राम की कहानी सदियों पुरानी है, लेकिन उसकी प्रासंगिकता हर दौर में बनी रही है. भारतीय जनमानस में राम सिर्फ एक धार्मिक या पौराणिक पात्र नहीं बल्कि आस्था, आदर्श और मर्यादा के प्रतीक हैं. उन्हें कभी एक आदर्श बेटे या पति के रूप में देखा गया, तो कभी अन्याय के खिलाफ खड़े योद्धा और एक ऐसे राजा के रूप में, जिनके फैसलों, कर्तव्यों और मर्यादाओं पर आज भी बहस होती है. राम को समझने का नजरिया समय के साथ बदलता रहा है, लेकिन उनके प्रति लोगों का आकर्षण कभी कम नहीं हुआ. शायद यही वजह है कि राम की कथा किसी एक देश, भाषा या संस्कृति की सीमाओं में नहीं बंधी. भारत से निकलकर यह दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों और जापान तक पहुंची.
राम की कहानी को हर पीढ़ी अपने समय के हिसाब से समझने और देखने की कोशिश करती रही है. शायद यही वजह है कि राम की कहानी जितनी बार कही गई, उतनी ही बार नए रूप में सामने आई. इस विरासत को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने और दुनिया के सामने नए रूपों में पेश करने में टेलीविजन और सिनेमा की भूमिका बेहद अहम रही है.भारत में राम का किरदार कभी अरुण गोविल के जरिए घर-घर की आस्था का हिस्सा बना, तो कभी बड़े पर्दे पर अलग-अलग अभिनेताओं ने अपनी कल्पना के मुताबिक राम को गढ़ा.
भारत में राम को पर्दे पर उतारने की कोशिशें उस दौर से शुरू हो गई थीं, जब सिनेमा अपनी पहचान बना ही रहा था. लेकिन राम का किरदार निभाना किसी दूसरे पौराणिक नायक की भूमिका निभाने जैसा नहीं था. यहां किसी एक्टर को सिर्फ एक किरदार नहीं निभाना था, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और कल्पना का हिस्सा बनना था. राम की छवि पहले से लोगों के मन में मौजूद थी. ऐसे में पर्दे पर दिखने वाले राम को उस छवि के करीब पहुंचना था.
राम पर बनी वो पहली फिल्म
भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में पौराणिक कहानियां फिल्मकारों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण थीं. दादा साहेब फाल्के ने 1917 में लंका दहन फिल्म के जरिए रामायण के एक अहम प्रसंग को पर्दे पर उतारा था. यह मूक फिल्मों का दौर था. फिल्म में अन्ना सालुंके ने राम और सीता दोनों की भूमिका निभाई थी. उस समय महिला कलाकारों का फिल्मों में काम करना आसान नहीं था, इसलिए एक ही पुरुष कलाकार ने दोनों किरदार निभाए. इसके बाद रामायण के प्रसंगों पर कई फिल्में बनीं. 1943 में विजय भट्ट की राम राज्य आई, जिसमें प्रेम अदीब ने राम का किरदार निभाया.

लेकिन राम की लोकप्रियता सिर्फ हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं थी. दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी रामायण को बड़े स्तर पर पर्दे पर उतारा गया. खासतौर पर तेलुगू सिनेमा में एनटी रामा राव यानी एनटीआर का राम के किरदार से गहरा जुड़ाव रहा. 1958 में आई संपूर्ण रामायणम में उन्होंने राम की भूमिका निभाई. इसके बाद 1963 की लव कुश और 1978 की श्री राम पट्टाभिषेकम जैसी फिल्मों में भी वह राम के रूप में नजर आए. एनटीआर की खासियत यह थी कि उन्होंने पौराणिक किरदारों को सिर्फ अभिनय के जरिए नहीं निभाया, बल्कि अपने व्यक्तित्व और संवाद अदायगी से उन्हें एक अलग पहचान दी. इस तरह दक्षिण भारतीय सिनेमा में राम की छवि एक ऐसे आदर्श राजा की रही, जिसमें शौर्य, गंभीरता और धर्म के प्रति अटूट प्रतिबद्धता दिखाई देती है.
अमर हो गया अरुण गोविल का राम रूप
अगर भारतीय टेलीविजन पर राम की छवि की बात हो तो शायद ही कोई अरुण गोविल को भूल पाए. 1987 में दूरदर्शन पर रामानंद सागर की रामायण का प्रसारण शुरू हुआ. अरुण गोविल ने राम का किरदार निभाया. यह सिर्फ एक टीवी सीरियल नहीं था, बल्कि भारतीय टेलीविजन के इतिहास की ऐसी घटना बन गया, जिसने देखने का पूरा अनुभव बदल दिया. रविवार की सुबह सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था. लोग टीवी के सामने बैठकर एक साथ रामायण देखते थे. कई जगहों पर टीवी को फूलों से सजाया जाता था और अरुण गोविल के पर्दे पर आते ही लोग हाथ जोड़ लेते थे. अरुण गोविल की शांत मुस्कान, सहज भाव से डायलॉग बोलने का अंदाज, चेहरे पर गंभीरता और सौम्य व्यक्तित्व ने राम की ऐसी छवि बनाई, जो आज भी लोगों के जेहन में बसी हुई है. दिलचस्प बात यह है कि इस किरदार का असर इतना गहरा था कि अरुण गोविल को वास्तविक जीवन में भी लोग राम की तरह सम्मान देने लगे. उनके लिए राम का मतलब सिर्फ एक योद्धा या राजा नहीं, बल्कि करुणा, संयम, त्याग और मर्यादा का प्रतीक बन गया. बाद के वर्षों में राम के कई रूप पर्दे पर आए, लेकिन अरुण गोविल से तुलना का सिलसिला कभी खत्म नहीं हुआ.
टीवी के राम
समय के साथ रामायण को नए दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिशें भी हुईं. 2008 में एनडीटीवी इमेजिन पर आई रामायण में गुरमीत चौधरी ने राम की भूमिका निभाई. इस सीरियल में तकनीक, भव्य सेट और एक्शन दृश्यों के जरिए कहानी को नए अंदाज में पेश किया गया. 2015 में आए सिया के राम में कहानी को सीता के नजरिये से देखने की कोशिश की गई. यहां राम का व्यक्तित्व भी सिर्फ एक आदर्श पुरुष तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके और सीता के रिश्ते, उनके फैसलों और उनके जीवन के संघर्षों को नए संदर्भ में समझने की कोशिश की गई. 2023 में ओम राउत की फिल्म आदिपुरुष में प्रभास राम के रूप में नजर आए. यहां राम का नाम राघव रखा गया और उन्हें एक अधिक एक्शन प्रधान, युद्ध के लिए तैयार योद्धा के रूप में दिखाया गया. उनके लुक, संवादों और फिल्म के वीएफएक्स को लेकर खूब बहस हुई. इसने एक बार फिर सवाल खड़ा किया कि क्या राम को पर्दे पर बदलते समय के हिसाब से नए रूप में दिखाया जा सकता है या उनकी एक तय छवि है, जिससे आगे बढ़ना दर्शकों के लिए मुश्किल है.
रामायण की कहानी भारत से निकलकर दुनिया के कई देशों के सिनेमाघरों तक पहुंची, लेकिन हर देश ने इसे अपने सांस्कृतिक और सामाजिक नजरिये से समझा. कहीं राम आदर्श राजा और धर्म के रक्षक बने, कहीं उनकी कहानी को बौद्ध मान्यताओं के साथ जोड़ा गया, तो कहीं फिल्मकारों ने इसे आधुनिक प्रेम, सत्ता और संघर्ष की कहानी में बदल दिया. दिलचस्प बात यह है कि विदेशों में रामायण की लोकप्रियता सिर्फ धार्मिक ग्रंथों या नाटकों तक सीमित नहीं रही. कई देशों में इस पर फिल्में और एनिमेशन भी बने.
जब एनिमेशन की दुनिया में पहुंचे राम
राम की कहानी का एक दिलचस्प पड़ाव जापान में देखने को मिलता है. 1992 में जापानी फिल्मकार युगो साको ने इसे डायरेक्ट किया. यह भारत और जापान का साझा प्रोजेक्ट था, जिसे जापानी फिल्मकार युगो साको और भारतीय एनिमेशन के दिग्गज राम मोहन ने मिलकर तैयार किया. फिल्म में राम को एक युवा, साहसी और पराक्रमी राजकुमार के रूप में दिखाया गया. इसकी खासियत यह थी कि भारतीय महाकाव्य की कहानी को जापानी एनिमेशन की तकनीक और शैली के साथ पेश किया गया. राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान और रावण के किरदारों को पारंपरिक भारतीय रूप-रंग दिया गया, लेकिन युद्ध के दृश्य, एक्शन और किरदारों की पेशकश में जापानी एनीमे का प्रभाव साफ दिखाई दिया.

दरअसल युगो साको 1983 में भारत आए थे. इसी दौरान उनका परिचय रामायण से हुआ. वह इस कहानी से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने जापानी भाषा में रामायण के दस अलग-अलग संस्करण पढ़े और फिर इसे एनिमेशन के जरिए दुनिया तक पहुंचाने का फैसला किया. दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में भारत में भगवान के किरदारों को कार्टून के रूप में दिखाने को लेकर विरोध हुआ था. लेकिन इस फिल्म ने साबित किया कि राम की कहानी को भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक सीमाओं से बाहर भी एनिमेशन के जरिए समझा और सराहा जा सकता है.
फ्यूचरिस्टिक हैं थाईलैंड के राम
भारत से हजारों किलोमीटर दूर थाईलैंड में भी राम की कहानी वहां की संस्कृति का अहम हिस्सा बन चुकी है. यहां रामायण को रामाकियन कहा जाता है, जिसका अर्थ है राम की महिमा लेकिन थाईलैंड में राम की छवि भारतीय रामायण से कुछ अलग है. यहां राम की कहानी पर आधारित सबसे दिलचस्प आधुनिक फिल्मों में 2023 की एनिमेशन फिल्म मंत्रा वॉरियर: द लेजेंड ऑफ द एट मून्स है. फिल्मकार वीरापत्रा जिनानाविन ने रामाकियन की कहानी को राजमहलों और युद्धभूमि से निकालकर भविष्य की एक काल्पनिक दुनिया में पहुंचा दिया. कहानी में आठ चंद्रमाओं के एक साथ आने और एक दिव्य शक्ति के जागृत होने का प्रसंग है. सीता के भीतर इस शक्ति के होने की मान्यता के चलते तोसाकान उनका अपहरण कर लेता है और फिर राम की ओर से योद्धा उन्हें बचाने निकलते हैं. फिल्म में रोबोटिक्स, आधुनिक तकनीक, सुपरपावर और साइंस फिक्शन का इस्तेमाल किया गया है यानी थाईलैंड ने अपनी पारंपरिक रामायण को नई पीढ़ी के लिए एक फ्यूचरिस्टिक एक्शन एडवेंचर में बदल दिया.
कंबोडिया की संस्कृति में बसे राम
ठीक इसी तरह कंबोडिया में भी राम की कहानी सदियों से लोगों की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा रही है. यहां रामायण को रीमकर कहा जाता है, जिसमें राम को प्रीह रीम के नाम से जाना जाता है. कंबोडिया ने भारतीय रामायण को जस का तस अपनाने के बजाय उसमें अपनी लोककथाओं, मान्यताओं और कल्पनाओं को भी शामिल किया. राम की इस स्थानीय कथा का प्रभाव वहां के सिनेमा पर भी दिखाई दिया. 1965 में Preah Ream Jole Kout Bunchout Neang Seda नाम से रामायण पर फिल्म बनी. इस तरह कंबोडिया में राम सिर्फ एक धार्मिक पात्र नहीं, बल्कि वहां की कला, नृत्य, साहित्य और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बन गए.
इंडोनेशिया की फिल्मों में राम का नया रूप
इसी तरह राम की यह कहानी जब इंडोनेशिया पहुंचती है तो और भी दिलचस्प हो जाती है. मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी वाला मुल्क होने के बावजूद रामायण की परंपरा आज भी वहां सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा है. इंडोनेशिया में रामायण का एक खास सिनेमाई रूप 2006 में आई फिल्म ओपेरा जावा में देखने को मिला. निर्देशक गरिन नुग्रोहो की इस फिल्म में रामायण के सीता हरण प्रसंग को आधुनिक इंडोनेशियाई समाज के संदर्भ में पेश किया गया. खास बात यह थी कि निर्देशक ने पौराणिक कथा को सीधे दोहराने के बजाय उसके जरिए आधुनिक समाज में सत्ता, प्रेम, हिंसा और स्त्री की स्थिति जैसे सवाल उठाए. इस तरह इंडोनेशिया में राम की छवि सिर्फ एक आदर्श राजा या योद्धा तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनकी कथा को स्थानीय समाज और समकालीन जीवन के आईने की तरह भी इस्तेमाल किया गया.

आखिर हर दौर में राम को नए सिरे से क्यों दिखाया जाता रहा?
राम की कहानी का इतना लंबा सफर बताता है कि वह किसी एक समय, भाषा या देश तक सीमित नहीं है. भारत में राम को मर्यादा पुरुषोत्तम, आदर्श बेटे, पति और राजा के रूप में देखा गया. जापान ने उन्हें एनिमेशन के जरिए एक युवा और साहसी नायक के रूप में दुनिया के सामने रखा. थाईलैंड ने उन्हें अपनी राजशाही और सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ा. इनमें अंतर जरूर है, लेकिन राम के चरित्र का मूल संघर्ष लगभग हर जगह मौजूद है. यही वजह है कि राम को पर्दे पर दिखाने की कोशिश कभी खत्म नहीं हुई.
हर दौर का फिल्मकार और हर समाज राम को अपने समय की नजर से देखना चाहता है. अब रणबीर कपूर की रामायण के जरिए एक बार फिर यही कोशिश हुई है. फर्क इतना है कि इस बार कहानी को सिर्फ भारतीय दर्शकों तक पहुंचाने की नहीं, बल्कि वैश्विक सिनेमा के स्तर पर पेश करने की तैयारी है.