
जब कोई बच्चा समय से पहले जन्म ( प्रीटर्म बर्थ) ले लेता है तो उसको अच्छी देखभाल के लिए NICU में रखा जाता है. इस दौरान कई बार खून की जांच होती है. किसी संक्रमण का पता लगाने के लिए यह ब्लड टेस्ट किए जाते हैं, लेकिन बार-बार होने वाले यह टेस्ट बच्चों की सेहत को बिगाड़ सकते हैं. एनआईसीयू में भर्ती हुए बच्चों पर हुई एक नई स्टडी में इस खतरे के बारे में बताया गया है. यह रिसर्च प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल द लैंसेट में छपी है.
इस रिसर्च को 22 यूरोपीय देशों के 64 NICU में भर्ती हुए 320 प्रीटर्म बर्थ वाले बच्चों पर किया गया है. इसमें बताया गया कि कुछ बच्चों को एनआईसीयू में से एक से तीन दिन में छुट्टी मिल जाती है तो कुछ को कई महीनों तकरखना पड़ता है. इस दौरान किए जाने वाले ब्लड टेस्ट से बच्चे के शरीर में पहले हफ्ते में ही खून की कमी हो सकती है. ये कमी उसको एनीमिया की बीमारी का शिकार बना सकती है. इस बीमारी से उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है. यह स्टडी यूरोप में NICU पर आधारित सबसे बड़ी स्टडी है. इससे यह पता लगाने की कोशिश की गई है कि एनआईसीयू में बच्चों का कितना खून केवल टेस्ट के लिए निकाल लिया जाता है.
28 दिनों के भीतर 50 फीसदी खून ले लिया जाता है
रिसर्च में पता चला कि 24 सप्ताह में जन्मे बच्चों में 28 दिनों के भीतर जन्म के समय शरीर में मौजूद कुल खून का लगभग 50% ब्लड टेस्ट के लिए निकाल लिया जाता है. 25 सप्ताह में जन्मे बच्चों में लगभग 26% खून, 26 सप्ताह में लगभग 20% और 27 सप्ताह में लगभग 11.5% खून केवल टेस्ट के लिए निकाल लिया जाता है.
इन आंकड़ों से पता चलता है कि 24 सप्ताह में जन्मे बच्चों में तो जन्म के समय जितना खून था, उसका आधा सिर्फ ब्लड टेस्ट करने में खर्च हो जाता है. इससे आगे चलकर बच्चे के शरीर में खून की कमी होने का रिस्क होता है.

सबसे ज्यादा खून कब निकला?
रिसर्चर्स ने पाया कि कुछ अस्पतालों में डॉक्टर NICU में मौजूद बच्चे का कम मात्रा में खून लेकर जांच करते हैं. जबकि कुछ अस्पताल उसी टेस्ट के लिए कई गुना ज्यादा खून लेते हैं. टेस्ट एक ही होता है, लेकिन खून की जरूरत अलग-अलग होती है. जहां अच्छे लैब और डॉक्टर हैं वहां कई टेस्ट के लिए एक बार ही सैंपल ले लिया जाता है, वहीं कई अस्पतालों में हर टेस्ट के लिए अलग- अलग बार सैंपल लिए जाते हैं.
इस तरह की जानी चाहिए बच्चों के खून की जांच
रिसर्च में पाया गया कि जिन NICU में कम खून में जांच करने वाली मशीने थीं, वहां बच्चों का ब्लड लॉस लगभग आधा था. कम मात्रा में खून से जांच करने वाली मशीनों ज्यादा बेहतर हैं. रिसर्च से यह साफ हुआ है कि अगर कम खून में जांच करने वाली तकनीके अपनाई जाएं तो बच्चों में खून की कमी का खतरा काफी कम हो सकता है. इससे एनीमिया की बीमारी का रिस्क भी कम रहता है.

क्या कहते हैं एम्स के एक्सपर्ट
दिल्ली एम्स में पीडियाट्रिक विभाग में डॉ. हिमांशु भदानी बताते हैं कि NICU में भर्ती बच्चों को सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक रिस्क होता है. उनमें किसी बीमारी की जांच और अलग- अलग इंफेक्शन का पता लगाने के लिए कई प्रकार के टेस्ट किए जाते हैं, हालांकि टेस्ट जरूरत के हिसाब से ही होने चाहिए. एक बार के सैंपल से ही कई जांच की जा सकती हैं. ऐसे में बार- बार सैंपल लेना ठीक नहीं है. अगर बच्चे में खून की कमी हो जाती है तो फिर ये स्थिति भी खतरनाक हो सकती है. इससे एनीमिया की बीमारी का रिस्क होता है.
क्या होती है एनीमिया की बीमारी?
नवजात शिशुओं में एनीमिया एक ऐसी स्थिति है, जिसमें बच्चे के शरीर में रेड ब्लड सेल्स की संख्या सामान्य से कम होती है. ऐसा कई कारणों से हो सकता है, जैसे कि बच्चा समय से पहले पैदा हुआ हो, रेड ब्लड सेल्स बहुत तेज़ी से टूट रहे हों, शरीर में पर्याप्त रेड ब्लड सेल्स न बन रहे हों या बच्चे का बहुत ज़्यादा खून बह गया हो. डॉ हिमांशु बताते हैं कि एनीमिया की बीमारी में लक्षण गंभीर भी हो सकते हैं. इसमें स्किन का पीला पड़ना, कमजोरी होना और उसकी इम्यूनिटी पर भी इसका असर हो सकता है.