दिल्ली में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग को वोटरों की परेशानी दूर करने के निर्देश दिए गए. कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों ने अब तक एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं किया है या पता बदलने के बाद फॉर्म-8 नहीं भरा है, उन्हें प्रक्रिया पूरी करने का मौका दिया जाए. चुनाव आयोग ने कोर्ट को भरोसा दिया कि दिल्ली SIR की ड्राफ्ट लिस्ट से जुड़ी आखिरी तारीख बढ़ाई जाएगी.
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सवाल उठाया कि जिन लोगों का नाम 2026 की वोटर लिस्ट में पहले से था, लेकिन अब उनका पता बदल गया है, उन्हें नया वोटर मानकर फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है. कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत फॉर्म-6, फॉर्म-7 और फॉर्म-8 तय हैं. ऐसे में पता बदलने वाले वोटरों को फॉर्म-8 भरने की अनुमति दी जानी चाहिए.
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43 लाख नामों के अंतर को कम करने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि उसकी पूरी कोशिश 43 लाख नामों के अंतर को कम करने पर होनी चाहिए. कोर्ट ने सुझाव दिया कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनकी सूची प्रकाशित की जाए और यह भी बताया जाए कि उनका नाम पिछली वोटर लिस्ट में कहां दर्ज था. इससे लोग खुद आयोग से संपर्क कर सकेंगे और पता बदलने के लिए संबंधित फॉर्म-8 भर सकेंगे.
कोर्ट ने कहा कि अंतिम वोटर लिस्ट प्रकाशित होने के बाद नाम जुड़वाने या हटाने के लिए फॉर्म-6 और फॉर्म-7 की प्रक्रिया लागू होगी. सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के वकील डीएस नायडू ने याचिकाकर्ताओं के आरोपों पर कहा कि वे ऐसी डरावनी तस्वीर पेश कर रहे हैं, जो वास्तव में मौजूद नहीं है.
लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी पर दो हफ्ते बाद सुनवाई
सुनवाई के दौरान वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि चुनाव आयोग की प्रेस रिलीज में 13 लाख लोगों के अनमैप्ड होने और 19 लाख मामलों में लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी का जिक्र किया गया है. इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल उठाया कि जिन लोगों के नाम 2003 की वोटर लिस्ट में पहले से मौजूद थे, उनके मामलों को दोबारा क्यों खोला जा रहा है. उन्होंने कहा कि 2003 की लिस्ट को मैपिंग के लिए कटऑफ बनाया गया है, तो उसमें नाम होने के बावजूद लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी कैसे हो सकती है.
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जस्टिस बागची ने कहा कि बिहार के SIR में लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी का इस्तेमाल नहीं हुआ था, जबकि बंगाल में पहली बार ऐसा किया गया. उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को संवैधानिक संस्था के तौर पर प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति देने का मतलब यह नहीं है कि उसकी कानूनी वैधता पर सवाल नहीं उठाए जा सकते. कोर्ट ने कहा कि लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी की कानूनी वैधता पर विस्तार से सुनवाई की जाएगी. इस मुद्दे पर अब दो हफ्ते बाद सुनवाई होगी.