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सांप का जहर देख वैज्ञानिकों ने बना दी जिंदगी बचाने वाली दवा, जिसने हाई ब्लड प्रेशर के इलाज को बदल दिया

ब्राजील के जहरीले सांप Bothrops jararaca के जहर पर हुई रिसर्च की मदद से एक दवा बनाने की राह बनी. वैज्ञानिकों ने सांप के जहर में मौजूद ब्रैडीकिनिन-पोटेंशियेटिंग पेप्टाइड्स के बारे मे रिसर्च की और उससे प्रेरणा लेकर Captopril दवा विकसित हुई.

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सांप से प्रेरणा लेकर बनी दवा
सांप से प्रेरणा लेकर बनी दवा

बारिश के इस मौसम में देशभर के कई जिलों से  सांप काटने की घटनाएं सामने आ रही हैं. इनमें कुछ लोगों की मौत भी हो गई है. सांप के जहर के शरीर में फैलने से मौत होती है, लेकिन जो जहर जीवन के लिए खतरा है. वह एक दवा बनाने की प्रेरणा भी बना है. ब्लड प्रेशर कम करने वाली दवा Captopril की खोज और उसका आधार ब्राजील के एक जहरीले सांप जिसको पिट वाइपर कहते हैं उसके जहर में पाए जाने वाले एक प्रोटीन से जुड़ा हुआ है. भले ही ये सुनकर आपको विश्वास न हो, लेकिन  मेडिकल साइंस की दुनिया में ऐसा हो चुका है.

दिलचस्प बात यह है कि Captopril दवा बनाने की  शुरुआत किसी लैब में नहीं, बल्कि ब्राजील के जंगलों में पाए जाने वाले एक जहरीले सांप से हुई थी. 1950 के दशक में वैज्ञानिक Bothrops jararaca नाम के एक जहरीले पिट वाइपर के जहर का अध्ययन कर रहे थे. इस दौरान उन्हें पता चला कि इसके जहर में कुछ ऐसे तत्व मौजूद हैं, जो शरीर में हाई बीपी को प्रभावित कर सकते हैं. जांच के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि सांप के जहर में मौजूद कुछ विशेष प्रोटीन शरीर में हाई बीपी क असर को कम कर देते हैं.  

फिर वैज्ञानिकों को मिला असली 'टारगेट'

इसके बाद वैज्ञानिक सर्जियो फरेरा और उनकी टीम ने सांप के जहर में मौजूद ब्रैडीकिनिन-पोटेंशिएटिंग फैक्टर्स (BPF) पर रिसर्च की और उनको पता चला कि सांप के जहर में मौजूद BPF शरीर में मौजूद एक महत्वपूर्ण एंजाइम ACE को कम करती है और रोकती है. यह वही एंजाइम ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करता है. इसके कम होने से बढ़ा हुआ बीपी भी कम होता है.  इससे यह साबित हो गया है कि सांप के जहर में मौजूद ब्रैडीकिनिन-पोटेंशिएटिंग फैक्टर्स कहीं न कही बीपी के इलाज में काम आ सकता है, हालांकि इस मामले में सबसे बड़ी चुनौती ये थी कि जहर से तो आदमी मर जाएगा, तो फिर इस रिसर्च को कैसे करें कि असर भी पता चले और मौत भी न हो. इसका भी वैज्ञानिकों ने रास्ता खोज लिया.

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इस बारे में गाजियाबाद के मैक्स हॉस्पिटल में डॉ. हेमेटोलॉजिस्ट डॉ रोहित कपूर ने बताया है. वह कहते हैं कि दवा को विकसित करने के लिए वैज्ञानिकों ने सांप के जहर को सीधे दवा के रूप में इस्तेमाल नहीं किया था. ऐसा करना खतरनाक था. इसके लिए उन्होंने सिर्फ यह समझा कि जहर में मौजूद कौन से प्रोटीन शरीर में जाकर बीपी को कंट्रोल कर सकते हैं. इसमें पता चला कि ब्रैडीकाइनिन-पोटेंशियेटिंग पेप्टाइड्स (BPP) ऐसे हैं. इसके बाद मेडिकल कैमिस्ट्री की मदद से ऐसे सिंथेटिक BPP  विकसित किए गए जो बीपी कंट्रोल कर सकें. इससे ही आगे चलकर Captopril विकसित हुई. 

फिर ऐसे बनी Captopril दवा

लैब में वैज्ञानिकों ने उसी प्राकृतिक तत्व की नकल करके एक सुरक्षित और असरदार दवा तैयार की, जिसे 1981 में Captopril नाम से बाजार में उतारा गया. यह दुनिया की पहली ऐसी दवा थी जो बढ़े हुए बीपी को कंट्रोल कर देती थी . इस तरह ये हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में यह पहली सुरक्षित दवा बनी. उस समय इसे हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में एक बड़ी उपलब्धि माना गया. ये दवा सिर्फ हाई बीपी ही नहीं बल्कि हार्ट फेल्यिर के इलाज में भी काम आई. धीरे-धीरे यह दवा दुनिया भर में इस्तेमाल होने लगी. 

डॉ रोहित कहते हैं कि इस दवा के मामले में यह कहना ज्यादा सही है कि Captopril सांप के जहर से बनी दवा नहीं, बल्कि सांप के जहर में मौजूद पैपटाइट से मिली वैज्ञानिक जानकारी से प्रेरित होकर विकसित की गई सिंथेटिक दवा है.

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डॉ रोहित कहते हैं कि आज बाजार में मिलने वाली Captopril की गोलियों में सांप का जहर नहीं मिलाया जाता है, बल्कि वैज्ञानिक ने लैब में उसी जहर की नकल करके इसे सिंथेटिक रूप से बनाया है. पहले भी जो दवा बनी थी उसमें सीधे तौर पर जहर नहीं डाला गया था. हां, इस दवा को बनाने का आईडिया वैज्ञानिकों को सांप के जहर से आया था. 

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