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सरकार का विरोध नागरिकों का अधिकार...', बॉम्बे HC ने मुंबई पुलिस को फटकारा

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस द्वारा एक पॉलिटिकल एक्टिविस्ट को शहर से बाहर करने के आदेश को गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया है. अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत नागरिकों को सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार है.

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बॉम्बे HC ने मुंबई पुलिस से कहा- विरोध-प्रदर्शन के आधार पर किसी को 'शहर निकाला' नहीं दिया जा सकता
बॉम्बे HC ने मुंबई पुलिस से कहा- विरोध-प्रदर्शन के आधार पर किसी को 'शहर निकाला' नहीं दिया जा सकता

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक पॉलिटिकल एक्टिविस्ट को शहर से एक साल के लिए बाहर (एक्सटर्न) करने के आदेश को रद्द कर दिया है. हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस की इस कार्रवाई को गलत बताया है. कोर्ट ने कहा कि, किसी नागरिक को सिर्फ इसलिए उसके अपने शहर से बेदखल नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया या नारे लगाए.

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को सरकारी नीतियों के खिलाफ विरोध और आंदोलन करने का संवैधानिक अधिकार है. अदालत ने मुंबई पुलिस के इस एक्शन को पुलिस शक्तियों का दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल भी बताया है. 

मुंबई पुलिस ने SDPI नेता पर की थी कार्रवाई

जस्टिस माधव जामदार की एकल पीठ सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी (49) की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. चौधरी ने मुंबई पुलिस की ओर से जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उन्हें मुंबई और उसके उपनगरों की सीमा से 12 महीने के लिए बाहर कर दिया गया था.

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता पयोशी रॉय ने अदालत को बताया कि चौधरी के खिलाफ वर्ष 2019 से 2024 के बीच कुल पांच एफआईआर दर्ज की गई थीं. इनमें अधिकांश मामले केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन से जुड़े थे. इन आंदोलनों में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), बाबरी मस्जिद ध्वंस, ज्ञानवापी मस्जिद विवाद, वक्फ बोर्ड में कथित भ्रष्टाचार और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ प्रदर्शन शामिल थे.

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने की तल्ख टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने मुंबई पुलिस की कार्रवाई पर तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि आखिर 'BJP सरकार मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाने पर किसी व्यक्ति को शहर से बाहर करने जैसी कठोर कार्रवाई कैसे की जा सकती है. उन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं, किसी मंत्री या सरकार के निजी कर्मचारी नहीं.

अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में नागरिकों को सरकार के फैसलों के खिलाफ आवाज उठाने, प्रदर्शन करने और आंदोलन करने का अधिकार है. केवल विरोध-प्रदर्शन या नारेबाजी के आधार पर किसी व्यक्ति को उसके अपने शहर से बाहर करना कानून का दुरुपयोग है.

एक वर्ष का मिला था निष्कासन

रिकॉर्ड के अनुसार, सईद अहमद चौधरी मुंबई के चेंबूर इलाके के निवासी हैं और सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं. उन्होंने लोकसभा चुनाव भी लड़ा था. उनकी याचिका में कहा गया कि 20 अक्टूबर 2025 को महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. इसके बाद दिसंबर 2025 में चेंबूर के तत्कालीन पुलिस उपायुक्त ने उन्हें मुंबई शहर और उपनगरों से एक वर्ष के लिए निष्कासित करने का आदेश पारित किया.

पुलिस ने अपने आदेश में कहा था कि चौधरी की गतिविधियों से लोगों में भय का माहौल बन रहा था और सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा पैदा हो रहा था. बाद में कोंकण मंडल के मंडलायुक्त ने भी अपील में इस आदेश को बरकरार रखा. हालांकि चौधरी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उनके खिलाफ दर्ज सभी मामले शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन से जुड़े थे. इन मामलों में उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत आरोपी बनाया गया था, जो किसी सक्षम प्राधिकारी के आदेश की अवहेलना से संबंधित है. उनका कहना था कि पुलिस ने निवारक कार्रवाई (Preventive Power) का इस्तेमाल लोकतांत्रिक असहमति को दबाने के लिए किया.

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याचिका में यह भी कहा गया कि एक्सटर्नमेंट आदेश के कारण उन्हें मुंबई नगर निगम चुनावों के महत्वपूर्ण समय में अपने ही क्षेत्र से बाहर रहना पड़ा. इससे वे अपनी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार और संगठनात्मक गतिविधियां नहीं कर सके. चौधरी का आरोप था कि पुलिस ने यह कहकर कार्रवाई की कि उनकी गतिविधियों से 'आतंक का साम्राज्य' बन गया है, जबकि स्थानीय निवासियों और दुकानदारों ने ऐसी किसी स्थिति से इनकार किया था.

अदालत ने की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस माधव जामदार ने कहा कि इस मामले में एक्सटर्नमेंट का आदेश पुलिस शक्तियों का दुर्भावनापूर्ण और अनुचित इस्तेमाल है. अदालत ने माना कि केवल विरोध-प्रदर्शन आयोजित करना या उसमें भाग लेना महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति को शहर से बाहर करने का वैध आधार नहीं हो सकता.

हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस का आदेश पूरी तरह इस आधार पर टिका था कि याचिकाकर्ता ने विभिन्न मुद्दों पर प्रदर्शन आयोजित किए और उनमें भाग लिया. अदालत के अनुसार यह संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने के अधिकार के साथ-साथ अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का भी उल्लंघन है.

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इन्हीं टिप्पणियों के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस के एक्सटर्नमेंट आदेश और उसके खिलाफ अपील में पारित आदेश, दोनों को रद्द कर दिया. अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध को अपराध नहीं माना जा सकता तथा पुलिस अपनी निवारक शक्तियों का इस्तेमाल नागरिकों की संवैधानिक स्वतंत्रताओं को कुचलने के लिए नहीं कर सकती.

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