कला का काम परेशान लोगों को सुकून देना और सुकून से बैठे लोगों को असहज करना है. यह कथन तमिल निर्देशक कार्तिक सुब्बाराज की फिल्म डोरोथी की मूल भावना को बिल्कुल सटीक तरीके से बयां करता है. ऋषिकांत और सनंत के शानदार अभिनय से सजी यह फिल्म ऐसा सिनेमा बनाने की साहसिक कोशिश है, जो लंबे समय से हाशिए पर धकेले गए लोगों को अपनापन देता है, वहीं समाज के उस तबके को असहज करता है, जो हमेशा व्यवस्था के केंद्र में रहा है.
तमिल सिनेमा में ट्रांसजेंडर किरदारों की कहानियां पहले भी दिखाई गई हैं, लेकिन उनमें अक्सर एक बात समान रही है दुख और संघर्ष. ट्रांस किरदारों को अस्वीकृति, भेदभाव, हिंसा और सामाजिक अकेलेपन से गुजरते हुए दिखाया जाता रहा है. डोरोथी इस कहानी को उलट देती है. कार्तिक सुब्बाराज एक ट्रांस महिला को वह जगह देते हैं, जो पर्दे पर उसे बहुत कम मिली है. इच्छा रखने की, प्यार करने की और अपनी जिंदगी को सिर्फ अपने दुख तक सीमित न रखने की.
और यहीं डोरोथी असहज करने वाली फिल्म बन जाती है. यह फिल्म मर्दानगी, इच्छा और इस सवाल की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देती है कि आखिर किसे आकर्षक या चाहने योग्य माना जाता है इसलिए यह उन लोगों को असहज कर सकती है, जो इन स्थापित धारणाओं के भीतर सहज हैं, लेकिन उन लोगों को प्रतिनिधित्व और पहचान देती है, जिन्होंने खुद को पर्दे पर इस तरह शायद ही कभी देखा हो.
आगे बढ़ने से पहले एक जरूरी स्पॉइलर. अगर आपने अभी तक डोरोथी नहीं देखी है तो यहीं रुक जाना बेहतर है. फिल्म में कुछ ऐसे मोड़ हैं, जिनका खुलासा आगे होने वाला है. डोरोथी की शुरुआत में ऐसा लगता है जैसे हम दो अलग-अलग फिल्में देख रहे हैं. पहला हिस्सा हॉरर फिल्म जैसा है. सुब्बू एक ऊंची जाति के परिवार से आता है, जहां जातिवादी पितृसत्ता का चेहरा उसका पिता व्हिसल वीरैया है, जिसका किरदार मुथुकुमार ने शानदार ढंग से निभाया है. वह पैसे उधार देने की आड़ में महिलाओं को परेशान करता है और पुरुषों को अपमानित करता है. उसके दोनों बेटों, जिनमें छोटा बेटा सुब्बू भी शामिल है. उसकी परवरिश बचपन से ही हिंसा के माहौल में होती है.
बचपन में जब सुब्बू अपने दोस्त कार्ति को कुछ लड़कों की गुंडागर्दी से बचाकर घर लाता है, तो उसके पिता का पहला सवाल होता है कि कार्ति किस जाति का है? दोनों बच्चे स्वाभाविक रूप से करीब आते हैं. हिंसा के बीच उनकी दोस्ती गहरी होती जाती है, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, बचपन की मासूमियत और गर्मजोशी धीरे-धीरे गायब होने लगती है लेकिन सुब्बू के इस कठोर बाहरी व्यक्तित्व के पीछे स्त्रीत्व को अपनाने की एक गहरी इच्छा छिपी है. उसका जातिवादी और स्त्री विरोधी परिवार उसे अपने इस हिस्से को समझने या व्यक्त करने की कोई जगह नहीं देता.
और कार्ति का क्या? बचपन में कार्ति खुलकर रोता है लेकिन सुब्बू उसे सिखाता है कि रोना लड़कियों का काम है. कार्ति भी जल्द ही अपनी भावनाओं को दबाना सीख जाता है. वह भी उसी मर्दानगी का प्रोडक्ट बन जाता है, जिसके बीच वह बड़ा हो रहा है. जब सुब्बू अपने भीतर की नरमी दिखाता है, तो कार्ति भी उसे खारिज कर देता है.
सुब्बू पहले ही अपने परिवार की हिंसक पुरुष सत्ता के हाथों अपनी मां और बहन को खो चुका है. बाद में अपनी भाभी डोरोथी के सामने वह इन मौतों के बारे में एक अजीब सी बेरुखी के साथ बात करता है. डोरोथी का किरदार कीर्ति सुरेश ने निभाया है. परिवार के पुरुषों के हाथों उसकी जिंदगी का भी अंत हो जाता है. लगातार मौत और दमन के बीच जीते-जीते सुब्बू के भीतर संवेदनाएं जैसे सुन्न पड़ चुकी हैं. खासकर परिवार की महिलाओं को खोने का दर्द उसे उस पहचान के और करीब ले जाता है, जिसे उसने हमेशा अपने भीतर दबाकर रखा था.
फिर फिल्म का सबसे भयावह और याद रह जाने वाला क्षण आता है. सुब्बू एक महिला के रूप में खुद को बदलता है. एक ऐसी इच्छा, जिसे वह 16 साल की उम्र से अपने भीतर लिए घूम रहा था. वह साड़ी पहनकर बाहर आती है. बालों का जूड़ा बनाती है, आंखों में काजल लगाती है और माथे पर बिंदी सजाती है. लेकिन जैसे ही सुब्बू महिला बनता है, मौत एक बार फिर उसके पीछे चली आती है. ठीक वैसे ही जैसे उसने परिवार की दूसरी महिलाओं को खत्म किया था. इस बार मौत की वजह बनता है उसका बचपन का सबसे करीबी दोस्त कार्ति.
यहीं से डोरोथी एक प्रेम कहानी में बदल जाती है.जब कार्ति अपने बदले हुए दोस्त को देखता है तो उसकी पहली प्रतिक्रिया घृणा की होती है. एक तरह से वह एक नुकसान से जूझ रहा है. उस दोस्त के खोने का नुकसान, जिसने बचपन से उसे मजबूत रहना सिखाया था. कार्ति सुब्बू को मारने के इरादे से उसे अपने साथ एक रोड ट्रिप पर ले जाता है लेकिन इस सफर में उसे उस बदलाव को समझने का समय मिलता है. जिस दोस्त को वह जानता था, वह अब उसके सामने नहीं है. उनके साथ बिताए साल अतीत का हिस्सा बन चुके हैं. उसके सामने अब सुब्बू है. एक ऐसे रूप में, जिसमें वह हमेशा से खुद को देखना चाहता था.
सुब्बू को मारने की हिम्मत जुटाने से कुछ मिनट पहले कार्ति उससे पूछता है कि वह आखिर चाहता क्या है. सुब्बू अपने दिल की बात कहता है. वह खुश है. वह अपने मन की जिंदगी जीना चाहता है और यही वह क्षण है जब कार्ति उस इंसान को समझ पाता है, जो उसके सामने खड़ा है. एक ऐसा व्यक्ति जिसने सिर्फ एक छोटे से सपने के लिए बहुत कुछ खो दिया है. वह सपना है खुद को पाने का.
इसके बाद डोरोथी का वह हिस्सा आता है, जो कई दर्शकों को असहज करता है. कार्ति और सुब्बू की दोस्ती धीरे-धीरे प्रेम में बदल जाती है. दोस्तों का प्यार में बदलना सिनेमा में कोई नई बात नहीं है. नया यह है कि यहां वे दो दोस्त कौन हैं. आदर्श रूप से इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. यह दो सहमति से रिश्ते में आए वयस्कों के बीच का चुंबन है, जहां दोनों अपने जेंडर और उन तमाम सामाजिक जंजीरों से आगे जाकर एक-दूसरे को देखते हैं, जो उन्हें बांधती रही हैं.
उनके प्यार की पहली वास्तविक अभिव्यक्ति एक चुंबन के रूप में सामने आती है. इसके तुरंत बाद फिल्म के एंड क्रेडिट्स शुरू हो जाते हैं लेकिन वे एक तरह से कार्ति और सुब्बू की नई जिंदगी की शुरुआत भी हैं, जहां सुब्बू अपना नाम डोरोथी रखता है. थिएटर में इस चुंबन पर दर्शकों ने तालियां और सीटियां बजाईं, लेकिन ऑनलाइन इसे लेकर विरोध भी हुआ. कुछ लोगों ने कार्तिक सुब्बाराज पर फिल्म के जरिए संस्कृति खराब करने का आरोप लगाया और कहा कि पर्दे पर दो पुरुषों को किस करते दिखाया गया है.
लेकिन शायद वे सबसे महत्वपूर्ण बात को नजरअंदाज कर रहे हैं. सुब्बू कोई पुरुष नहीं है जो महिला होने का नाटक कर रहा है. डोरोथी वह इंसान है, जो सुब्बू हमेशा से बनना चाहता था और कार्ति ने सुब्बू को डोरोथी के रूप में स्वीकार कर लिया है. उसने उसके स्त्रीत्व को स्वीकार किया है. बात बहुत सरल है.
अगर दो सहमति से रिश्ते में आए वयस्कों का चुंबन, अपनी पहचान की खोज या किसी इंसान का अपने भीतर के स्त्रीत्व में सुकून पाना आपको असहज करता है, तो शायद डोरोथी ठीक वही फिल्म है, जिसे आपको देखने की जरूरत है क्योंकि डोरोथी आपसे ट्रांस लोगों को सिर्फ एक पहचान के रूप में नहीं, बल्कि इंसान के रूप में देखने को कहती है. ऐसे इंसान, जिनमें वही इच्छाएं, वही प्रेम, वही लालसा और अपने जीवन पर वही अधिकार है, जो पुरुषों और महिलाओं को हमेशा से हासिल रहा है.
यह फिल्म सिर्फ एक ट्रांस महिला को पीड़ित के रूप में दिखाने तक सीमित नहीं रहती. वह उसे एक ऐसे भावनात्मक रूप से जागरूक इंसान के तौर पर पेश करती है, जो प्यार करना भी चाहती है और प्यार पाना भी और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि डोरोथी दिखाती है कि स्वीकार करना और समावेशी होना भी मर्दानगी का एक रूप हो सकता है. शायद उस हिंसक मर्दानगी से कहीं ज्यादा अर्थपूर्ण, जो बचपन में कार्ति और सुब्बू पर थोपी गई थी. इन तमाम वजहों से डोरोथी पर बात होना जरूरी है यह सिर्फ किसी ट्रांस किरदार या प्रेम कहानी का उत्सव नहीं है. डोरोथी आपसे उसके लिए दया मांगने को नहीं कहती. वह आपसे सिर्फ इतना कहती है कि उसे उसी तरह देखिए, जिस तरह आखिरकार कार्ति उसे देख पाता है.