वक्त के साथ कई लोकोक्तियों के अर्थ बदल जाते हैं या फिर वे अपने अर्थ खो देते हैं. इनकी फेहरिस्त लंबी है. इनमें एक हैः झूठ के पांव नहीं होते. अगर झूठ के पांव नहीं होते तो दुनिया में कम से कम दो बड़े युद्ध नहीं होते.
अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने 1964 में कहा कि टोंकिन की खाड़ी में वियतनाम ने उसके जहाजों पर हमला किया. कम्युनिस्ट वियतनाम ने हमला कर दिया! अमेरिका की सत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ ही विपक्षी रिपब्लिकन के सदस्य भी एकजुट हो गए. मीडिया भला कैसे पीछे रहता, वह भी युद्ध की मांग करने लगा. अधिकांश अमेरिकी वियतनामियों के खून के प्यासे हो गए.
युद्ध का माहौल तैयार होते देर नहीं लगी और अमेरिका ने इस दक्षिण-पूर्व एशिया देश पर हमला बोल दिया. दुनिया ने नापाम बम से तबाह जंगल-जमीन देखी, जिसमें एक तस्वीर युद्ध की तबाही का प्रतीक बन गई. 1972 की उस तस्वीर में नौ साल की फान थी किम फुक नाम की लड़की नापाम बम के हमले से बचने के लिए दूसरे दहशतजदा मर्द-औरतों-बच्चों के साथ नंगे बदन बेतहाशा भाग रही है.
बाद में जॉनसन के रक्षा मंत्री रॉबर्ट मैकनामरा ने स्वीकार किया कि अमेरिकी युद्धक जहाजों पर टोंकिन की खाड़ी में कभी हमला हुआ ही नहीं था!
लेकिन तब तक लाखों लोग मारे जा चुके थे, खुद अमेरिका को गहरा घाव लगा.
फिर 2003 में झूठ के पांव बना दिए गए.
तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज वॉकर बुश ने कहा कि सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में इराक वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन (डब्ल्यूएमडी) तैयार कर रहा है, अब तक के सबसे खतरनाक हथियार, जिनसे दुनिया को खतरा है.
अफगानिस्तान में गिरफ्तार लीबिया के इब्न अल शेख को यातना देकर इकबालिया बयान ले लिया गया कि उसने इराक में बायोलॉजिकल और केमिकल हथियारों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण लिया है. रिपब्लिकन और डेमेक्रैट फिर एकजुट हो गए. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने युद्ध की जमीन तैयार करने में मदद की. युद्धोन्माद इतना बढ़ गया कि शांति की बात करने वालों की आवाज दब गई. और एक रोज अमेरिका के नेतृत्व में सभी सहयोगी देशों ने हम्मूराबी की संतानों पर हमला बोल दिया.
टीवी चैनलों पर पहली बार युद्ध का सीधा प्रसारण शुरू हो गयाः पुल, बांध, बिजली के खंभे, अस्पताल-कॉलेज की इमारतों समेत ज्यादातर बुनियादी संरचनाओं को ढहा दिया गया ताकि युद्ध के बाद उन इंजीनियरिंग कंपनियों को ठेका मिले, जिन्होंने आंशिक रूप से इस युद्ध को फंड किया था. दजला और फरात से सिंचित इलाकों में भी पानी गायब. बिजली गायब. गर्मी से बेहाल लोगों के पास जेनरेटर के लिए भी ईंधन नहीं. भारतीय ट्रकों के ईंधन टैंक पर जिसे इराक का पानी लिखा जाता है, उसे हासिल करने के लिए इराकी लोग घंटों कतार में खड़े रहने लगे.
युद्ध में अमेरिकी फौजियों के डिप्लीटेड यूरेनियम के इस्तेमाल से कैंसर के मामले अप्रत्याशित रूप से बढ़ गए. कैंसर पीड़ित बच्चे अब भी अपनी मांओं की गोद में दम तोड़ रहे हैं. अब तक करीब पांच लाख लोग इस युद्ध की वजह से मारे जा चुके हैं.
और फिर एक रोज यह कह दिया गया कि इराक में कभी डब्ल्यूएमडी था ही नहीं.
लेकिन बुश दोबारा राष्ट्रपति चुनाव जीत गए हालांकि इस युद्ध ने पूरे इलाके को असंतुलित कर दिया.
एक बार फिर झूठ के पांव तैयार हो रहे हैं. इस बार भी युद्ध की जमीन पश्चिम एशिया में ही तैयार हो रही है. उसके पीछे भी वही वजह बताई जा रही है कि उस मुल्क से दुनिया को खतरा है क्योंकि वह परमाणु बम विकसित करने वाला है.
पिछले हफ्ते जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के उपायों पर विचार करने के लिए तेहरान गए थे. तभी फारस की खाड़ी के पास दो ऑयल टैंकरों पर हमला हो गया. अमेरिका ने मौका गंवाए बगैर इसके लिए ईरान को दोषी ठहरा दिया. उसके कुछ सहयोगियों ने भी मान लिया कि ईरान ने ही यह काम किया है. कुछ सहयोगी संदेह जता रहे हैं, अपनी ओर से तफ्तीश कर रहे हैं, आखिर झूठ के पांव को मजबूती देने के लिए इतना स्वांग तो जरूरी है.
पहले टोंकिन गल्फ, फिर डब्ल्यूएमडी. अब फिर एक और गल्फ में झूठ के पांव विकसित किए जा रहे हैं.
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