दिल्ली में प्रदर्शन और मार्च के दौरान महिला पत्रकारों पर हमले और बदसलूकी के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि आज के दौर में यह समझना मुश्किल हो गया है कि कौन पत्रकार है और कौन सिर्फ रील बनाने के लिए वीडियो रिकॉर्ड कर रहा है.
तुषार मेहता ने कहा, "कई लोग हाथ में माइक लेकर कहते हैं कि वे रिकॉर्डिंग कर रहे हैं और फिर उसे रील बनाकर अपलोड कर देते हैं. ऐसे में हमें नहीं पता होता कि कौन रील मेकर है और कौन स्वतंत्र पत्रकार." उन्होंने कहा कि आज तकनीक के दौर में मोबाइल रखने वाला कोई भी व्यक्ति पत्रकार बन सकता है.
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सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान जिन महिला पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार हुआ, वे अपना काम कर रही थीं. उन्होंने कहा कि पत्रकार अपने काम करने के अधिकार का इस्तेमाल कर रही थीं और मामले में अंतरिम आदेश दिया जाना चाहिए.
जयसिंह ने एक समिति बनाने का सुझाव भी दिया, जिसकी अध्यक्ष महिला हो. उन्होंने कहा कि समिति के लिए उनके पास कुछ नाम हैं. इनमें सुप्रीम कोर्ट के कुछ सेवानिवृत्त जज और पुलिस के मौजूदा या सेवानिवृत्त अधिकारी शामिल हैं.
सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी कानून लागू कराने वाली एजेंसियों को निर्देश दिया कि वे अपने पास मौजूद सीसीटीवी फुटेज और दूसरे डिजिटल सबूत सुरक्षित रखें. निजी पक्षों को भी ऐसे सबूत जमा करने की छूट दी गई है.
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कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 172 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नोटिस भी जारी किया. इस धारा के तहत लोगों को पुलिस अधिकारी के कानूनी निर्देशों का पालन करना होता है. निर्देशों का उल्लंघन करने पर पुलिस संबंधित व्यक्ति को हिरासत में ले सकती है या गिरफ्तार कर सकती है.