मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने हाल ही में भारत समर्थित थिलामाले ब्रिज को भारत और मालदीव के बीच लंबे समय से चले आ रहे रिश्तों का प्रतीक बताया था. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार के योगदान की भी तारीफ की. लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद मालदीव के एक रणनीतिक रूप से अहम इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में चीन की भूमिका फिर चर्चा में आ गई है.
फरवरी 2026 में मालदीव पोर्ट्स लिमिटेड यानी MPL ने ऐलान किया था कि चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी यानी CHEC को थिलाफुशी पोर्ट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के पहले चरण का ठेका दिया गया है. यह प्रोजेक्ट लोकल हार्बर रिलीफ प्रोजेक्ट के नाम से भी जाना जाता है.
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कमर्शियल पोर्ट विकसित करने का मालदीव का प्लान
थिलाफुशी मालदीव की राजधानी माले के पश्चिम में स्थित एक आर्टिफिशियल आईलैंड है. इसे 1991 में नगर निगम के कचरे के लिए लैंडफिल के तौर पर बनाया गया था. अब यहां एक बड़े कमर्शियल पोर्ट को विकसित करने की योजना है, ताकि माले के मौजूदा बंदरगाहों पर बढ़ते दबाव को कम किया जा सके.
पहले चरण में मौजूदा 5 हेक्टेयर पोर्ट को बढ़ाकर 20 हेक्टेयर किया जाएगा. इसमें 650 मीटर की क्वे वॉल, 125 मीटर का रोडसाइड जेट्टी, बॉन्डेड वेयरहाउस और एक्स-रे सुविधा शामिल होगी. ऑटोमेटेड सर्विसेज के जरिए सामान की क्लियरेंस प्रक्रिया को करीब 5 दिन से घटाकर 48 घंटे करने का लक्ष्य रखा गया है.
मालदीव की योजना मुख्य बिजनेस पोर्ट की गतिविधियों को माले के माफान्नु इलाके से थिलाफुशी ले जाने की भी है. मुइज्जू ने फरवरी में कहा था कि यह स्थानांतरण नवंबर 2027 तक होने की उम्मीद है.
थिलाफुशी भारत के ग्रेटर माले प्रोजेक्ट का हिस्सा
खास बात यह है कि थिलाफुशी भारत के ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट यानी GMCP का भी अहम हिस्सा है. भारत के 400 मिलियन डॉलर के क्रेडिट लाइन और 100 मिलियन डॉलर की ग्रांट से बन रहे इस 6.7 किलोमीटर लंबे प्रोजेक्ट में माले को विलिमाले, गुल्हिफाल्हु और थिलाफुशी से जोड़ा जा रहा है. इसका निर्माण अफकॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर कर रही है.
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यानी एक ही रणनीतिक इलाके में भारत और चीन दोनों की बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं मौजूद हैं. यही वजह है कि इसे सिर्फ कारोबारी प्रोजेक्ट नहीं माना जा रहा.
'इंडिया आउट' अभियान के दम पर सत्ता में आए मुइज्जू
मुइज्जू 2023 में 'इंडिया आउट' अभियान के दम पर सत्ता में आए थे और चीन के करीब माने जाते थे. लेकिन आर्थिक दबाव और मालदीव की वित्तीय जरूरतों के बीच भारत के साथ उनके रिश्तों में बड़ा बदलाव आया. भारत ने मालदीव को वित्तीय मदद भी दी.
हालांकि, थिलाफुशी पोर्ट का चीनी ठेका दिखाता है कि भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने के बावजूद माले ने बीजिंग से दूरी नहीं बनाई है. मालदीव अपनी इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और आर्थिक जरूरतों के लिए दोनों देशों के साथ रिश्ते बनाए रखना चाहता है. ऐसे में मुइज्जू का भारत की ओर झुकाव बढ़ा जरूर है, लेकिन मालदीव की रणनीति फिलहाल भारत और चीन दोनों को साथ रखने की दिखाई देती है.