मुंबई की एक कोर्ट ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के छात्र अभिरूप अशिम पॉल उर्फ रोनी को जमानत दे दी है. पॉल को कथित माओवादी गतिविधियों और संस्थान में नारेबाजी से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार किया गया था.
कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जो उसे देश विरोधी गतिविधियों या प्रतिबंधित संगठन से जोड़ सके. फिलहाल मामला सिर्फ शक पर टिका हुआ है.
दरअसल, पॉल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं में केस दर्ज किया गया था. इनमें गैरकानूनी तरीके से लोगों के जुटने, दुश्मनी बढ़ाने और आपराधिक साजिश से जुड़ी धाराएं शामिल हैं. इसके अलावा महाराष्ट्र पुलिस एक्ट की धाराएं भी लगाई गई थीं.
2025 में कार्यक्रम के बाद दर्ज हुई थी FIR
यह FIR ट्रॉम्बे पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी. मामला 12 अक्टूबर 2025 की एक घटना से जुड़ा है. अभियोजन पक्ष के मुताबिक, पॉल और TISS के कुछ अन्य छात्र दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा की पुण्यतिथि मनाने के लिए इकट्ठा हुए थे.
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पुलिस का आरोप था कि इस दौरान कुछ नारे लगाए गए. इनमें जेल में बंद कार्यकर्ताओं उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई की मांग भी शामिल थी. यह भी आरोप लगा था कि यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था. इसे पहले से बनाई गई साजिश के तहत आयोजित किया गया था. इसका मकसद TISS के छात्रों के बीच वैचारिक मतभेद बढ़ाना और कानून व्यवस्था बिगाड़ना था.
जांच एजेंसी ने पॉल के मोबाइल फोन और लैपटॉप से मिले कथित दस्तावेजों को भी केस का आधार बनाया था. जांच एजेंसी के मुताबिक, इनमें माओवाद से जुड़ी किताबों की PDF फाइलें थीं.
जांच एजेंसी ने यह भी दावा किया कि मोबाइल से कुछ मैसेज और सिगनल ऐप को डिलीट किया गया था. एजेंसी का आरोप था कि इन चीजों से आरोपी की माओवादी विचारधारा के समर्थन और प्रतिबंधित संगठनों से संभावित संबंध के संकेत मिलते हैं.
हालांकि, कोर्ट ने इन दावों को आरोपी को जेल में रखने के लिए पर्याप्त नहीं माना. मजिस्ट्रेट डीएस खेडेकर ने कहा कि जांच अधिकारी को जांच के लिए पर्याप्त समय मिल चुका है. इसके बावजूद आरोपी को देश की एकता के खिलाफ गतिविधियों से जोड़ने वाला प्रथम दृष्टया कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है.
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'शक के अलावा कोई आपत्तिजनक सबूत नहीं'
कोर्ट ने कहा कि आरोपी की गतिविधियों को माओवादी मानसिकता, देश विरोधी गतिविधियों या भारत में प्रतिबंधित संगठन से जुड़ने से जोड़ने के लिए प्रथम दृष्टया कोई सामग्री नहीं है. सिर्फ शक के आधार पर किसी युवा आरोपी को जेल में रखना सही नहीं होगा.
कोर्ट ने पॉल की उम्र और उसके करियर को भी ध्यान में रखा. अदालत ने कहा कि युवा आरोपी को जमानत देना उसके करियर को बचाने के लिहाज से जरूरी है. साथ ही पॉल से पहले ही पूछताछ की जा चुकी है. इसलिए अब उसकी हिरासत में लेकर आगे पूछताछ करने की जरूरत नहीं है.
कोर्ट ने पॉल को एक लाख रुपये के निजी बॉन्ड और जमानतदारों की शर्त पर जमानत दी. उसे चार्जशीट दाखिल होने तक हर बुधवार DCB-CID के सामने रिपोर्ट करने का निर्देश दिया गया है.
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कोर्ट ने साफ किया कि मौजूदा सामग्री के आधार पर आरोपी को माओवादी गतिविधियों या प्रतिबंधित संगठन से जोड़ने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है. मामले की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी.