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म्यांमार से जमीन की अदला-बदली करेगा भारत? मणिपुर में विरोध की आहट तेज

भारत और म्यांमार के बीच वर्षों से लंबित सीमा सीमांकन का मामला सुलझाने की दिशा में बातचीत तेज हो गई है. खबर है कि दोनों देश कुछ इलाकों में जमीन की अदला-बदली के विकल्प पर भी विचार कर रहे हैं. हालांकि इस प्रस्ताव ने मणिपुर में राजनीतिक और सामाजिक विरोध की आहट भी पैदा कर दी है.

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भारत और म्यांमार के बीच 1,643Km लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है (इमेज: विकिमीडिया कॉमन्स)
भारत और म्यांमार के बीच 1,643Km लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है (इमेज: विकिमीडिया कॉमन्स)

भारत और म्यांमार का सीमा रेखा तय करने का वर्षों से लंबित मामला जल्द सुलझ सकता है. खबरों के मुताबिक, इसके लिए दोनों देश जमीन की अदला-बदली पर विचार कर रहे हैं, जिसकी सीमा अभी तक तय नहीं हो पाई है. मंगलवार को नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, 'सीमा पर कुछ ऐसे इलाके हैं जिन्हें अभी सुलझाया जाना बाकी है. उन हिस्सों पर बातचीत चल रही है.'

जायसवाल उस सवाल का जवाब दे रहे थे जिसमें कहा गया था कि भारत मणिपुर सीमा पर म्यांमार के साथ जमीन की अदला-बदली पर विचार कर रहा है. हालांकि उन्होंने इन खबरों की पुष्टि नहीं की, लेकिन उन्होंने माना कि सीमा के अनसुलझे हिस्सों को सुलझाने के लिए बातचीत चल रही है.

उनकी यह टिप्पणी अमेरिका की मैगज़ीन 'द डिप्लोमैट' की उस रिपोर्ट के कुछ हफ्ते बाद आई है जिसमें कहा गया था कि भारत ऐसे प्रस्ताव पर सक्रिय रूप से विचार कर रही है. 17 जुलाई की एक रिपोर्ट में मैगजीन ने कहा कि भारत सरकार म्यांमार के साथ मणिपुर की सीमा पर बॉर्डर पिलर 65 और 68 के बीच सीमा तय करने के लिए लगभग 1.4 वर्ग मील जमीन की अदला-बदली के 'प्रस्ताव' की जांच कर रही है. पिलर 65 और 68 के बीच की दूरी लगभग 2.8 किलोमीटर है.

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अदला-बदली के लिए प्रस्तावित इलाका मणिपुर के चंदेल जिले में है, जो म्यांमार के सगाइंग क्षेत्र में काबाव घाटी से सटा हुआ है. सीमा तय करने का काम तीन महीने के भीतर, यानी अगस्त के आसपास पूरा होने की उम्मीद थी.

भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है और फिर म्यांमार के सगाइंग क्षेत्र और चिन राज्य में जाती है. सीमा का ज्यादातर हिस्सा पहाड़ी, जंगली और खुला है, जो उन जातीय समुदायों के इलाकों से होकर गुजरता है जो दोनों तरफ रहते आए हैं.

गृह मंत्रालय के अनुसार, सीमा के लगभग 1,472 किलोमीटर हिस्से को बॉर्डर पिलर के जरिए तय किया गया है, जबकि लगभग 171 किलोमीटर हिस्सा अभी भी अनसुलझा है, जो मुख्य रूप से अरुणाचल प्रदेश के लोहित सेक्टर और मणिपुर की काबाव घाटी में है.

भारत म्यांमार के साथ ज़मीन की अदला-बदली पर क्यों विचार कर रहा है?

मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक, जमीन की अदला-बदली के संभावित प्रस्ताव के पीछे मुख्य मकसद भारत-म्यांमार सीमा के अनसुलझे हिस्से को तय करने की प्रक्रिया में तेजी लाना है, ताकि नई दिल्ली सीमा पर बाड़ लगा सके और अवैध आप्रवासन, उग्रवादियों की आवाजाही और सीमा पार होने वाले अन्य अपराधों को रोका जा सके.

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2024 में, भारत ने 1,643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बाड़ लगाने के प्लान का ऐलान किया था. साथ ही भारत-म्यांमार सीमा पर 'फ्री मूवमेंट रिजीम' (आवाजाही की खुली व्यवस्था) को भी खत्म कर दिया था. यह व्यवस्था 2018 से लागू थी और इसके तहत सीमा के पास रहने वाले आदिवासी समुदाय बिना वीज़ा के बॉर्डर पास का इस्तेमाल करके एक-दूसरे के इलाके में 16 किलोमीटर तक जा सकते थे.

भारत और म्यांमार के बीच मौजूदा सीमा 1967 के द्विपक्षीय समझौते के तहत तय की गई थी, लेकिन इसके कुछ हिस्से अभी भी अनसुलझे हैं. 2018 में, सरकार ने संसद को बताया था कि बाकी बचे अनसुलझे हिस्सों को द्विपक्षीय सीमा तंत्र के जरिए तय किया जाएगा, जिसमें नौ सीमा स्तंभों (पिलर) की पहचान और उन्हें लगाना शामिल है.

मणिपुर में सबसे संवेदनशील हिस्सों में बॉर्डर पिलर 64 और 68 के बीच मोल्चम सेक्टर, पिलर 75 और 79 के बीच मोरेह सेक्टर और पिलर 88 और 95 के बीच चोरो खुनौ सेक्टर शामिल हैं. भारत का हमेशा से यह कहना रहा है कि म्यांमार के साथ कोई बड़ा सीमा विवाद नहीं है, बल्कि केवल नौ अनसुलझे सीमा स्तंभों का मामला है जिसे बातचीत से सुलझाया जा रहा है.

पड़ोसी देशों के साथ इलाकों का आदान-प्रदान कोई नई बात नहीं है. 2015 में, भारत और बांग्लादेश ने भूमि सीमा समझौते को मंजूरी दी, जिसके तहत नई दिल्ली ने अपने इलाके में मौजूद 111 एन्क्लेव (क्षेत्र) ढाका को सौंपे और बदले में 51 बांग्लादेशी एन्क्लेव हासिल किए, जिससे 41 साल पुराने सीमा विवाद का अंत हुआ था.

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इलाके के आदान-प्रदान के प्रस्ताव का मणिपुर में विरोध

ताजा प्रस्तावित योजना का मणिपुर में पहले ही विरोध शुरू हो गया है. 'द डिप्लोमैट' की रिपोर्ट छपने के बाद, 'द इम्फाल टाइम्स' ने खबर दी कि 'कोऑर्डिनेटिंग कमिटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी' (COCOMI) ने भारत सरकार को चेतावनी दी है कि वह राज्य के इलाके का एक छोटा सा हिस्सा भी म्यांमार को न सौंपे. संगठन ने कहा कि अगर ऐसा कोई प्रस्ताव लागू किया जाता है, तो वे इसके खिलाफ जबरदस्त जन-विरोध करेंगे.

COCOMI, जो 2019 में नागा विद्रोही समूहों के साथ केंद्र की शांति वार्ता के दौरान मैतेई नागरिक समाज संगठनों के एक संयुक्त निकाय के रूप में गठित हुआ था, ने 27 जुलाई ('द डिप्लोमैट' की रिपोर्ट छपने के 10 दिन बाद) को कहा, 'अगर रिपोर्ट की बातें सच हैं और प्रस्ताव पर अमल किया जाता है, तो COCOMI चुपचाप तमाशबीन बनकर नहीं रहेगा.'

मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता को ऐसा मुद्दा बताते हुए जिस पर कोई समझौता नहीं हो सकता, संगठन ने कहा कि राज्य की मौजूदा सीमाएँ पिछली पीढ़ियों से विरासत में मिली हैं और समय-समय पर उनकी रक्षा की गई है. संगठन ने तर्क दिया कि 1949 में भारतीय संघ में विलय के बाद से मणिपुर ने अपने ऐतिहासिक इलाके के कुछ हिस्से पहले ही खो दिए हैं और चेतावनी दी कि राज्य की भौगोलिक सीमाओं में और कोई भी कटौती मंज़ूर नहीं होगी, जैसा कि 'द इम्फाल टाइम्स' ने रिपोर्ट किया.

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संगठन ने आगे चेतावनी दी कि नई दिल्ली को मणिपुर के लोगों की सहमति के बिना उसकी क्षेत्रीय अखंडता को प्रभावित करने वाला कोई भी फैसला लेकर 'आग से नहीं खेलना' चाहिए.

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