31 जुलाई की सुबह... सूरत का न्यू सिविल अस्पताल... ऑपरेशन थिएटर के बाहर डॉक्टर, नर्स, पुलिस, रेलवे कर्मचारी और सोशल वर्कर्स एक ऐसी दौड़ की तैयारी कर रहे थे, जिसमें एक-एक मिनट की कीमत किसी की पूरी जिंदगी के बराबर थी. जो दिल कुछ घंटे पहले तक 36 साल के मिथुन स्वैन के शरीर में धड़क रहा था, अब वह किसी दूसरे सीने तक पहुंचाना था. वह भी इतनी तेजी से कि उसकी धड़कनें थमने न पाएं.
मिथुन स्वैन मूल रूप से ओडिशा के गंजाम जिले के रहने वाले थे. रोजी-रोटी के लिए गुजरात के सूरत में एक लूम्स फैक्ट्री में काम करते थे. 28 जुलाई को अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी. चेहरा टेढ़ा पड़ गया, शरीर का बायां हिस्सा काम करना बंद कर गया. पहले निजी अस्पताल और फिर 108 एंबुलेंस से उन्हें सूरत के न्यू सिविल अस्पताल लाया गया. डॉक्टरों ने हरसंभव कोशिश की, लेकिन 30 जुलाई को उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया.

यहीं से शुरू हुई एक ऐसी कहानी, जिसमें एक परिवार का सबसे कठिन फैसला चार अनजान परिवारों की सबसे बड़ी उम्मीद बन गया. अस्पताल की काउंसलिंग टीम ने मिथुन के परिजनों से ऑर्गन डोनेट करने पर बात की, उन्हें इसका महत्व समझाया. पत्नी और परिवार ने मिथुन की दो किडनी, लिवर और हार्ट दान करने की सहमति दे दी. फैसला आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने तय किया कि मिथुन अब भी जिंदा रहेंगे... बस अलग-अलग लोगों के शरीर में.
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इसके बाद वक्त से मुकाबला शुरू हुआ. मिथुन का लिवर और दोनों किडनी ट्रांसप्लांट के लिए अलग-अलग अस्पतालों की ओर रवाना किए गए. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती थी दिल को सूरत से अहमदाबाद पहुंचाना. आमतौर पर ऐसे मामलों में ग्रीन कॉरिडोर बनाकर सड़क या मौसम अनुकूल होने पर एयर एंबुलेंस का सहारा लिया जाता है. लेकिन इस बार हालात अलग थे. तय हुआ कि इस बार दिल सड़क या आसमान से नहीं, बल्कि वंदे भारत एक्सप्रेस से सफर करेगा.
रेलवे, पुलिस, डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन ने मिलकर ऐसा ग्रीन कॉरिडोर तैयार किया कि धड़कता हुआ दिल करीब 217 मिनट (3 घंटे 37 मिनट) में सूरत से अहमदाबाद के यूएन मेहता अस्पताल पहुंच गया. वहां उसका सफल ट्रांसप्लांट भी किया गया. ट्रांसप्लांट के लिए धड़कते दिल को वंदे भारत ट्रेन के जरिए पहुंचाने का यह देश ही नहीं, दुनिया में भी अपनी तरह का पहला मामला है.
यह ऑपरेशन सिर्फ मेडिकल साइंस नहीं, बल्कि कोऑर्डिनेशन, तकनीक और इंसानियत की मिसाल बन गया. इस पूरे अभियान में डॉक्टरों, नर्सों, सिक्योरिटी स्टाफ, रेलवे पुलिस, रेलवे प्रशासन, सोशल वर्कर्स और अंगदान चैरिटेबल ट्रस्ट के वॉलेंटियर्स ने अहम भूमिका निभाई.

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गुजरात सरकार के स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रफुल पानसेरिया ने आजतक से बातचीत में कहा कि यह सिर्फ मेडिकल टीम की सफलता नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के तालमेल की मिसाल है. डॉक्टरों, नर्सों, रेलवे प्रशासन, पुलिस, सोशल वर्कर्स और स्वयंसेवकों ने मिलकर इस ऑपरेशन को सफल बनाया. उन्होंने कहा कि मौसम की वजह से हेलिकॉप्टर या विमान का इस्तेमाल संभव नहीं था. ऐसे में वंदे भारत सबसे भरोसेमंद विकल्प बनी. उनका कहना था कि एक परिवार ने अपना सदस्य खो दिया, लेकिन उसी फैसले ने दूसरे परिवार को जिंदगी लौटा दी.
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा किरदार शायद कोई डॉक्टर, मंत्री या ट्रेन नहीं है. सबसे बड़ा किरदार वह परिवार है, जिसने अपने सबसे गहरे दुख के बीच यह फैसला लिया कि उनका अपना तो चला गया, लेकिन उसकी धड़कनें, उसकी सांसें और उसके अंग किसी और की जिंदगी में हमेशा जिंदा रहेंगे. कभी-कभी एक दिल सिर्फ एक इंसान के लिए नहीं धड़कता... वह चार परिवारों की उम्मीद बन जाता है. और शायद यही वजह है कि इसे अंगदान नहीं, महादान कहा जाता है.