पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर फेमस होना अब सिर्फ लाइक्स और फॉलोअर्स की कहानी नहीं रह गई है. टिकटॉकर्स और खासकर युवा महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. 28 साल की टिकटॉकर शम्सो बीबी, जिन्हें सोशल मीडिया पर आयशा गिलमाना के नाम से जाना जाता था, की पंजाब के तक्षशिला में गोली मारकर हत्या कर दी गई. बताया जा रहा है कि हत्या के पीछे आर्थिक विवाद हो सकता है.
सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर पाकिस्तान में सोशल मीडिया क्रिएटर्स बार-बार निशाना क्यों बन रहे हैं?
13 लाख फॉलोअर्स वाली आयशा की गोली मारकर हत्या
स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुक्रवार को आयशा अपनी गाड़ी से जा रही थीं, तभी बाइक सवार दो हमलावरों ने उनका रास्ता रोका और गोलियां चला दीं. इसके बाद दोनों मौके से फरार हो गए.
घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ. आयशा के भाई नियामतुल्लाह ने एक स्वतंत्र मीडिया आउटलेट से बातचीत में कहा कि परिवार पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज शरीफ से दखल की मांग कर रहा है, क्योंकि परिवार का आरोप है कि पुलिस अब तक किसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर पाई है.
आयशा के टिकटॉक अकाउंट पर 13 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स थे. उनकी मौत के बाद अकाउंट भी डिएक्टिवेट कर दिया गया.
सिर्फ आयशा नहीं, पहले भी निशाने पर आए टिकटॉकर्स
आयशा की हत्या को किसी एक घटना तक सीमित करके देखना मुश्किल है. पाकिस्तान में पिछले कुछ समय में टिकटॉकर्स और सोशल मीडिया से जुड़ी युवा महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कई मामले सामने आए हैं.
इसी साल जुलाई में रावलपिंडी के लालकुर्ती इलाके में अली रजा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. स्थानीय रिपोर्ट्स में इसे उनके सोशल मीडिया वीडियो से जुड़े विवाद से जोड़ा गया था. इस मामले में पुलिस ने संदिग्धों को गिरफ्तार किया था.
वहीं पिछले साल जनवरी में रावलपिंडी में एक 16 साल की लड़की की उसके पिता ने कथित ‘ऑनर किलिंग’ कर दी थी. पुलिस के मुताबिक, लड़की ने अपना टिकटॉक अकाउंट डिलीट करने से इनकार किया था और फिर जून में इस्लामाबाद में 17 साल की टिकटॉक क्रिएटर सना यूसुफ की उनके घर के भीतर ही गोली मारकर हत्या कर दी थी.
सना यूसुफ केस में हुई थी बड़ी सजा
सना यूसुफ की हत्या का मामला अदालत तक पहुंचा और इसमें आरोपी उमर हयात को जिला एवं सत्र अदालत ने कई धाराओं के तहत 21 साल की सजा सुनाई. अदालत ने सना के परिवार को मुआवजा देने और जुर्माना भरने का भी आदेश दिया. हालांकि, स्थानीय मीडिया के मुताबिक इस फैसले के खिलाफ अपील इस्लामाबाद हाईकोर्ट में लंबित है.
यानी एक तरफ सोशल मीडिया पर युवा क्रिएटर्स की लोकप्रियता बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ उनकी सुरक्षा को लेकर खतरे भी लगातार सामने आ रहे हैं.
सवाल सिर्फ टिकटॉक का नहीं, सोच का भी है
आयशा की हत्या के बाद सोशल मीडिया पर उनकी मौत को लेकर एक और बेहद परेशान करने वाली बहस शुरू हो गई. एक सोशल मीडिया पेज ने उनकी अंतिम यात्रा की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा कि 13 लाख फॉलोअर्स होने के बावजूद अंतिम संस्कार में कम लोग पहुंचे. पोस्ट में इसे सोशल मीडिया की ‘हकीकत’ बताया गया.
पाकिस्तानी पत्रकार अम्मारा अहमद ने इस तरह की कवरेज पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी महिलाओं को मौत के बाद भी कोई संवेदनशीलता नहीं मिलती. उनका सवाल था कि किसी युवा महिला की हत्या के बाद उसकी मौत और इंसाफ पर बात करने के बजाय उसके जनाजे में कितने लोग आए, इस पर फोकस क्यों किया जा रहा है?
13 लाख फॉलोअर्स जिंदगी की गारंटी नहीं!
आयशा की कहानी सोशल मीडिया की उस चमकदार दुनिया का दूसरा पहलू दिखाती है, जहां लाखों फॉलोअर्स होना सुरक्षा की गारंटी नहीं है. टिकटॉक पर वीडियो बनाना किसी को अपराधी नहीं बनाता. लेकिन पाकिस्तान में सामने आ रहे ऐसे मामले यह सवाल जरूर खड़े करते हैं कि क्या सोशल मीडिया पर एक्टिव महिलाओं और लोगों को उनकी लोकप्रियता, पहनावे, कंटेंट या निजी जिंदगी के आधार पर निशाना बनाना आसान समझ लिया गया है?
और जब कोई महिला मारी जाती है, तो बहस उसके कातिल तक पहुंचने और उसे इंसाफ दिलाने के बजाय उसके फॉलोअर्स, कंटेंट और निजी जिंदगी तक क्यों पहुंच जाती है?
आयशा की हत्या ने फिर खड़ी कर दी चुनौती
आयशा गिलमाना की हत्या का असली मकसद जांच के बाद ही साफ होगा. आर्थिक विवाद का दावा परिवार की ओर से सामने आया है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष जांच और अदालत की प्रक्रिया से ही निकलेगा. फिलहाल इस मामले ने पाकिस्तान में महिला सुरक्षा, सोशल मीडिया क्रिएटर्स की सुरक्षा और ऑनलाइन लोकप्रियता के साथ बढ़ते जोखिम पर फिर से बहस छेड़ दी है.