
NEET-UG पेपर लीक को लेकर केंद्र सरकार पर इस वक्त तीन तरफ से दबाव है. दिलचस्प बात यह है कि तीनों पक्षों की मांगें एक जैसी नहीं हैं. एक तरफ सोनम वांगचुक हैं, जिन्होंने साफ कर दिया है कि अगर सरकार छात्रों के खिलाफ कार्रवाई न करने का भरोसा दे दे तो वह उसी दिन अपना आमरण अनशन खत्म कर देंगे. दूसरी तरफ कॉकरोच जनता पार्टी है, जिसने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को अपनी सबसे बड़ी और गैर-समझौते वाली शर्त बना दिया है. वहीं कांग्रेस इस पूरे विवाद को सड़क से संसद तक ले जाकर सरकार को राजनीतिक तौर पर घेरना चाहती है.
यानी सरकार के सामने सिर्फ आंदोलन खत्म कराने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह तय करने की भी चुनौती है कि बातचीत आखिर किससे और किस मुद्दे पर हो. अगर सरकार सोनम वांगचुक की शर्त मानती है तो CJP पीछे हटने को तैयार नहीं दिखता. अगर CJP की मांगों पर फैसला होता है तो कांग्रेस संसद में जवाबदेही की मांग छोड़ने वाली नहीं है.
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ऐसे में NEET विवाद अब सिर्फ परीक्षा सुधार का मामला नहीं, बल्कि यह कहना वाजिब होगा कि तीन अलग-अलग एजेंडे वाले आंदोलन का रूप ले चुका है.
CJP की शर्त, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से नीचे कुछ नहीं
इस पूरे आंदोलन की सबसे आक्रामक लाइन CJP ने अपनाई है. संगठन की पहली और सबसे बड़ी मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की है. CJP का कहना है कि बार-बार पेपर लीक, परीक्षा में गड़बड़ियां और छात्रों के भविष्य से जुड़े संकट की नैतिक जिम्मेदारी शिक्षा मंत्री को लेनी चाहिए. जब तक वह पद नहीं छोड़ते, तब तक आंदोलन खत्म नहीं होगा.
इसके अलावा CJP ने सोनम वांगचुक की बिना शर्त रिहाई, NEET विवाद के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवजा और परीक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार की मांग भी रखी है.

20 जुलाई को 'चलो संसद' मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई के बाद संगठन ने अपनी मांगों में दो और शर्तें जोड़ी हैं. पहली, प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी FIR वापस ली जाएं. दूसरी ये कि, छात्रों पर बल प्रयोग करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए. संगठन का साफ कहना है कि सरकार इन सभी मांगों पर ठोस फैसला ले, तभी आंदोलन खत्म होगा.
सोनम वांगचुक की प्राथमिकता छात्रों की सुरक्षा, इस्तीफा नहीं शर्त
सोनम वांगचुक ने सीजेपी की मांगों के समर्थन में अपना आमरण अनशन शुरू किया था. पिछले 25 दिनों से भूख हड़ताल पर हैं. जंतर-मंतर से उठाए जाने के बाद वह अस्पताल में भी अपना अनशन जारी रखे हुए हैं. ऐसे तो सीजेपी और सोनम वांगचुक की मांगें एक ही रही हैं लेकिन कुछ जगहों पर हिंसक प्रदर्शनों के बाद दोनों के रुख में थोड़ा बदलाव देखने को मिला है.
सोनम वांगचुक ने एक वीडियो अपील जारी की है, जिसमें उनका रुख CJP से थोड़ा अलग दिखाई देता है. उन्होंने सरकार के सामने कोई लंबी राजनीतिक मांगों की लिस्ट नहीं रखी है. उनका कहना है कि अगर सरकार यह लिखित भरोसा दे दे कि प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ अब कोई बल प्रयोग नहीं होगा और उनके खिलाफ FIR या दूसरी कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी, तो वह उसी दिन अपना आमरण अनशन खत्म कर देंगे.
अस्पताल से जारी वीडियो संदेश में वांगचुक ने बताया कि उनके अनशन का 25वां दिन है और उनका करीब 11 किलो वजन कम हो चुका है. उन्होंने कहा कि वह अपने छात्रों और शिक्षा के काम में वापस लौटना चाहते हैं, लेकिन ऐसा तभी संभव है जब सरकार छात्रों की सुरक्षा की गारंटी दे.
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वांगचुक ने यह भी बताया कि केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने उनसे मुलाकात कर छात्र आत्महत्या के मामलों में मुआवजा, परीक्षा सुधार और संसद में चर्चा जैसे मुद्दों पर सकारात्मक विचार का भरोसा दिया है. लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि जब तक छात्रों के खिलाफ कार्रवाई रोकने का स्पष्ट आश्वासन नहीं मिलता, तब तक उनका अनशन जारी रहेगा. यानी जहां CJP सरकार से कई राजनीतिक और प्रशासनिक फैसले चाहती है, वहीं वांगचुक फिलहाल सिर्फ इतना चाहते हैं कि छात्रों को अपराधी की तरह न देखा जाए और उनके खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई न हो.
कांग्रेस का फोकस संसद पर, सरकार को जवाब देने पर मजबूर करना चाहती है
कांग्रेस ने इस पूरे विवाद को सड़क से ज्यादा संसद के भीतर लड़ने की रणनीति बनाई है. राहुल गांधी लगातार कह रहे हैं कि छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई और NEET संकट पर संसद में विस्तृत चर्चा होनी चाहिए. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से छात्रों पर हुई कार्रवाई के लिए माफी मांगने की भी मांग की है.
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार संसद में इस मुद्दे पर जवाब देने से बच रही है. इसी वजह से पार्टी लगातार विशेष नियमों के तहत चर्चा की मांग कर रही है. राहुल गांधी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर भी यही मांग दोहराई कि छात्रों के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था के संकट पर संसद में खुली बहस कराई जाए.

कांग्रेस की रणनीति साफ है. पार्टी इस मुद्दे को सिर्फ सड़क के आंदोलन तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि सरकार को संसद के रिकॉर्ड पर जवाब देने के लिए मजबूर करना चाहती है. यही वजह है कि पार्टी का पूरा जोर संसद में चर्चा, सरकार की जवाबदेही और राजनीतिक जवाब मांगने पर है.
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सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि आंदोलन का कोई एक चेहरा या एक एजेंडा नहीं है. सरकार अगर सिर्फ सोनम वांगचुक की शर्त मानकर छात्रों पर कार्रवाई न करने का भरोसा देती है, तब भी CJP अपनी बाकी मांगों के साथ आंदोलन जारी रख सकती है. अगर सरकार धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे जैसे मुद्दे पर फैसला नहीं करती तो CJP पीछे हटने को तैयार नहीं दिखता. दूसरी तरफ, कांग्रेस संसद में चर्चा और सरकार की जवाबदेही के मुद्दे को लगातार उठाती रहेगी.
यानी सरकार के सामने सिर्फ कानून-व्यवस्था संभालने की चुनौती नहीं है, बल्कि तीन अलग-अलग मोर्चों पर एक साथ जवाब देने की चुनौती है. एक तरफ छात्र आंदोलन है, दूसरी तरफ सामाजिक कार्यकर्ता का नैतिक दबाव और तीसरी तरफ विपक्ष का राजनीतिक हमला. अब यह देखना होगा कि सरकार बातचीत के जरिए इन तीनों को साथ लेकर कोई रास्ता निकालती है या फिर यह विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक संघर्ष बन जाता है.