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आंखों देखी: ये जिद्दी जेनरेशन है... पीढ़ियों के फासले ने इस आंदोलन को समझने नहीं दिया

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के आंदोलनों से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर तक. एक पत्रकार की आंखों देखी में समझिए कि Gen Z के आंदोलन पुराने विरोध प्रदर्शनों से इतने अलग क्यों हैं. कैसे Instagram, मीम्स, AI, फूड डिलीवरी ऐप और डिजिटल नेटवर्किंग ने आंदोलन की तस्वीर बदल दी और क्यों व्यवस्था इस नई पीढ़ी की रणनीति को समय रहते समझ नहीं पाई.

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NEET-UG पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर उतरे थे जिद्दी जेनरेशन. (Photo- ITG)
NEET-UG पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर उतरे थे जिद्दी जेनरेशन. (Photo- ITG)

एक दशक के बाद दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर किसी ऐतिहासिक आंदोलन का गवाह बना है. एक दशक इसलिए कह रहा हूं क्योंकि लगभग 14 साल पहले इसी जंतर-मंतर से भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल आंदोलन शुरू हुआ था. आंदोलनों में बहुत सी समानताएं होती हैं, लेकिन बदलते वक्त के साथ आंदोलन की रूपरेखा भी बदलती है.

एक रिपोर्टर के तौर पर मैंने निर्भया कांड के बाद खड़े हुए आंदोलन को देखा. रामदेव के अनशन और आंदोलन को देखा. अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को भी करीब से कवर किया. एक दशक पहले मिलेनियल पीढ़ी सड़क पर उतरी थी. उसके तौर-तरीके अलग थे. उस समय सरकार और विपक्ष में बैठे लोगों ने 80 और 90 के दशक के पारंपरिक आंदोलन देखे थे. इसलिए उनके लिए मिलेनियल आंदोलन को समझना मुश्किल था. ट्विटर के जरिए लोगों को जोड़कर एक ऑर्गेनिक आंदोलन खड़ा करना उनके लिए विश्वास से परे था.

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अब एक मिलेनियल पत्रकार के तौर पर मैंने नई पीढ़ी, जिसे Gen Z कहा जाता है, उसके आंदोलन और नए तौर-तरीकों को कवर किया.

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जंतर-मंतर पर बीते डेढ़ महीने में जो अनुभव किया, वह मेरे लिए नया इसलिए नहीं था क्योंकि इसी पीढ़ी को मैंने चार साल पहले भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका में तख्तापलट करते देखा था. महिंदा राजपक्षे सरकार और उनके परिवार के भ्रष्टाचार, बढ़ती महंगाई, आर्थिक तंगी और चरमराती अर्थव्यवस्था के खिलाफ बच्चे सड़कों पर उतर आए थे.

श्रीलंका की सरकार ने कर्फ्यू लगाया, इंटरनेट बंद किया, पुलिस, लाठी, आंसू गैस और सेना तक का इस्तेमाल किया. लेकिन वह छात्रों के आंदोलन को कुचल नहीं पाई. फेसबुक और व्हाट्सएप अब सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं रहे थे, बल्कि आंदोलन की रीढ़ बन चुके थे. VPN जैसे जुगाड़ ने सरकार के प्रतिबंधों की धज्जियां उड़ा दीं. जितनी सख्ती बढ़ती गई, आंदोलन उतना ही मजबूत और उग्र होता गया.

एक समय ऐसा आया जब प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के आवास तक पहुंच गए. आखिरकार राजपक्षे परिवार को सत्ता और देश दोनों छोड़कर भागना पड़ा. इसके साथ ही सड़क का आंदोलन भी खत्म हो गया. जो बच्चे सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे, उन्होंने ही बाद में व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी भी उठाई. उन्होंने सड़कों की सफाई की, मानव श्रृंखला बनाई और यह संदेश दिया कि देश की किसी भी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए.

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दो साल के भीतर ऐसा ही आंदोलन मैंने बांग्लादेश में देखा. शेख हसीना सरकार के भ्रष्टाचार, दमनकारी नीतियों और एक विवादित कानून ने वर्षों से पनप रहे गुस्से को विस्फोट में बदल दिया. बांग्लादेश की जिद्दी Gen Z सड़कों पर उतर आई.

सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए वही पुराने तरीके अपनाए. लाठीचार्ज, आंसू गैस, वाटर कैनन, इंटरनेट बंद, सोशल मीडिया पर रोक और कर्फ्यू. लेकिन शेख हसीना सरकार और व्यवस्था में बैठे मिलेनियल से पहले की पीढ़ी यह समझ ही नहीं पा रही थी कि तमाम सरकारी ताकत के बावजूद युवाओं की भीड़ सड़कों पर लगातार कैसे बढ़ रही है.

सरकार और आक्रामक हुई. पुलिस की गोलीबारी में ढाका की सड़कें युवाओं के खून से लाल होने लगीं.

मैंने देखा कि कैसे फेसबुक बांग्लादेश के आंदोलन का चेहरा बन गया. जिस बांग्लादेश ने 1971 में पाकिस्तान से मुक्ति की लड़ाई लड़ी थी, अब उसी देश की तीसरी पीढ़ी शेख हसीना सरकार से मुक्ति के लिए सड़कों पर थी. बंगला नारे सिर्फ जुबान पर नहीं थे, बल्कि मोबाइल स्क्रीन, पोस्टर, बैनर और सोशल मीडिया पर भी छाए हुए थे. सोशल मीडिया ने उन नारों को ऐसी आग दी कि आखिरकार हसीना सरकार भी सत्ता से बाहर हो गई. एक और प्रधानमंत्री को देश छोड़ना पड़ा.

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साल बदला तो बांग्लादेश और श्रीलंका की Gen Z के तौर-तरीके भारत के एक और पड़ोसी देश नेपाल तक पहुंच गए. सरकार से नाराजगी देखते-देखते गुस्से में बदल गई. नेपाल की सरकार ने भी इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाया, सोशल मीडिया पर रोक लगाई और यहीं से नेपाल के आंदोलन का ज्वालामुखी फूट पड़ा. व्हाट्सएप और फेसबुक पीढ़ी ने आधुनिक तरीके अपनाए. नए-नए एप्लिकेशन के जरिए एक-दूसरे से जुड़ते गए. आखिरकार नेपाल में भी सरकार बदल गई.

2026 में आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर पर आया. इस आंदोलन का चेहरा बन गया काक्रोच. एक ऐसा जीव, जो घर में दिख जाए तो हम दवा छिड़ककर भगा देते हैं. लेकिन यहां काक्रोच युवाओं की पहचान बन गया. बेरोजगारी, पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और तमाम समस्याओं से जूझते युवाओं ने खुद को गर्व से काक्रोच मान लिया.

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घटनाक्रम ऐसे बने कि NEET का पेपर लीक हो गया और दिल्ली का जंतर-मंतर काक्रोचों का केंद्र बन गया. लोग जुटते गए, कारवां बढ़ता गया. पीढ़ियों के बीच सोचने, समझने और काम करने के तौर-तरीकों में बदलाव इतना बड़ा था कि सरकार से लेकर समाज तक कोई भी इस आंदोलन को और जमीन के नीचे से मजबूत हो रहे इसके विस्तार को भांप नहीं पाया. फेसबुक और व्हाट्सएप पर डीप स्टेट, चीन और पाकिस्तान की कहानियां फैलती रहीं, लेकिन यह पीढ़ी इस आंदोलन में इंस्टाग्राम पर सवार हो गई. वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, जिसे मिलेनियल अभी सीख रहे हैं और उनसे पहले वाली पीढ़ी अक्सर बेरोजगारों की रील बनाने का अड्डा मानती है.

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इंस्टाग्राम के आगे व्हाट्सएप और फेसबुक बेअसर हो गए. युवाओं ने NEET पेपर लीक के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया और सीधे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को चेहरा बनाकर उनके इस्तीफे की मांग पर अड़ गए. अब मुद्दा था, टार्गेट था, जगह थी और इस लड़ाई के लिए उनके पास मोबाइल फोन हथियार था. इस हथियार के एक ऐप इंस्टाग्राम से जब बुलेट्स निकलने शुरू हुए तो शुरुआत में उनका मजाक बनाया गया. शुरुआती दिनों में जंतर-मंतर को गंभीरता से नहीं लिया गया. लेकिन आंदोलन जमीन के नीचे लगातार बढ़ता रहा. काक्रोचों की संख्या बढ़ रही थी. इंस्टाग्राम की रीलें व्यंग्य के सबसे धारदार हथियार बन चुकी थीं. जंतर-मंतर की रीलें युवाओं के लिए टार्गेट बन गईं और उसी के साथ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी हॉट टॉपिक बन गई.

मोबाइल पीढ़ी को कवर करने के लिए मुझे भी मोबाइल का ही सहारा लेना पड़ा. उनके बीच जाकर ही समझ आया कि जंतर-मंतर वह नहीं है, जो बाहर व्हाट्सएप या फेसबुक पर कहा जा रहा है. इंटरनेट क्रांति ने CJP आंदोलन की पूरी रूपरेखा बदल दी. सोनम वांगचुक के बीतते अनशन के दिनों के साथ भीड़ लगातार बढ़ती रही. खाने-पीने की किल्लत के बारे में युवाओं ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया. कुछ ही घंटों में वह हुआ, जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी.

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स्विगी और जोमैटो के डिलीवरी पार्टनर लगातार खाना लेकर जंतर-मंतर पहुंचने लगे. शुरुआत में मुझे लगा कि बच्चे अपना खाना ऑर्डर कर रहे हैं. लेकिन 24 घंटे के भीतर समझ में आ गया कि उनका खाना कोई और भेज रहा है. तब एहसास हुआ कि आंदोलन से सिर्फ देश नहीं, बल्कि दुनिया जुड़ चुकी है. भारत के कोने-कोने से लेकर दुबई, कतर, इंग्लैंड, अमेरिका और यूरोप में बैठे लोग भी फूड डिलीवरी ऐप के जरिए जंतर-मंतर पर खाना भेज रहे थे. हर ऑर्डर के साथ सिर्फ एक निर्देश होता था कि जंतर-मंतर पर किसी भी प्रदर्शनकारी को खाना बांट देना.

यह खबर भी इंस्टाग्राम पर वायरल हो गई. इसके बाद जंतर-मंतर पर खाना, पानी, जूस, कोल्ड ड्रिंक, दवाइयां और सैनिटरी पैड जैसी जरूरी चीजों की कभी कमी नहीं हुई.

20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान पुलिस की कार्रवाई हुई. मेट्रो के दरवाजे बंद कर दिए गए ताकि छात्र जंतर-मंतर तक पहुंच ही न सकें. लेकिन इंस्टाग्राम पीढ़ी कहां रुकने वाली थी. जिन स्टेशनों पर मेट्रो नहीं रुकी, वहां से छात्र पैदल चल पड़े. जब ऑटो वालों को पुलिस ने जंतर-मंतर जाने से रोका, तो वे आसपास के इलाकों का नाम लेकर पुलिस को चकमा देने लगे और इसकी जानकारी दूसरे युवाओं तक इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए पहुंचाने लगे.

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पुलिस ने जंतर-मंतर पर बैनर और झंडे ले जाने से रोका, तो बच्चों ने AI से पोस्टर बनाए और वहीं पहुंचकर Blinkit के जरिए उनका प्रिंट निकलवा लिया. इलाके में इंटरनेट बंद हुआ तो वे पैदल उन जगहों तक गए, जहां नेटवर्क मिल सके, और वहीं से पोस्ट अपलोड करने लगे.

इंस्टाग्राम पर पोस्ट इतनी तेजी से बढ़ीं कि देश के हर शहर में CJP से जुड़ा कंटेंट ट्रेंड करने लगा. ट्रेंड बढ़ा तो युवा भी सड़कों पर उतर आए. मीम और रीलें इतनी नई और रचनात्मक थीं कि लोग हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते. धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर बना "कुच्चू-पुच्चू, इस्तीफा कब दोगे?" वाला मीम आंदोलन की पहचान बन गया.

इस पीढ़ी के मन में पुलिस, सीआरपीएफ या सरकार का वैसा डर नहीं था जैसा पिछली पीढ़ियों में देखने को मिलता था. ये पुलिस से पूछते थे, "आज भी डंडा चलाओगे?" रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों से कहते थे, "अंकल, एक टियर गैस चला दो प्लीज." बिहार में पुलिस से कहते थे, "वाटर कैनन चला दीजिए ना, कैसी व्यवस्था है आप लोगों की." जिस पुलिस के नाम से हमारी पीढ़ी और हमसे पहले की पीढ़ी डरती थी, उसी डर को इंस्टाग्राम पीढ़ी ने हंसी-मजाक में बदल दिया था.

जिन सुरक्षा बलों से झड़प होती थी, उन्हीं के साथ ये दोस्ती भी कर लेते थे. यह ट्रेंड धीरे-धीरे एक तरह की महामारी बन गया. इंस्टाग्राम खोलते ही पूरा देश जंतर-मंतर पहुंच जाता था. धीरे-धीरे सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान में भी इंस्टाग्राम पोस्ट पर जंतर-मंतर का कब्जा होने लगा. वहां के युवा भी इस आंदोलन को अपनी पीढ़ी से जोड़कर देखने लगे. उनके पोस्ट में भी CJP वाली वाइब दिखाई देने लगी.

आंसू गैस के गोलों का भी मजाक बनने लगा. इंटरनेट बैन भी बेअसर हो गया. बच्चे मास्क पहनकर आने लगे. एक-दूसरे को बताते थे कि आंसू गैस के असर को कैसे कम किया जाए.

पुलिस और सुरक्षा बल भी कई बार उनके सामने बेबस नजर आने लगे. जंतर-मंतर की ड्यूटी पर तैनात कई पुलिसकर्मियों के अपने बच्चे भी NEET पेपर लीक के शिकार रहे थे. उनके भीतर भी छात्रों के प्रति सहानुभूति थी, लेकिन उन्हें सरकारी आदेशों का पालन करना था. इसलिए डंडे चलाने से भी पीछे नहीं हटे. संसद मार्च के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने आंदोलन को दबाने के बजाय और बड़ा कर दिया.

इस पीढ़ी के तौर-तरीकों को सरकारी इंटेलिजेंस भी पूरी तरह समझ नहीं पा रहा था. डीप स्टेट की कहानियां गढ़ी जाने लगीं, लेकिन 16 से 22 साल के युवाओं के बीच बन रही एकजुटता और आंदोलन की धार को समझने में व्यवस्था नाकाम रही.

ऐसे हर बड़े आंदोलन में भारत के दुश्मन फेक न्यूज फैलाकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते रहे, जिसका खुलासा दिल्ली पुलिस ने भी किया. सरकारी एजेंसियां सोशल मीडिया पर जागरूकता अभियान चलाती रहीं, लेकिन उनका संदेश जंतर-मंतर तक पहुंच ही नहीं पाता था, क्योंकि उसी इलाके में इंटरनेट बंद कर दिया गया था. यानी जिनके लिए संदेश था, उन्हीं तक संदेश नहीं पहुंच रहा था.

बच्चे मुझसे कहते थे, "जब हम अपने पिता की नहीं सुनते, तो तुम्हारे पिता की क्यों सुनेंगे?" तीन पीढ़ियों के बीच सोच का यही फासला शायद सबसे बड़ी वजह था कि सरकार इस आंदोलन को पूरी तरह समझ नहीं पा रही थी.

भारत की पुलिसिंग और न्याय व्यवस्था के पारंपरिक तौर-तरीके नई पीढ़ी के आंदोलन की बदलती शक्ल को पहचान ही नहीं पाए. जब सरकार को दबाव महसूस हुआ तो बातचीत शुरू हुई. उधर धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया और तुरंत ही युवा पीढ़ी ने आंदोलन खत्म करने का ऐलान कर दिया. जंतर-मंतर पर जश्न हुआ और फिर सभी अपने-अपने घर लौट गए.

श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और जंतर-मंतर के आंदोलन ने एक बात साफ कर दी. यह जिद्दी जेनरेशन है. इन्हें पुलिस की लाठी, डंडे या प्रतिबंधों से डराकर नहीं रोका जा सकता. इन्हें सिर्फ संवाद से समझा जा सकता है. यही इस नई पीढ़ी की सबसे बड़ी ताकत है.

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