हिमाचल प्रदेश की देवभूमि कुल्लू में आस्था का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है. ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में आज भगवान रघुनाथ की भव्य रथयात्रा के साथ अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का आगाज होगा. सात दिनों तक चलने वाले इस देव महाकुंभ में शामिल होने के लिए दूरदराज के इलाकों से देवी-देवता अपने देवलुओं और हारियानों के साथ पहुंच रहे हैं. कोई 35 किलोमीटर पैदल चलकर आया है, तो कोई दुर्गम पहाड़ी रास्तों से 150 से 200 किलोमीटर तक की यात्रा करके कुल्लू पहुंचा है.
कठिन रास्ते, ऊंचे पहाड़ और लंबी दूरी भी श्रद्धालुओं की आस्था को डिगा नहीं पाए हैं. देवी-देवताओं के पारंपरिक रथ, पालकियां और ढोल-नगाड़ों की गूंज कुल्लू की सदियों पुरानी देव संस्कृति की झलक दिखा रही है. ढालपुर मैदान में अलग-अलग क्षेत्रों के देवी-देवताओं का जुटना इस उत्सव को खास बनाता है.
347 देवी-देवताओं को भेजा गया निमंत्रण
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव समिति ने इस बार जिले के 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया है. बुधवार देर शाम तक 200 से अधिक देवी-देवता ढालपुर मैदान में बने अपने अस्थायी शिविरों में विराजमान हो चुके थे. गुरुवार सुबह से भगवान रघुनाथ के दर्शन के लिए देवी-देवताओं के पहुंचने का सिलसिला जारी रहा.
निरमंड, बागा सराहन और आउटर सिराज जैसे दुर्गम क्षेत्रों से भी देवता अपने देवलुओं के साथ पहुंच रहे हैं. दशहरे में शामिल होने के लिए कई श्रद्धालु तीन से चार दिन तक पैदल यात्रा करते हैं. उनके लिए यह सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि अपने आराध्य के प्रति आस्था जताने और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को निभाने का अवसर है.
शाम 4 बजे निकलेगी भगवान रघुनाथ की रथयात्रा
उत्सव का मुख्य आकर्षण भगवान रघुनाथ की रथयात्रा होगी. भगवान रघुनाथ सुल्तानपुर स्थित अपने देवालय से पालकी में सवार होकर ढालपुर के रथ मैदान पहुंचेंगे. यहां पूजा-अर्चना और पारंपरिक धार्मिक विधियां पूरी होने के बाद उन्हें रथ पर विराजमान किया जाएगा. इसके बाद श्रद्धालु रथ की डोर थामकर उसे भगवान के अस्थायी शिविर तक ले जाएंगे.
भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह के मुताबिक, भगवान दोपहर करीब ढाई से तीन बजे के बीच मंदिर से ढालपुर के लिए प्रस्थान करेंगे. शाम करीब चार बजे रथयात्रा निकाली जाएगी. इस दौरान जय श्रीराम के जयघोष और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच हजारों श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद है.
दानवेंद्र सिंह ने बताया कि कुल्लू दशहरे में देवी-देवताओं का मिलन बेहद भावुक पल होता है. यहां भगवान रघुनाथ और माता सीता के उतारे हुए वस्त्रों को श्रद्धालु सिर पर धारण करते हैं. बिजली महादेव और भगवान रघुनाथ का मिलन भी इस उत्सव की खास परंपराओं में शामिल है.
365 साल पुरानी है कुल्लू दशहरे की परंपरा
कुल्लू दशहरे का इतिहास करीब 365 साल पुराना माना जाता है. मान्यता के अनुसार, वर्ष 1660 में राजा जगत सिंह के शासनकाल में भगवान रघुनाथ को कुल्लू की राजगद्दी पर विराजमान करने के बाद इस परंपरा की शुरुआत हुई थी. तभी से भगवान रघुनाथ को इस उत्सव का प्रमुख आराध्य माना जाता है.
देश के कई हिस्सों में विजयदशमी के दिन दशहरा संपन्न हो जाता है, लेकिन कुल्लू में इसी दिन से उत्सव शुरू होता है. सात दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ हिमाचल की लोक संस्कृति और पारंपरिक देव परंपराओं की झलक देखने को मिलती है.
चार साल से फिर दशहरे में आ रहे देवता
दशहरे में पहुंचे हारियान गौरव सैनी ने बताया कि मतेवड़ा से उनके देवता सुबह रवाना हुए थे और रात करीब सवा दस बजे कुल्लू स्थित स्थायी शिविर में पहुंचे. करीब 35 किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद वे यहां पहुंचे हैं. उन्होंने बताया कि कालनाग जोड़ा नारायण जी और उनकी बहन रूपासना माता का करीब 80 साल पुरानी एक घटना के कारण कुल्लू दशहरे में आना बंद हो गया था. हालांकि, पिछले चार साल से वे लगातार उत्सव में शामिल हो रहे हैं.
श्रद्धालु अमित वर्मा ने भी कुल्लू दशहरे को ऐसा अनूठा आयोजन बताया, जिसका लोग पूरे साल इंतजार करते हैं. उनके मुताबिक, ढालपुर में बड़ी संख्या में देवी-देवताओं के दर्शन करना और भगवान रघुनाथ की रथयात्रा में शामिल होना श्रद्धालुओं के लिए बेहद आनंद का पल होता है.
सुरक्षा के लिए 1200 पुलिस जवानों की तैनाती
उत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों के पहुंचने की संभावना को देखते हुए सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए हैं. आयोजन के दौरान करीब 1200 पुलिस जवानों की तैनाती की योजना है. देवी-देवताओं के अस्थायी शिविरों और सोने-चांदी के मुखौटों से सजे देवरथों की सुरक्षा पर भी विशेष निगरानी रखी जाएगी.
कुल्लू दशहरा एक ऐसा आयोजन है, जहां धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराएं एक साथ दिखाई देती हैं. सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर आने वाले श्रद्धालुओं से लेकर भगवान रघुनाथ की भव्य रथयात्रा तक, यहां का हर दृश्य देवभूमि की विशिष्ट पहचान को सामने लाता है.