नाना पाटेकर अपनी जिंदगी के बारे में बात करते थे तो उसमें चमक-दमक से ज्यादा खुरदुरापन सुनाई देता था. वह अपने संघर्ष को ब्रूट होकर स्वीकार करते . कई बार इतनी बेरहमी से कि सुनने वाले को असहजता होने लगती है. एक बार उन्होंने कहा था- 'भूख और अपमान मेरे दो गुरु रहे.' यह साहित्य का कोई रूपक नहीं था. भूख उनके शरीर का अनुभव थी और अपमान उनका सोशल एक्सपीरियंस. भूख ने उन्हें जीवन की कीमत समझाई और अपमान ने आत्मसम्मान का बोध कराया. शायद यही वजह है कि बाद में उनके अभिनय में बनावटीपन के लिए ज्यादा जगह नहीं बची.
आज नाना पाटेकर नहीं रहे. इसी के साथ हमें याद आता है उनके अभिनय और अनुभवों का संसार, उनका जमाना.
नाना का अभिनय इसलिए भी अलग दिखाई देता है क्योंकि ये कलाकार गरीबी, गुस्से और संघर्ष को केवल एक्टिंग की तकनीक से नहीं पकड़ते थे. उन्होंने इन भावनाओं को करीब से देखा था.
उनका किरदार क्यों अधीर (अंकुश, परिंदा) रहता था, बेचैनी उनके निजी जीवन में थी.
उनके किरदार का तिरस्कार, उसका आत्मसम्मान, उसका गुस्सा और उसकी टूटन कई बार इतनी सहज लगती है क्योंकि इन भावनाओं से उनका रिश्ता सिर्फ कैमरे तक सीमित नहीं था.
नाना पाटेकर के पहले रोल की कहानी जानते हैं आप?
पहले ही रोल के लिए ऑफर हुआ रेपिस्ट का रोल, गाली दे बैठे
नाना थियेटर कर रहे थे. अभिनेत्री स्मिता पाटिल के साथ उनकी बहुत अच्छी दोस्ती थी. नाना थियेटर में काम करते हुए गदगद थे. लेकिन स्मिता चाहती थीं कि वे फिल्मों में काम करें.
लोकसत्ता की रिपोर्ट के अनुसार स्मिता पाटिल उनसे पुणे के दिनों से परिचित थीं. वह नाना से लगातार कहती थीं कि फिल्मों में काम करो, एक फिल्म के जरिए तुम एक साथ बहुत ज्यादा लोगों तक पहुंच सकते हो. नाना रियलिज्म में विश्वास करते थे. वे इस बात को टालते रहते थे. उनका कहना था कि थिएटर के मंच पर उन्हें 'राजा' जैसा महसूस होता था.
लेकिन स्मिता अड़ी रहीं. उन्होंने नाना का नाम फिल्मकार रवि चोपड़ा को सुझाया और उन्हें आज की आवाज में काम दिलाने की कोशिश की.
नाना ने टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ इंटरव्यू में खुद कहा था, "स्मिता मुझे पुणे से जानती थीं. मैं हिचकिचा रहा था, लेकिन उन्होंने ज़ोर दिया. वह मुझे 'आज की आवाज़' फ़िल्म में एक रोल के लिए रवि चोपड़ा के पास ले गईं. शुरू में मुझे रेप करने वालों में से एक का बहुत घटिया रोल ऑफ़र किया गया. मैंने मना कर दिया और उन्हें बताया कि मैं किस तरह का एक्टर हूं."
नाना पाटेकर ने आगे कहा था, "मैं नाराज़ होकर जा ही रहा था कि तभी स्मिता आ गईं. उन्होंने मुझसे पूछा, 'तुम क्यों जा रहे हो?' मैंने उस व्यक्ति को गाली दी जिसने मुझे वह रोल ऑफ़र किया था. और फिर मुझे एक बेहतर रोल मिला. हालांकि वह भी बहुत शानदार नहीं था, लेकिन उस फ़िल्म से मुझे पहचान ज़रूर मिली."
दिलचस्प बात यह है कि नाना का पहला फिल्मी पड़ाव भी स्मिता पाटिल के साथ ही था. ये फिल्म थी 1978 में आई गमन.
भूख और अपमान मेरे दो गुरु
नाना का जमाना आज के जमाने से बिल्कुल अलग था. संघर्ष को दिखाने के लिए सोशल मीडिया नहीं था. गरीबी की कहानी को वायरल करने का कोई मंच नहीं था. पहचान बनाने के लिए लगातार खुद को दिखाते रहने का दौर नहीं था. काम करना था, रिजेक्शन झेलना था, कम पैसों में गुजारा करना था और अगली सुबह फिर उसी जिंदगी में लौटना था.
अपने बचपन का संघर्ष बताते हुए नाना ने 11 साल पहले टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ एक इंटरव्यू में कहा था, "मैं सिर्फ़ 13 साल का था, जब हम मिडिल क्लास से लोअर मिडिल क्लास और फिर लोअर क्लास में आ गए, क्योंकि मेरे पिता के एक करीबी ने उनकी प्रॉपर्टी समेत सब कुछ छीन लिया था. अचानक 13 साल की उम्र में मुझे काम करना पड़ा."
"स्कूल के बाद मैं फ़िल्मों के पोस्टर पेंट करने के लिए आठ किलोमीटर पैदल चलकर चुनाभट्टी जाता था, ताकि महीने में 35 रुपये कमा सकूं और दिन में एक बार खाना मिल सके. मैं नौवीं क्लास में था लेकिन उस अपमान और भूख ने मुझे इतना कुछ सिखा दिया कि मुझे किसी एक्टिंग स्कूल जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी." नाना पाटेकर ने बाद के इंटरव्यू में कई बार कहा कि भूख और अपमान मेरे दो गुरु हैं."
गुस्से की वजह ये है
नाना पाटेकर ने अपने गुस्सैल स्वभाव की वजह बताते हुए कहा था, "मुझे लगता है कि ऐसा उस अपमान की वजह से है जो मैंने तब सहा था. लोग मेरे साथ जैसा बर्ताव करते थे, जब भी मुझे वह पल याद आता है, मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं. 13 साल की उम्र से लेकर आज तक, मैं 51 सालों से काम कर रहा हूं."
संवाद में बेचैनी, किरदार में गुस्सा
नाना पाटेकर के अभिनय की खासियत यह थी कि उनके किरदारों का गुस्सा और बेचैनी सिर्फ संवादों में नहीं, उनकी आंखों और देहभाषा में भी दिखाई देती थी. 'अंकुश' में बेरोजगारी, व्यवस्था और सामाजिक अन्याय से जूझता युवा भीतर के गुस्से और असंतोष को अपने व्यवहार में उतार देता है. ये नाना साहेब का बचपन था. 13-14 साल का लड़का जब अपनी छोटी-मोटी इच्छाओं के लिए तिरस्कार झेलता था.
'परिंदा' में किशन अपराध और हिंसा की दुनिया में फंसा है, जहां मानसिक तनाव और भीतर की बेचैनी लगातार बढ़ती रहती है. 'क्रांतिवीर' में उनका किरदार प्रतिशोध और व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश का विस्फोट बन जाता है. इन किरदारों में एक साझा धागा है. भीतर जमा गुस्सा, बेचैनी और टूटन, जिसे नाना ने सिर्फ अभिनय नहीं किया, बल्कि बेहद स्वाभाविक ढंग से जिया. नाना ने स्वयं इसका एहसास किया था.
रुला देगी मिठाई न खाने की वजह
नाना पाटेकर ने 15 वर्ष पहले कहा था कि वे मिठाई नहीं खाते हैं. जब उन्होंने इसकी वजह बताई तो ये सचमुच रुला देने वाली थी.
उन्होंने कहा था, "आज मैं मिठाई नहीं खाता. कभी मिठाइयां मुझे बहुत पसंद थीं, लेकिन जिस दिन से वे मेरे हिस्से में आनी बंद हुईं, तब से आज तक मैंने मिठाई नहीं खाई. अब मेरे लिए मिठाइयां सोने के समान हैं बेहद कीमती, लेकिन ऐसी चीज जिसे मैं अब नहीं खाऊंगा."
यानी कि जिस शौक या ख्वाहिश को अभाव की वजह से वे बचपन में पूरा नहीं कर पाए, उसे उन्होंने ताउम्र के लिए छोड़ दिया. तब जब उनके पास संसाधन थे. ये बताता है कि नाना चीजों को कितने गहरे भाव से लेते थे.