साल था 1956. पाकिस्तान के थिएटर्स में बेदारी नाम की फिल्म दिखाई जा रही थी. लोगों का हुजूम ऐसा कि सारे थिएटर्स खचाखच भरे थे. रफीक रिजवी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में रतन कुमार के साथ रागिनी और संतोष कुमार नजर आए थे. फिल्म के गाने, खासकर सलीम रजा की आवाज में गाया गया आओ बच्चों सैर कराएं तुमको पाकिस्तान की पाकिस्तान में बेहद लोकप्रिय हुआ. ये गाना इतना हिट हुआ कि पूरे पाकिस्तान के बच्चे-बच्चे की जुबां पर था. फिल्म ब्लॉकबस्टर हिट हुई. लेकिन फिर बैन क्यों कर दी गई?
कुछ दर्शकों को फिल्म देखते हुए एक अजीब सी बात महसूस हुई. उन्हें लगा कि उन्होंने यह फिल्म पहले कहीं देखी है. सिर्फ कहानी ही नहीं, इसके गानों की धुनें भी उन्हें जानी-पहचानी लगीं. जल्द ही इसकी वजह सामने आ गई. बेदारी दरअसल 1954 में आई हिंदी फिल्म जागृति की हूबहू नकल थी, और जागृति खुद बंगाली फिल्म परिवर्तन का रीमेक थी.
इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प सिरा जिस शख्स से जुड़ता है, उनका नाम था रतन कुमार. रतन कुमार का असली नाम सैयद नजीर अली रिजवी था और वह तब बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री के लोकप्रिय बाल कलाकारों में गिने जाते थे.
1941 में जन्मे रतन कुमार ने महज पांच साल की उम्र में अभिनय शुरू कर दिया था. परिवार के दोस्त और लेखक कृष्ण चंदर ने अपनी फिल्म राख में उन्हें बाल कलाकार की भूमिका दी थी. इसके बाद रतन कुमार ने बतौर बाल कलाकार कई फिल्मों में काम किया. ‘बूट पॉलिश’ और ‘बैजू बावरा’ जैसी चर्चित फिल्मों में नजर आने के बाद उन्हें सत्येन बोस की फिल्म ‘जागृति’ में शक्ति का किरदार मिला. फिल्म जब 1954 में रिलीज हुई, तब रतन कुमार की उम्र करीब 13 साल थी.
इसके दो साल बाद यानी 1956 में रतन कुमार अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए. बंटवारे के बाद उनके परिवार के कई रिश्तेदार पाकिस्तान में जाकर बस चुके थे. भारत में काम के सीमित मौकों को भी उनके पाकिस्तान जाने की वजहों में से एक बताया जाता है.
पाकिस्तान पहुंचने के बाद रतन कुमार के बड़े भाई वजीर अली रिजवी ने फिल्म हयात नाम से एक प्रोडक्शन हाउस शुरू किया. इस प्रोडक्शन हाउस की पहली फिल्म बनी ‘बेदारी’ और यहीं से कहानी ने एक अजीब मोड़ लिया. जिस ‘जागृति’ में रतन कुमार खुद अभिनय कर चुके थे, उसी फिल्म को पाकिस्तान में नए नाम और नए संदर्भों के साथ दोबारा बनाया गया.
‘बेदारी’ में रतन कुमार ने निभाए दो किरदार
बेदारी में रतन कुमार ने एक नहीं, बल्कि दो भूमिकाएं निभाईं. उन्होंने अजय का किरदार निभाया, जिसका नाम पाकिस्तानी फिल्म में जफर कर दिया गया था. वहीं ‘जागृति’ के शक्ति के किरदार का नाम बदलकर सबर अली कर दिया गया. दिलचस्प बात यह थी कि किरदारों के नाम बदलने के बावजूद उनके अर्थ को बरकरार रखा गया था. अजय और जफर दोनों का अर्थ हिंदी और उर्दू में जीत होता है.
हालांकि, दोनों फिल्मों के बीच समानता सिर्फ कहानी और किरदारों तक सीमित नहीं थी. सबसे ज्यादा चौंकाने वाली समानता उनके गानों में थी. ‘बेदारी’ में मूल धुनों और मेलोडी को बड़े पैमाने पर बरकरार रखा गया, लेकिन गीतों के बोल बदल दिए गए. भारतीय राष्ट्रवादी संदर्भों की जगह पाकिस्तानी राष्ट्रवादी संदर्भ डाल दिए गए.
मसलन, ‘जागृति’ का मशहूर गीत था, ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की’. बेदारी में यही गीत बदलकर ‘आओ बच्चों सैर कराएं तुमको पाकिस्तान की’ कर दिया गया. इसी तरह जहां मूल गीत में ‘वंदे मातरम्’ आता था, वहां ‘बेदारी’ में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ कर दिया गया.
एक और गीत में ‘जागृति’ की पंक्तियां थीं, ‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’. ‘बेदारी’ में इन्हें बदलकर ‘दे दी हमें आजादी की दुनिया हुई हैरान, ऐ कायदे-आजम तेरा एहसान है एहसान’ कर दिया गया. यानी महात्मा गांधी की जगह मोहम्मद अली जिन्ना आ गया.
यह सिलसिला सिर्फ एक-दो गानों तक सीमित नहीं था. फिल्म के कई गीतों में मूल धुनें बरकरार रखी गईं, जबकि उनके बोल बदलकर भारतीय संदर्भों की जगह पाकिस्तान से जुड़े संदर्भ डाल दिए गए.
आखिर ‘बेदारी’ की पोल कैसे खुली?
शुरुआत में दोनों फिल्मों की समानता शायद इसलिए सामने नहीं आई क्योंकि उस समय पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन पर प्रतिबंध था. ऐसे में पाकिस्तानी दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा ‘जागृति’ को देख ही नहीं पाया था.
बाद में पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड के एक सदस्य ने डॉन को इस पूरे मामले के बारे में बताते हुए कहा था कि भारतीय फिल्मों के आयात और सार्वजनिक प्रदर्शन पर प्रतिबंध का फायदा उठाते हुए 1956 में लाहौर के फिल्म निर्माताओं ने ‘बेदारी’ बनाई, जो कहानी और गानों के मामले में ‘जागृति’ की कार्बन कॉपी थी.
शुरुआत में ‘बेदारी’ ने सिनेमाघरों में शानदार कारोबार किया. लेकिन कुछ ही समय बाद दर्शकों को इसकी असलियत का पता चलने लगा. उन्हें समझ आया कि वे जिस फिल्म को देख रहे हैं, उसकी कहानी और गानों की धुनें पहले से मौजूद एक भारतीय फिल्म से मिलती हैं.
इसके बाद विरोध शुरू हो गया. सार्वजनिक प्रदर्शन के खिलाफ प्रदर्शन हुए और मामला इतना बढ़ा कि पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड ने ‘बेदारी’ पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिया. फिल्म के गानों पर भी रोक लगा दी गई.
क्या ‘बेदारी’ का असर रतन कुमार के करियर पर पड़ा?
‘बेदारी’ को लेकर लंबे समय से यह अटकल लगाई जाती रही है कि पाकिस्तान जाने के बाद रतन कुमार खुद को वहां के फिल्म उद्योग में स्थापित करना चाहते थे और शायद इसी वजह से ‘जागृति’ जैसी फिल्म को नए रूप में बनाने का हिस्सा बने. हालांकि, बाल कलाकार के तौर पर बेहद लोकप्रिय रहे रतन कुमार बड़े होकर मुख्य अभिनेता के रूप में वैसी सफलता हासिल नहीं कर पाए.
अपने करियर के उतार-चढ़ाव को याद करते हुए रतन कुमार ने बाद में कहा था कि हर किसी के करियर में उतार-चढ़ाव आते हैं. उन्होंने माना कि जब उन्होंने शुरुआत की थी तब वह बहुत छोटे थे और उन्हें इस बात की समझ नहीं थी कि फिल्म इंडस्ट्री कैसे काम करती है. उम्र बढ़ने के साथ उन्हें इस दुनिया को समझने का मौका मिला.
उन्होंने यह भी कहा कि जब चीजें आसानी से मिल जाती हैं तो इंसान उनसे सीख नहीं पाता. इसी वजह से वह अपने बच्चों को किसी भी चीज को हल्के में न लेने की सीख देते थे.
जहां पाकिस्तान में ‘बेदारी’ अपनी नकल के विवाद की वजह से याद की गई, वहीं भारत में ‘जागृति’ हिंदी सिनेमा की चर्चित बाल फिल्मों में शामिल हो गई. इसे कई फिल्मफेयर पुरस्कार मिले और बेस्ट हिंदी फीचर फिल्म का नेशनल फिल्म अवॉर्ड भी हासिल हुआ. यानी एक ही कहानी की दो यात्राएं हुईं. भारत में ‘जागृति’ देशभक्ति और बच्चों से जुड़ी एक यादगार फिल्म बन गई, जबकि पाकिस्तान में उसी कहानी से बनी ‘बेदारी’ अपनी नकल के विवाद और उसके बाद लगे प्रतिबंध की वजह से इतिहास का हिस्सा बनी.