2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में शरजील इमाम और उमर खालिद ने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. दोनों ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत दर्ज मामले में उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी.
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी याचिकाओं में दोनों ने कहा है कि अभियोजन पक्ष अब तक संरक्षित गवाहों से पूछताछ नहीं कर पाया है. उनका यह भी कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाई गई एक साल की रोक की अवधि खत्म होने वाली है. ऐसे में उन्हें लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन होगा.
यह भी पढ़ें: 8 साल बाद AMU में छात्र संघ चुनाव, भाषणों में गूंजे शरजील इमाम, उमर खालिद और गाजा के मुद्दे
छह साल से ज्यादा समय से जेल में हैं शरजील इमाम
शरजील इमाम ने अपनी याचिका में कहा है कि इस मामले में 25 सितंबर 2020 को चार्जशीट दाखिल की गई थी. इसमें 18 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चल रहा है और अभियोजन पक्ष ने 900 से ज्यादा गवाहों की सूची दी है. इनमें 47 संरक्षित गवाह भी शामिल हैं. इमाम का कहना है कि अंडरट्रायल के तौर पर छह साल और नौ महीने जेल में रहने के बावजूद अभियोजन पक्ष अब तक एक भी गवाह से पूछताछ नहीं कर पाया है. उमर खालिद ने भी अपनी याचिका में संरक्षित गवाहों की गवाही नहीं होने और एक साल की रोक की अवधि खत्म होने का हवाला दिया है. उन्होंने कहा है कि लंबे समय तक जेल में रहना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.
हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की थी जमानत?
दिल्ली हाई कोर्ट ने 30 सितंबर को उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी थी. हाई कोर्ट ने कहा था कि वह न्यायिक अनुशासन से बंधा है और सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के आदेश में बदलाव नहीं कर सकता. उस आदेश में कहा गया था कि दोनों आरोपी संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने या एक साल बीतने के बाद, जो भी पहले हो, जमानत के लिए दोबारा अर्जी दे सकते हैं. दोनों ने ट्रायल कोर्ट के 4 जुलाई के उस फैसले को भी चुनौती दी थी, जिसमें तीसरी बार उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी. ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि उसके पास सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
क्या है पूरा मामला?
उमर खालिद और शरजील इमाम पर फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की कथित बड़ी साजिश में शामिल होने का आरोप है. इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 700 से ज्यादा लोग घायल हुए थे. ये हिंसा नागरिकता संशोधन कानून (CAA), 2019 और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों के दौरान भड़की थी.
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल इस मामले की जांच कर रही है. खालिद सैफी और आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत कई अन्य लोगों को भी कथित बड़ी साजिश के मामले में आरोपी बनाया गया है. शरजील इमाम को इस मामले में 25 अगस्त 2020 को गिरफ्तार किया गया था, जबकि उमर खालिद की गिरफ्तारी 13 सितंबर 2020 को हुई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में क्या कहा था?
2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने दोनों को जमानत देने से इनकार कर दिया था. इसके बाद 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा था. हालांकि, शीर्ष अदालत ने सह-आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को राहत दी थी.
यह भी पढ़ें: 'फ्री कश्मीर, फ्री शरजील इमाम', जामिया यूनिवर्सिटी की दीवारों पर लिखे विवादित नारे
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने तब कहा था कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ UAPA के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है. कोर्ट ने यह भी कहा था कि दोनों संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने या एक साल बीतने के बाद जमानत के लिए नई अर्जी दाखिल कर सकते हैं. अदालत ने ट्रायल में देरी की उनकी दलील को स्वीकार नहीं किया था.
वहीं, 22 मई को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के सह-आरोपी अब्दुल खालिद सैफी और तस्लीम अहमद को छह महीने की अंतरिम जमानत दी थी. अदालत ने UAPA के तहत जमानत की सख्त शर्तों के कारण विचाराधीन कैदियों को लंबे समय तक जेल में रखने के मुद्दे को बड़ी बेंच के पास भेजा था.