आज के इस दौर में जहां प्रिवेंटिव हेल्थकेयर का दायरा रूटीन ब्लड टेस्ट से आगे बढ़कर जेनेटिक स्क्रीनिंग, एडवांस इमेजिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तक पहुंच चुका है, वहीं लोग भ्रम के शिकार भी हो रहे हैं. अक्सर लोग आकर्षक विज्ञापनों के झांसे में आकर ऐसे-ऐसे पैकेज और टेस्ट करवा लेते हैं, जिनकी उनके शरीर को जरूरत ही नहीं होती.
आजतक हेल्थ वेल्थ समिट के एक बेहद महत्वपूर्ण सत्र में डॉ. डांग्स लैब के फाउंडर व डायरेक्टर डॉ. नवीन डांग, महाजन इमेजिंग के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. हर्ष महाजन और लाल पैथलैब्स के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन डॉ. अरविंद लाल ने शिरकत की.
इन तीनों जाने-माने विशेषज्ञों ने प्रिवेंटिव हेल्थकेयर, सही डायग्नोस्टिक टेस्ट के चयन और पर्सनलाइज्ड हेल्थ स्क्रीनिंग की बारीकियों पर बेबाक राय रखी. आइए जानते हैं कि इस सत्र से आपके काम की कौन-कौन सी बड़ी और अहम बातें निकलकर सामने आईं.
सही पैथोलॉजी लैब का चयन क्यों जरूरी?
डॉ. नवीन डांग ने कहा कि सटीक डायग्नोसिस (रोग की सही पहचान) ही सही इलाज की नींव होती है. उन्होंने सलाह दी कि केवल सस्ते दामों या लुभावने पैकेजों के आधार पर किसी लैब का चुनाव न करें. लैब चुनते समय यह देखें कि वहां पैथोलॉजिस्ट और माइक्रोबायोलॉजिस्ट जैसे क्वालिफाइड डॉक्टर्स हैं या नहीं, लैब को एक्सीलेरेशन प्राप्त है या नहीं, और क्या वहां रिपोर्ट समझाने वाले डॉक्टर्स उपलब्ध हैं.
डॉ. डांग ने कहा कि यदि हम सही पहचान नहीं करेंगे, तो सही इलाज कैसे होगा? डायग्नोस्टिक्स के स्तर पर हुई एक छोटी सी चूक मरीज के पूरे इलाज की दिशा बिगाड़ सकती है.
'सिल्वर, गोल्ड या प्लेटिनम' पैकेज के जाल से बचें
डॉ. हर्ष महाजन ने बताया कि हेल्थ टेस्ट दो तरह के होते हैं. पहला, बिना लक्षण वाले लोगों के लिए 'प्रिवेंटिव स्क्रीनिंग' और दूसरा, बीमार लोगों के लिए 'डायग्नोस्टिक टेस्टिंग'. उन्होंने चेतावनी दी कि सिल्वर, गोल्ड या प्लेटिनम के नाम पर बेचे जाने वाले पैकेजों के प्रभाव में न आएं. कई विज्ञापनों में एक ही टेस्ट के अलग-अलग हिस्सों को गिनकर टेस्ट की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई जाती है.
एक 20 साल के युवा की जरूरत 40 या 50 साल के व्यक्ति से अलग होती है. इसलिए उम्र, फैमिली हिस्ट्री और पुरानी बीमारियों को देखकर ही टेस्ट चुने जाने चाहिए. उन्होंने साफ कहा कि टेस्टिंग जरूरी है, लेकिन सही और प्रासंगिक टेस्टिंग उससे भी ज्यादा जरूरी है.
'मूवी टिकट से भी सस्ता है थायरॉयड टेस्ट...'
डॉ. अरविंद लाल ने कहा कि इंसान को केवल इस आधार पर खुद को स्वस्थ नहीं मान लेना चाहिए कि वह बाहर से ठीक दिख रहा है या महसूस कर रहा है. डायबिटीज और हाई बीपी जैसे रोग लंबे समय तक बिना किसी लक्षण के शरीर में छिपे रह सकते हैं. उन्होंने ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल, बीपी और किडनी फंक्शन की नियमित जांच कराने की सलाह दी, खासकर उन लोगों को जिनकी फैमिली हिस्ट्री में ये बीमारियां रही हैं.
डाइट पर बोलते हुए उन्होंने बहुत ज्यादा चीनी, नमक, तला-भुना खाना, वनस्पति और अत्यधिक घी से परहेज करने की सलाह दी. उन्होंने रोजाना 30 से 45 मिनट टहलने पर जोर दिया. लागत पर बात करते हुए डॉ. लाल ने चुटकी लेते हुए कहा कि आजकल सिनेमा हॉल में मूवी का टिकट भी थायरॉयड टेस्ट से ज्यादा महंगा आता है, इसलिए पैसों की वजह से जरूरी जांचों को न टालें.
एडवांस्ड टेस्ट: HbA1c, HOMA-IR और जेनेटिक टेस्टिंग
डॉ. डांग ने बताया कि डायग्नोस्टिक टेस्टिंग अब प्रिडिक्टिव (भविष्यवाणी करने वाली) मेडिसिन की तरफ बढ़ रही है:
HbA1c और HOMA-IR: इंसुलिन रेजिस्टेंस और डायबिटीज की स्थिति जानने के लिए ये बेहद मददगार हैं. इसके अलावा गट माइक्रोबायोम और सीलिएक डिजीज के लिए tTG टेस्ट भी किए जा रहे हैं.
जेनेटिक टेस्टिंग: डॉ. हर्ष महाजन ने कहा कि परिवार में कैंसर की हिस्ट्री होने पर जेनेटिक टेस्टिंग और होल-बॉडी एमआरआई (MRI) से शुरुआती जोखिम पहचाना जा सकता है. लेकिन ऐसी जांचों से पहले प्रॉपर काउंसलिंग बेहद जरूरी है.
डॉ. लाल ने एंजेलिना जोली का उदाहरण देते हुए समझाया कि BRCA1 म्यूटेशन से जेनेटिक रिस्क का पता चलने पर उन्होंने प्रिवेंटिव सर्जरी कराई थी, लेकिन जेनेटिक रिस्क होने का मतलब यह नहीं कि बीमारी होगी ही.
Widal टेस्ट और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का खतरा
ग्रामीण इलाकों में टाइफाइड के लिए किए जाने वाले विडाल टेस्ट पर डॉ. लाल ने कहा कि शुरुआती दिनों में यह नेगेटिव आ सकता है, इसलिए इसे 'ब्लड कल्चर' का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए. डॉ. डांग ने चेतावनी दी कि गलत और अनावश्यक टेस्ट से एंटीबायोटिक्स का बेजा इस्तेमाल होता है, जिससे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) का खतरा बढ़ रहा है, यानी शरीर पर दवाएं काम करना बंद कर देती हैं.
सत्र के समापन पर डॉ. महाजन ने स्पष्ट किया कि ChatGPT जैसे जनरल एआई और मेडिकल एआई में बहुत अंतर है. लोग मेडिकल टर्म्स समझने के लिए जनरल एआई का सहारा ले सकते हैं, लेकिन खुद से डायग्नोसिस या इलाज करने के लिए एआई पर बिल्कुल भरोसा न करें. मेडिकल एआई सिस्टम्स (जैसे Carpel.ai) रिपोर्टिंग को तेज, सटीक और त्रुटिहीन बनाने में डॉक्टरों की मदद कर सकते हैं, लेकिन वे कभी भी क्वालिफाइड डॉक्टर की जगह नहीं ले सकते.