष्ठ नेताओं ने हिस्सा लिया. बैठक के बाद विपक्ष ने एकजुट रुख दिखाते हुए सरकार के तरीके पर गंभीर आपत्तियां जताईं. इस बैठक में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, UBT के संजय राउत, AAP के संजय सिंह, DMK के टी.आर. बालू, CPI की एनी राजा, IUML के ई.टी. मोहम्मद बशीर, के.सी. वेणुगोपाल और कपिल सिब्बल भी मौजूद रहे. 

आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भी सहयोगियों के साथ पहुंचे. इसके अलावा टीएमसी सांसद सागरिका घोष, एनसीपी (एसपी) की सांसद सुप्रिया सुले, निलोत्पल बसु और एन.के. प्रेमचंद्रन भी चर्चा में शामिल हुए. कुछ नेता वर्चुअली भी जुड़े. इनमें उद्धव ठाकरे, हेमंत सोरेन और दीपांकर भट्टाचार्य शामिल रहे. बैठक के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्ष का साझा रुख स्पष्ट किया.

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उन्होंने कहा कि वे विधेयक के सिद्धांत के पक्ष में हैं, लेकिन सरकार के तरीके पर गंभीर आपत्ति जताई. खड़गे ने आरोप लगाया कि ये प्रक्रिया राजनीति से प्रेरित है और विपक्ष को दबाने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने दोहराया कि विपक्ष महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है,

बल्कि इसके प्रस्तुतिकरण और लागू करने के तरीके पर सवाल उठा रहा है. खड़गे ने कहा कि हम संसद में एकजुट होकर लड़ेंगे. हमने तय किया है कि इस विधेयक और इसके संशोधनों के खिलाफ सामूहिक रूप से आवाज उठाएंगे.


 

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