कभी गुस्से में तमतमाया हुआ व्यवस्था से लड़ता आम आदमी, कभी खतरनाक विलेन, कभी पुलिस अधिकारी, कभी भीतर से टूट चुका पिता, कभी मराठी रंगमंच का बूढ़ा अभिनेता और कभी ऐसा गैंगस्टर जिसे देखकर दर्शक हंसते-हंसते लोटपोट हो जाएं. ये सिर्फ नाना पाटेकर के निभाए हुए किरदारों के ब्योरे भर नहीं है, बल्कि उस अभिनेता की रेंज का एक छोटा सा परिचय है, जिसने हिंदी और मराठी सिनेमा में अभिनय की अपनी अलग भाषा बनाई. उनका निधन भारतीय सिनेमा के लिए सिर्फ एक अभिनेता को खोना भर नहीं है. यह उस कलाकार का जाना है, जिसने अभिनय को स्टारडम की चमक से अलग करके जिंदगी की खुरदरी, असहज और कई बार बदसूरत सच्चाइयों के करीब ला खड़ा किया था.
नाना की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि उनकी कोई एक तय रेंज नहीं थी. वह किसी किरदार में फिट होने की कोशिश नहीं करते थे, बल्कि किरदार को अपनी बेचैनी, अपनी आवाज और अपनी देह से एक नया स्वभाव दे देते थे.
नाना उन अभिनेताओं में थे जिनके लिए संवाद महज डायलॉग नहीं थे. वह बोलते थे तो लगता था कि किरदार के भीतर लंबे समय से जमा गुस्सा, असहमति, हताशा, करुणा या बेचैनी अचानक बाहर आ गई है. क्रान्तिवीर का उबलता हुआ प्रतिरोध हो, परिंदा का हिंसक संसार, अब तक छप्पन का भीतर से जटिल पुलिस अधिकारी हो या वेलकम का मस्तमौला उदय शेट्टी. उनके संवादों में सिर्फ शब्द नहीं होते थे, एक पूरा मनोविज्ञान चलता था. शायद यही वजह है कि नाना के बोले हुए कई संवाद फिल्मों से बाहर निकलकर लोगों की बातचीत का हिस्सा बन गए. उन्होंने डायलॉग को अभिनय का एक हिस्सा भर नहीं रहने दिया.
हिंदी सिनेमा में लंबे समय तक खलनायक को आवाज ऊंची कर डायलॉग बोलने पड़े थे. वर्दी पहने पुलिसवाले के लिए रौब दिखाना जरूरी था और फिल्म के हीरो के लिए आकर्षक दिखना जरूरी थी. नाना ने इन तीनों धारणाओं को अपने तरीके से उलट दिया. उनकी सबसे बड़ी ताकत शायद यही थी कि वह अभिनय करते हुए अभिनय करते नहीं दिखते थे. उनकी तीखी आवाज, बोलने की असामान्य रफ्तार, अचानक आने वाला ठहराव, आंखों की बेचैनी, चेहरे पर बदलती हुई कठोरता और डायलॉग के बीच की खामोशी ये सब मिलकर उनके किरदार को गढ़ देते थे.
नाना ने नौ साल के भीतर परिंदा, क्रांन्तिवीर और अग्निसाक्षी के लिए तीन नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते. तीनों भूमिकाएं एक-दूसरे से इतनी अलग थीं कि नाना जैसे एक्टर ही इनके साथ न्याय कर पाने में सक्षम होते. उन्होंने 1991 में प्रहार: द फाइनल अटैक के जरिए डायरेक्शन की दुनिया में कदम रखा. ना सिर्फ डायरेक्ट किया, स्क्रीनप्ले से लेकर अभिनय की जिम्मेदारी भी उठाी. यह उस कलाकार का दूसरा रूप था जो सिर्फ किसी और के लिखे किरदार को निभाकर संतुष्ट नहीं था, बल्कि अपनी दृष्टि से सिनेमा कहना चाहता था. उनके लिए सिनेमा सिर्फ मनोरंजन या पेशा नहीं था, अपनी बात रखने का माध्यम भी था. यही वजह है कि उनके किरदार अक्सर अच्छे और बुरे की सीधी रेखा पर नहीं चलते. उनमें गुस्सा था, कमजोरी थी, हिंसा थी, करुणा थी और सबसे बढ़कर मानवीय विरोधाभास था.
असल जिंदगी में उनकी सबसे दिलचस्प चीज शायद उनका बेबाक होना था. वह उन कलाकारों में नहीं थे जिन्हें अपनी सार्वजनिक छवि को हर कीमत पर बचाए रखना हो. जो सोचते थे, कह देते थे. कई बार इस तरह कि सामने वाला असहज हो जाए. राजनीति से लेकर किसानों और फिल्मों तक उनके बयान उस सुरक्षित भाषा से अक्सर बाहर निकल जाते थे जिसमें बड़े सितारे आमतौर पर बात करते हैं. उनकी बेबाकी कई बार विवादों में भी रही, लेकिन यही बेबाकी उनकी पहचान का हिस्सा बन गई. वह अपनी बात को चमकदार शब्दों में पैक करने वाले अभिनेता नहीं थे.
नाना के बारे में उनके साथ काम करने वाले लोगों की बातें भी इसी विरोधाभास को सामने लाती हैं. पर्दे पर जिस आदमी की आवाज कई बार तूफान जैसी लगती थी, उन्हें उषा उथुप ने जेंटलमैन और गोल्डन हार्ट वाला इंसान बताया था. उन्हें जानने वाले लोग बार-बार उनकी ऑथेंटिसिटी की बात करते रहे. शायद यही वजह है कि उनके अभिनय में भी बनावट कम दिखाई देती थी. वह किरदार को सुंदर बनाने की कोशिश नहीं करते थे. उसकी कमियां, उसकी खुरदुराहट और उसकी कमजोरियां भी साथ लेकर चलते थे. पर्दे पर जितने कठोर दिखाई देते थे, निजी जिंदगी में उतने ही सहज और सीधे रहने की कोशिश करते रहे.
हाल के दिनों में उनका एक पुराना इंटरव्यू फिर चर्चा में आया, जिसमें वह मौत को लेकर लगभग सहज भाव से बात करते दिखाई दिए. निधन से कुछ दिन पहले गोवा के एक कार्यक्रम में भी उन्होंने कहा था कि कोई नहीं जानता कि वह कल यहां होंगे या नहीं. आज उनकी मौत के बाद उनके ये शब्द स्वाभाविक तौर पर लोगों को ज्यादा गहरे लग रहे हैं लेकिन नाना के स्वभाव को देखें तो शायद यही उनकी खासियत थी.
उनकी जिंदगी का एक हिस्सा वह भी था जिसे नाना ने कभी पूरी तरह छिपाया नहीं. वह था भूख और अभाव. 13 साल की उम्र में परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ने के बाद वह फिल्मी पोस्टर पेंट करने लगे थे. स्कूल के बाद कई किलोमीटर पैदल चलना और मामूली कमाई करना उनके शुरुआती जीवन का हिस्सा था. बाद में जब वही आदमी सिनेमा का बड़ा नाम बना, तो भी उस शुरुआती संघर्ष की स्मृति उनके भीतर कहीं बची रही. शायद इसीलिए उनके लिए गरीबी और किसान महज फिल्मों की कहानियों के विषय नहीं थे.
नाना की जड़ें महाराष्ट्र की मिट्टी में थीं और मराठी रंगमंच उनके अभिनय की पहली पाठशाला रहा. यही रंगमंच बाद में उनके सिनेमा में भी दिखाई देता रहा. नटसम्राट में एक बूढ़े रंगमंच अभिनेता गणपत बेलवलकर का किरदार निभाते हुए उन्होंने जैसे अभिनेता की जिंदगी के उस अकेलेपन को छू लिया था, जिसे शायद वही कलाकार सबसे गहराई से समझ सकता है जिसने खुद मंच की रोशनी और उसके बाद का अंधेरा देखा हो.
इसलिए नाना को सिर्फ बॉलीवुड के चश्मे से देखना उनके जीवन के साथ न्याय नहीं होगा. उनकी पहचान में महाराष्ट्र की संस्कृति, रंगमंच और समाज के सवाल लगातार मौजूद रहे. वह सिर्फ मराठी भाषा में काम करने वाले अभिनेता नहीं थे, बल्कि उस सांस्कृतिक जमीन के कलाकार थे जिसने उनकी आवाज को उसका खास तेवर दिया. महाराष्ट्र ने उन्हें सिर्फ फिल्म स्टार की तरह नहीं देखा, अपने कलाकार की तरह देखा.
इसी जमीन से जुड़ा उनका एक और महत्वपूर्ण पक्ष था किसान. नाना खुद खेती करते थे. सिंहगढ़ किले के पास उनकी जमीन पर वह चावल, मूंगफली, लहसुन और प्याज जैसी फसलें उगाते थे. खेती उनके लिए किसी सेलिब्रिटी की देहाती तस्वीर खिंचवाने भर का शौक नहीं थी. वह मिट्टी से जुड़े रहने का तरीका थी. जिस आदमी ने जिंदगी में अभाव देखा हो, उसके लिए जमीन का अर्थ शायद किसी ऐसे व्यक्ति से ज्यादा गहरा होता है जिसने गांव और खेत को सिर्फ तस्वीरों में देखा हो.
2015 में महाराष्ट्र के सूखे और किसान आत्महत्याओं ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया. अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ उन्होंने किसानों के परिवारों की मदद का अभियान शुरू किया और बाद में नाम फाउंडेशन की शुरुआत हुई. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि टीवी पर किसान आत्महत्या करने वाले एक परिवार की कहानी देखने के बाद उन्होंने अपनी गाड़ी खरीदने के लिए रखे पैसे किसानों के परिवारों को देने का फैसला किया. लेकिन रकम बांटने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि समस्या इतनी बड़ी है कि व्यक्तिगत मदद पर्याप्त नहीं होगी.। वहीं से एक संगठित पहल का विचार आया.नाना के लिए किसान कोई सोशल इश्यू नहीं था, बल्कि उस भारत का चेहरा था जिसे वह अपने आसपास देखते थे.
यही वजह है कि नाना किसानों पर सिर्फ भावुक बयान देने वाले सेलिब्रिटी नहीं थे. उन्होंने लगातार उनके सवालों पर बात की और किसान परिवारों की मदद को अपने सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनाया.
नाना पाटेकर की एक और बात उन्हें बाकी सितारों से अलग करती थी. वह स्टार की तरह दिखने की कोशिश नहीं करते थे. महंगे शौक, चमकदार जिंदगी और लगातार सुर्खियों में बने रहने की बेचैनी उनसे दूर रही. वह किताबों, संगीत, अच्छी फिल्मों, खेती और खाना पकाने जैसी साधारण चीजों की बात करते थे. शूटिंग के दौरान पूरी यूनिट के लिए खाना बनाने के किस्से भी उनसे जुड़े रहे.
अपने बेटे मल्हार को लेकर भी उन्होंने फिल्मी विरासत को आसान रास्ता नहीं बनाया. नाना ने अपनी प्रसिद्धि का इस्तेमाल बेटे को लॉन्च करने के लिए नहीं किया. शायद वह मानते थे कि इससे इंडस्ट्री में एंट्री का मौका तो मिल जाएगा लेकिन जगह उसे अपनी योग्यता से बनानी होगी.